Tuesday, December 29, 2015

(25) "मायके आयी हुई लड़कियाँ"

(डिस्क्लेमर:- अग़र रोना आ जाये तो मुझे मत कहना, अपने रिस्क पर पढ़ना)
मायके आयी हुई लड़कियाँ,
माँ से लिपट रोती हैं ज़ार-ज़ार,
पिता से करती हैं,
आँखों ही आँखों में बहुत सा दुलार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
बार-बार जाती हैं बाज़ार,
लाती हैं रंग-बिरंगी चूड़ियाँ काँच की,
खनखनाती हैं झिलमिलाती हैं हर बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
सोती हैं देर तक निश्चिन्त,
उठती हैं खाने की महक से,
अंतरमन में बसा लेती हैं खुशबू घर की,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
झाँकती हैं देर तक माँ की आँखों में,
चुनने लगती हैं उनमें बसे ख़्वाब,
बस वही जानती हैं सजाना उन ख्वाबों को,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
जानती हैं वापसी का दिन पक्का है,
धूप भर लेती हैं आँचल में अपने,
और रातों का लगा लेती हैं काजल,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
जी लेती हैं बचपन इक बार फ़िर से,
बन जाती हैं पापा की नन्ही गुड़िया,
और सीखती हैं खाना बनाना माँ से,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
मिल लेना चाहती हैं सबसे,
के ये मुलाक़ात आख़िरी हो जैसे,
यादें जमा करती हैं पल-पल बार-बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
सबकुछ छोड़ आती हैं दहलीज़ पर,
अपने संसार में जाकर जीती हैं,
जन्म लेती हैं फ़िर भी बार-बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
होती हैं बेहद ख़ूबसूरत कि,
उनके होंठों पर बसती है मुस्कुराहट,
आँखों में चमकते हैं सितारे कई,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
इनका यही अफ़साना है,
के ये संसार भी छूटे सदा,
वो संसार भी बेगाना है।
- अनामिका

Saturday, December 26, 2015

"सम्बन्धों की भावना"

वो भी एक दिसंबर था। उन दिनों मैं hostel में रहकर GRE और TOEFL के exam की तैयारी कर रही थी। क़रीब 6 महीने, लगातार इसकी तैयारी में ख़र्च कर दिये थे, बैरॉन्स, प्रिंसटन, नॉर्मन लुइस, ऑनलाइन GRE क्विज़ेज, मेमोरी कार्ड्स और पता नहीं क्या-क्या।
दिन में ऑफ़िस में काम करती, और सुबह-शाम-रात पढ़ाई और entertainment के नाम पर गाने।
GRE practice test के बारे में एक विश्वास(अंधविश्वास) था कि जितना score आप practice test में करते हैं वही score आपके final में भी आता है। इस विश्वास से डरी हुई मैं सोचती थी कि एकदम एकांत में ही टेस्ट लगाऊँगी, जब किसी भी प्रकार के disturbance की संभावना एकदम ना के बराबर होगी।
एक और बड़ा ही strong belief था मेरा, कि आराम करने वाले कुछ नहीं सीख पाते हैं, तो चाहें सर्दी हो या गर्मी, करना है तो करना है, ज़िद कहते हैं इसे  इसलिये, आधी रात को test लगाने बैठती थी, अपने प्रिय कंप्यूटर पर। GRE test के पहले प्रश्न से ही decide हो जाता है कि आपका graph ऊपर जायेगा या नीचे। अतः पहला प्रश्न सही होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। बहुत गंभीर क़िस्म का test है (कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता था)
ऐसी ही एक सर्द रात को मेरी प्यारी रूममेट (रूम अलग़-अलग़ ही होते थे), को मुझ पर दया आयी और उसने मेरे लिये ग्लास भर चाय बनाकर मुझे दी। मेरे लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित और अनपेक्षित था, उस वक़्त ऐसा ही लगा मानो ज़न्नत मिल गयी है। रात के शायद 3 बजे होंगे। आज भी इतने वर्षों के बाद यह याद इतनी ताज़ा है कि जैसे कल ही की बात हो। वो अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं मैं अपनी, लेकिन ऐसे ही छोटे-छोटे पलों ने जो हमारा सम्बंध जोड़ा वह आजतक क़ायम है। समय और दूरी सम्बन्धों की इस भावना को बदल नहीं पाये इसलिये मैं ईश्वर की बहुत आभारी हूँ, आज भी वो मेरे मन की बात बिना मेरे ज़ाहिर किये समझ जाती हैं।
काश कि हर सम्बंध ऐसा ही हो पाता।
- प्रिय गीता, तुम्हें समर्पित।

