Friday, May 29, 2015

अच्छा स्वास्थ्य और नशा

अच्छा स्वास्थ्य सबसे बड़ी स्वतंत्रता है क्योंकि अच्छे स्वास्थ्य वाला व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, अतः किसी भी प्रकार का नशा आपकी इस सबसे बड़ी और पहली स्वतंत्रता के लिये बाधा है। इससे दूर रहना ही स्वतंत्र होने का द्योतक है। आप तब अपने को स्वतंत्र नहीं मान सकते, जब आप "शौक़" की किसी भी वस्तु को ख़रीद सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं, आप सही मायनों में तब स्वतंत्र हैं, जब आप ये बुद्धि-विवेक अर्जित कर लेते हैं कि आपके स्वयं के लिये क्या उचित है, और आप वास्तव में चाहते क्या हैं। जब-तक आपके विचारों में ये शुद्धता नहीं आ जाती है, तब-तक आप किसी न किसी चीज़ के ग़ुलाम बने ही रहेंगे, नशा क्या बड़ी चीज़ है। चीज़ें अपने शुद्ध रूप में बुरी नहीं होतीं, उनके प्रयोग के लिये क्या भावना कार्य करती है वही मुख्य है।

"नशा शराब में होता तो नाचती बोतल"

शिकंजी या लस्सी तो गर्मी से राहत देती हैं, भारत जैसे गरम देश में शराब की ज़रुरत मौसम के किस हिसाब से है मुझे समझ में नहीं आता, ख़ैर ये व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का विषय अवश्य है। यदि ये आवश्यकता है, तो अवश्य इसकी पूर्ति होनी चाहिये, परन्तु यदि ये मात्र "दिखावे का उपभोग (Conspicuous Consumption)" है, तो इसके प्रयोग को किसी भी रूप में बढ़ावा तो नहीं दिया जाना चाहिये। हमारी पीढ़ी को इस पर विचार करना चाहिये।
[नशे से तात्पर्य=सभी प्रकार के नशे, कोई भी ऐसी चीज़ जिसके प्रयोग से रोके जाने पर आपको क्रोध आता है]

Thursday, May 21, 2015

Imagination Vs Reality (A story needs both)


[Imaginatiin]
She: I'm fat.
He: No, you are not.
She: Everyone ask me to lose my weight.

He: They are jealous baby.
She: You don't know anything.
He: I know you more than they do, they are blind.
She: I think you are, not them..
He: Babe, I have seen you dressed 

 super nice, I've seen you
in school uniform, I've seen you
with hair tied, chilling with
no makeup on, I've seen you cry,
smile, laugh, mad, I've seen
you sleeping, hyper, awake...
You are always so beautiful to
me, always perfect..and you
say I don't see you clearly? :')
She: *Hugs* I Love you.
He: I Love you More.
She: Why do you care so much ?
He: I Care Because I Love You. 


[Reality]
She: I am fat.
He: hmm long pause....

yes, you are and I have been telling you for years but you just don't do anything and therefore I have stopped telling you. Every time I tell you the truth I get into trouble so I avoid talking to you.

Wednesday, May 20, 2015

(1) "सावित्री (मेरी पहली कहानी)"

पाँच बहनों में सबसे ख़ूबसूरत ब्राह्मण-कन्या,सावित्री। माता-पिता ने नाम बस रख दिया, कोई नाम तो रखना ही था। एक वो सावित्री थीं, रूपसी, राजा की पुत्री, राज-कन्या, अपने जीवन के सारे निर्णय लेने के लिये स्वतन्त्र, जो मन को भा गया वही पतिरूप में सदा के लिये स्वीकार्य हो गया, क्षत्राणी थीं, साहस तो रक़्त में व्याप्त था। सबने मना किया कि सत्यवान से विवाह न करो पर राजकन्या के प्रेम के आगे किसकी चली है, यमराज को भी हार माननी पड़ी। पर मेरी सावित्री को तो प्रेम का अधिकार ही नहीं। बचपन बीत गया जवानी के इंतज़ार में और जवानी बीतती जा रही थी, ब्याह के इंतज़ार में। बूढ़े होते जा रहे माता-पिता दिन-रात यही सोचते कि किसी तरह यह कन्या भी हिल्ले लगे। गरीब की कन्या को सुंदर होने का भी अधिकार नहीं होता। मनचाहा वर तो किसी-किसी की तपस्या में होता होगा, सावित्री दिन-रात यही सोचती रहती। देने लायक दहेज़ जुटा सकें इसकी हैसियत तो माता-पिता चार बेटियों का ब्याह करके पहले ही चुका चुके थे, बस किसी तरह इसकी भी गाँठी जुड़े तो गङ्गा नहायें और सत्यनारायण का पाठ धरें।