Friday, December 25, 2015

"बचपन की यादें और डॉक्टर्स"

जब मैं एक छोटी बच्ची थी, शरारतें करना और खेलना-कूदना यही मेरा पसंदीदा काम था। हर बच्चे का यही काम होता है।
इसी उछल-कूद के चक्कर में एक बार (5~6 वर्ष की उम्र में) मैं ईंटों की बनी क्यारी पर गिर गयी और दायीं आँख के पास चोट आ गयी। तुरंत ही मुझे डॉ. राज लूम्बा के क्लिनिक ले जाया गया। चोट को ठीक करने के लिये टाँके लगाने ज़रूरी थे और उस ज़माने में लोकल एरिया को सुन्न करने वाले ट्रीटमेंट भी नहीं होते थे। एक तो चोट लगने का दर्द और ऊपर से टाँके, करेला वो भी नीम चढ़ा। टाँकों के निशान तो ख़ैर समय के साथ धुँधले होते गये लेकिन यह याद इतनी गहरी है कि आज भी चलचित्र की तरह मानस-पटल पर अंकित है। ये तो बहुत बाद में पता चला कि हमारी यादों और हमारी भावनाओं का आपस में गहरा सम्बंध है, जिस बात से आपके भाव जुड़े हैं उसे भूलना कठिन होता है।
बहुत वर्षों के बाद एक बार फ़िर ख़ुद को उसी स्थिति में पाया। इस बार भी वैसी ही चोट लेकिन मुझे नहीं बेटे को आयी, उसकी भी वही उम्र और भौं (eye brow) पर 1 इंच का तिरछा कट लग गया, उसी तरह उछल-कूद और गिर कर पत्थर से टकराना। भाईसाहब किसी भी तरह डॉक्टर के पास जाने को तैयार न हों, किसी तरह बड़ी मशक्क़त के बाद इन्हें ले जाया गया। इस बार डॉ. संजय त्रिपाठी (लगभग हमारी उम्र के डॉ.) के ट्रॉमा सेंटर ले गए, आख़िर मानना पड़ेगा उनके धैर्य को, एक छोटे बच्चे को समझाते हुये, लोकलाइज़ सुन्न करने का इंजेक्शन भी लगा दिया और टाँके भी लगा दिये। इतनी बारीकी से उन्होंने ये काम किया कि मैं जितना भी आभार व्यक्त करूँ कम ही है। ये सारी प्रक्रिया मेरी आँखों के सामने ही OT में हुई और दिल तो मेरा मज़बूत था ही, क्योंकि ऐसी ही कारगुजारियाँ हम भी करके ही बैठे थे। अब ओखली में सिर दे ही दिया तो मूसल से क्या डर। ☺
जिसने कभी बचपन में खेलकूद वाली चोटें न खायी हों और टाँके न झेले हों वो इसे कितना समझेगा ये तो पता नहीं, लेकिन मैं जब कभी आईने में इस निशान को देखती हूँ तो बस यही ख़याल आता है कि ये गवाह है एक मासूम बचपने का। नहीं क्या ☺

Tuesday, December 22, 2015

(24) "अलख"

कितने ख़्वाब ग़ुमशुदा होंगे,
हसरतें कितनी खोई होंगी,
दिन कितने बोझिल होंगे,
कितनी रातें तुम रोयी होंगी,