ख़ैर, देर-अबेर ईश्वर ने उनकी सुन ही ली, एक बिचवानी ने एक रिश्ता बताया। शहर के एक बड़े धनवान ब्राह्मण हैं उन्होंने आपकी कन्या को एक विवाह समारोह में देखा था, उन्हें आपकी कन्या बहुत जँच गयी है, लेन-देन का कोई चक्कर नहीं, ईश्वर की कृपा से सारा घर भरा है, उन्हें कुछ नहीं चाहिये। यह सुनकर तो सावित्री के माता-पिता को तो मानों मुँह मांगी मुराद मिल गयी। फिर भी बिचवानी से पूछ ही लिया, कि ऐसा क्यूँ कि कुछ लेना-देना ही नहीं? बिचवानी बोले, दूसरा ब्याह है, पहली पत्नी इन्हें छोड़कर चली गयी, जीवन काटना कठिन जान पड़ा तो फिर से ब्याह की इच्छा जताये रहे, इसी से हम आपसे बात किये, लड़कियों की कोई कमी थोड़े ही होती है धनवान को। लड़की को सारी उमर बैठाये रखने का इरादा हो तो ना कर दो, कोई गरजू थोड़े ही हैं। इतना कह कर आग-बबूला होते हुये बिचवानी महाराज उठकर जाने लगे, तो सावित्री के पिता उनके पैरों पर गिर पड़े, महाराज हमसे भूल हो गयी जो आपसे सवाल-ज़वाब किये, आप तो हमारे हितैषी ही हैं, मेरी ही मति मारी गयी थी, क्षमा महाराज, क्षमा। अच्छा-अच्छा ठीक है, रहने दो ये सब, रिश्ता पक्का समझूँ फिर? जी महाराज, अवश्य, शुभस्य शीघ्रम। इसी जेठ में ब्याह कर देते हैं।

सावित्री, फिर खो गयी सपनों की दुनिया में? उधर से आती हुई सरिता ने चुटकी ली। ब्याह होगा, मैडम जी का, कार में मायके आयेंगी। सावित्री भी सोचती, कि काश हम-उम्र दूल्हा मिल जाता तो "तुम" करके बात करती, इस अधेड़ को तो सारी उमर "आप" कहना होगा। तीस की होने को आयी थी और ख़ुद को नवयौवना समझ, सपने भी कच्चे देखती थी।

जैसे-तैसे ब्याह निपटा, सारा ख़र्च लड़के वालों की तरफ़ से ही किया गया। नाते-रिश्तेदार सब विदा हुये और विदा होकर सावित्री अपने पति के साथ बंगले पर चली आयी। सावित्री के मन में एक प्रश्न मथता रहता, कि इनकी पहली पत्नी इन जैसे भले मानुष को छोड़ कर, अपना सारा सौभाग्य छोड़कर क्यूँ चली गयी? फिर सोचती कि, ये न हुआ होता तो मेरे भाग्य क्यूँकर खुलते, ख़ैर मुझे क्या, यह सोचते-सोचते नवविवाहिता का शृङ्गार करके, दर्पण में स्वरुप पर ही मुग्ध होती रहती। दिन इसी तरह बीतते गये और सच्चाई की अनगिनत परतें शनैः-शनैः खुलती गयीं। चार वर्ष होने को आये थे विवाह को पर सावित्री की गोद अभी तक सूनी थी। बाँझ के ताने सुन-सुन कर कान पक गये, बेचारी अपने मन की व्यथा किससे कहती। हारकर पति से एक बच्चा गोद लेने के लिये कहा, तो उसने सारी भलमनसाहत का आवरण उतार कर फेंका और एक झन्नाटेदार थप्पड़ सावित्री को रसीद दिया। तेरी हिम्मत कैसे हुई यह बात कहने की? हम ख़ानदानी लोग हैं, हम अपनी वंशबेल किराये के पौधों से नहीं बढ़ाते। सावित्री तो जैसे होश में आ गयी, अब तक जो देखा वो सब स्वप्न था? इस नपुंसक के सम्मान की रक्षा, अब तक क्यूँकर करती रही? मन में कुछ ठानकर आँसू पोछकर सावित्री मुस्कुरा उठी। सावित्री के भीतर एक पत्नी की हत्या हो गयी थी, बची थी तो बस एक औरत।

कुछ दिन बीते और सावित्री के पति ने सत्यार्थ कुमार को अपनी सहायता के लिये काम पर रख लिया और अन्य नौकरों के साथ उनके रहने की व्यवस्था कर दी।

सावित्री का शव विवाहिता के पूरे शृङ्गार के साथ रखा हुआ है, परिवार की सभी स्त्रियाँ सावित्री की चरणरज लेने को व्याकुल हैं। स्त्रियाँ आपस में बातें करती हैं, सती स्त्री थीं सावित्री बहन, जाने से पहले पति की वंशबेल बढ़ा कर ही गयीं, पास ही एक स्त्री की गोद में एक मनोहारी नवजात बालक आकाश को निहारने का असफ़ल प्रयास कर रहा है। यह सावित्री का पुत्र है, सावित्री इस बालक को जन्म देते ही सिधार गयी।

सावित्री के पति श्मशान घाट पर सोच में डूबे खड़े हैं, शून्य में निहारते हैं, बालक के लालन-पालन की चिंता उन्हें खाये जा रही है, तीसरा ब्याह कर लें क्या, सोचते हैं?

Thursday, May 14, 2015

दो अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करके देखना चाहती हूँ (समाजशास्त्र का मेरा कोई अध्ययन नहीं है, अलबत्ता अर्थशास्त्र थोड़ा-बहुत, मतलब परास्नातक स्तर तक पढ़ा है, यह तुलना मेरे "ऑब्जरवेशन" पर आधारित है)

जापान में वर्तमान में दो समस्यायें मुँह फैलाये खड़ी हैं, पहली है, "नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि", और दूसरी है, "वयोवृद्ध लोगों की संख्या कुल जनसँख्या की ४०% है"। लगभग हर दूसरा व्यक्ति इन समस्यायों पर चिंता जताता मिल जाता है। कुछ के अनुसार यह बहुत बड़ा ज़ुल्म है, कि कमाने वाली जनता उन लोगों का भी उत्तरदायित्व उठाये जो नहीं कमाते हैं। हाल ही में मेरी एक मित्र ने इसी प्रकार की बात की, तो मुझसे रहा नहीं गया, आख़िरकार मैंने उनका विरोध करते हुए कहा कि, जितने भी वयोवृद्ध लोग आपके यहाँ हैं, उन्होंने अपनी युवावस्था में आपकी अर्थव्यवस्था को सबल बनाने में अपना योगदान दिया है, कर(टैक्स) दिया है, साथ ही अपनी पेंशन के लिये भी स्वयं इंतज़ाम किया है, इसलिये आपकी यह चिंता स्वीकार्य नहीं है। जो पहली समस्या है, नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि की, वो एक बड़ी चिंता है, क्योंकि जब भविष्य में काम करने वाले हाथों की आवश्यकता पड़ेगी तो उसका इंतज़ाम कैसे होगा? यहाँ जनसँख्या का माध्य (एवरेज) प्रति परिवार १ बच्चा आता है, उसके बहुत से कारण हैं, जिनमें से एक निःसंतान दम्पत्तियों की बहुत अधिक सँख्या भी है, तथा "दत्तक पुत्र/पुत्री" (एडॉप्शन) का विकल्प न के बराबर (शायद शून्य)।

भारत की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। भारत में जनसँख्या वृद्धि अपनी सभी सीमाओं के पार जा चुकी है (भले ही हाल में वो रुक गयी है), तथा यह देश की अर्थव्यस्था को जितना नुकसान पहुँचा सकती थी, पहुँचा चुकी है। माल्थस तो अपने जनसँख्या के सिद्धांत में बता ही चुके हैं कि, "प्रकृति अपना बदला स्वयं ले लेती है", तो क्या आप वर्तमान समय में ऐसी किसी स्थिति की कल्पना या आकाँक्षा कर सकते हैं कि, "प्रकृति स्वयं अपना बदला ले?", कम से कम मैं तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहूँगी कि ऐसा कुछ हो। जितनी तीव्रता से भारत की "युवावस्था" आयी है उतनी तीव्रता से रोज़गार उत्पन्न करने में हम असफल रहे हैं। लेकिन, रोज़गार हो या न हो विवाह सबका करा दिया जाता है। विवाह संस्था का मूल-आधार संतानोत्पत्ति एवं उसका पालन-पोषण है (सारी दुनिया में)। अब वर्तमान भारत में जो १८% का "कामगार"(वर्क-फ़ोर्स) है उसके ऊपर कितना बोझ है आपको इसका अंदाज़ा लगना शुरू हो गया होगा। शिशु, बालक, स्त्रियाँ तथा वृद्धजन (जो प्रकटरूप से अर्थव्यवस्था में अपना योगदान नहीं कर रहे हैं) सबके भरण-पोषण का भार, वर्तमान "कामगार"(कार्यरत जनता) पर है। आशा है कि आप एक विस्तृत चित्र देख पाये होंगे। समाधान और कौन सी योजनायें प्रभावी होंगी, यह मैं नहीं जानती, परंतु इतना तो तय है, कि भारत को अपनी सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा, तथा यह भी समझना होगा कि अभी भारत की सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि वह "योगक्षेमं वहामि अहम्" कर सके।

Thursday, April 30, 2015

प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाई |
राजा प्रजा जिस रुचे, सीस देय ले जाई ||
Love is not grown in the field, and it isn’t sold in the market
But a king or a pauper who likes it, offers his head to obtain it
MEANING:
In the region of love there is no difference between king or pauper. Who wants to get love has to give up his ego, all other wealth has no value in love. Love is spiritual, not a material thing.

क्रोध पर विजय


मेरे विचार से क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए क्रोध को जानना आवश्यक है| मेरा यह भी मानना है कि जो व्यक्ति हिंसा को नहीं जानता है वह हिंसा पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता है|

मानव मन की कई परतें व सतहें होती हैं जिनसे मानव स्वयं भी अनभिज्ञ व अपरिचित होता है अतः पूरे जीवनकाल में अहिंसक दिखने वाला व्यक्ति कब हिंसक रूप धारण कर ले यह कह सकना कठिन है| उसी प्रकार एक सदैव शांत दिखने वाला तथा शांत व अविचलित रहने वाला व्यक्ति जब जीवन के कमज़ोर क्षणों में क्रोधी व्यक्ति का आचरण करता है तो उसके परिजन भयभीत हो जाते हैं| किन्हीं विशेष परिस्थितियों में तो उसे झूठा व ढोंगी भी समझा जा सकता है| परंतु वास्तविकता कुछ और ही होती है| ऐसा व्यक्ति एक कमज़ोर, हारा हुआ, हताश और अज्ञानी प्राणी होता है, क्योंकि वह स्वयं अपने मूल स्वभाव से अपरिचित होता है|

अब प्रश्न यह उठता है कि वह अपने मूल स्वभाव से अपरिचित क्यों होता है? इसका उत्तर देना सरल कार्य नहीं है, कारण यह है कि किसी विशेष परिस्थिति में मनुष्य का व्यवहार बहुत सी बातों पर निर्भर करता है| स्वयं के मूल स्वभाव से अपरिचित होने के कारणों में बहुत बड़ा योगदान हमारे संस्कारों का है, और हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार मनुष्य अपने पूर्व-जन्म के संस्कारों को भी अपने साथ लाता है|

क्रोध का मूल कारण अज्ञान है, अतः क्रोध पर विजय पाने के लिए अपने मूल स्वभाव का ज्ञान तथा क्रोध की उत्पत्ति के कारणों का ज्ञान आवश्यक है| जब तक आप इन दोनों बातों का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते हैं तब तक न ही आप क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकते हैं न ही आप सत्य का साक्षात्कार कर सकते हैं|

मानव जीवन का लक्ष्य सत्य से साक्षात्कार है, वही आनंद का स्रोत है, परंतु क्रोध पर विजय प्राप्त किए बिना इस आनंद की प्राप्ति संभव नहीं है| अतः, अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कीजिए और जीवन का आनंद लीजिए| - अनामिका

Self-image


I never knew I will be disturbed by my friends in Japan, when I am writing something, but this is a blessing indeed. [I was being disturbed twice while I was writing this piece, so there could be disconnections].
I have been reflecting on this topic: Self-image, for a long time and here are my findings. What is “Self-image”? As per my understanding, it is the summation of various reflections. The problem with us is, we cannot see ourselves, we can only see others, and therefore we make a perception of other human beings based on the information provided by our senses. There is one more factor that determines our perception about others, which is the state of mind. Therefore, we make a decision about other person’s image based on the information provided and also the state of mind at that point of time. Hence, we seems to be ready to judge the personality and actions of others. But, we find it very difficult to do the same for ourselves.
The first reception of our image is the imaginary “image”, which is reflected in the “Mirror”. Few researches say that we see a far better looking picture of ourselves than we actually are.
The second basis of information is the opinions of others. We often base our image on the opinions provided by the people around us. Sometimes they are family members, friends, teachers, colleagues, neighbors and strangers.
My interest is to know whether the image “formed”, based on the various information received from various sources, is “Real” or “Not-real”. The likely answer to this question is “Not-real”. Now the next question arises, if we know that the “Self-image” is not real, then why we carry it with us everywhere? Again, I get the same answer, because we do not know ourselves well enough, and we do not have the courage to be the “real”. Why we do not have the courage, because our “Ego” is vulnerable.
The made-up “Self-image” is the byproduct of our thoughts, and we are so much attached to our thoughts and convictions that we do not want to leave those even for a fraction of second, therefore we carry our “Made-up Self-image” with us everywhere.
Market-researchers have a very good idea of this “Imaginary or Made-up Self-image” and also the fragile nature of it, that they relate their products with the kind of image we have created for ourselves. Their objective is very clear, that is to sell the product or service.
There are numerous examples of human actions based on the “Self-image”. For example, the kind of cloths one wears, kind of language one speaks, kind of hobbies and possessions etc. The “Self-image” is not only related with the material possessions but the behavior of a person also is governed by this “Imaginary Self-image”. We cannot term it a “Hippocratic behavior” because it is not a conscious effort, rather it is so unconscious that we are unaware of it. One can mistake the “Imaginary Self-image” and “low self-esteem” to be interchangeable, but it is not the case. People with high self-esteem also have an “Imaginary Self-image”.
Now the concluding question here is: How can we decide if a “Self-image” is “fake” or “real”?
There is one and only one way to do it, and that is, to see oneself as we see others. The moment you will start seeing your own actions and thoughts as you see other’s, you will know if your “Imaginary Self-image” is “fake” or “real”. That is where you will find your answer….