ज़ख़्म अभी भी ताज़ा होंगे,
यादें कितनी न बासी होंगी,
मन कितनों के भारी होंगे,
कितनी रातें न सोयी होंगी,

औरत को इज़्ज़त न दे पायेंगे,
कैसे हिन्दुस्तानी कहलायेंगे,
न्याय समय पर नहीं हुआ,
फ़िर कैसी ये परिपाटी होगी,

प्रण लेकर ही बनाना होगा,
ऐसा समाज अब रचाना होगा,
हर लड़की दुर्गा का रूप बने,
अब हमें ही अलख जगानी होगी।

Saturday, December 19, 2015

(23) "बेख़ुदी"

ख़ुशियों का समंदर है,
या ग़म की ये गहराई है,
वादियों की ख़ामोशी है,
या मन की ये तन्हाई है,

तुमसे मिलने की ख़ुशी है,
या आलम-ऐ-बेरुख़ी है,
कुछ दूर तक तो साथ चल,
फ़िर इक ग़मग़ीन ज़ुदाई है,

तेरा नाम बड़ा ऊँचा है,
नाम लेना भी रुसवाई है,
ख़याल भर ही से तेरे,
कहीं शबनम मुस्कुराई है,

आग़ के दरिया में सम्हलना है,
या पार होना ही बेमानी है,
रूठ गयी है ज़िन्दगी तेरी,
या तेरा अंदाज़-ऐ-बेख़ुदी है।

Friday, December 11, 2015

"ख़ुशी कहाँ है?"

कल किसी ने इनबॉक्स में पूछा "ख़ुशी कहाँ है?", मैं मन ही मन मुस्कुरायी, अजी ये तो शाश्वत प्रश्न है, सदियों से ज्ञानीजन यही तो ख़ोज रहे हैं।
अच्छा प्रश्न है ना मित्रों, इसके उत्तर में कुछ बिंदु यहाँ रख रही हूँ, आप इस सूची को विस्तार दें। (आज प्रवचन देने के मूड में हूँ, मन न हो तो आगे मत पढ़ना)
1. ख़ुशी आपका प्रथम और जन्मसिद्ध अधिकार है।
2. ख़ुशी आपकी नितान्त व्यक्तिगत संपत्ति है, किसी दूसरे से इसका कोई ख़ास लेना-देना नहीं, जबतक आप स्वयं न चाहें।
3. ख़ुशी हाथ में उठाई हुई रेत के असंख्य कणों जितनी असीम है, बस इसे पकड़ने की कोशिश मत करना, सब सरक जायेगी, कुछ कण ही चिपके रह जायेंगे।
4. ख़ुशी जल की शीतलता में भी है और उसकी गर्माहट में भी, वक़्त-वक़्त की बात है।
5. ख़ुशी का आपकी बौद्धिकता, पद, प्रतिष्ठा, सम्पन्नता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है, सत्य से इसका सीधा सम्बन्ध ज़रूर है, आप जितना अधिक झूठ बोलेंगे उसी अनुपात में नाख़ुश रहेंगे। यदि आप ये समझते हैं कि आपके झूठ को पकड़ने वाली कोई मशीन ही ईज़ाद नहीं हुई आज तक, मतलब कि आप बहुत स्मार्ट हैं, तो भइया आपका दिल बहुत ज़ल्द इसका जवाब आपको देने वाला है।
6. ख़ुशी आपका चयन है, आपके पास दूसरा विकल्प भी नहीं, दुःख-तकलीफ़ की कहीं कोई कमी नहीं, आपकी सोच पर ही सब निर्भर करता है।
7. हर बार हर चीज़ आपके अनुसार नहीं हो सकती, लाख़ परहेज़ से रहिये, कुछ-न-कुछ तो लगा ही रहेगा ना, "टेक इट ईज़ी (Take it Easy)"।
8. Keep it Simple Silly (KISS) ये अपना लें तो काफ़ी हद तक ख़ुश रहा जा सकता है।
9. शांत मन ही ख़ुश रहता है, मन को शांत रखने के प्रयास करने न छोड़े। इस रास्ते पर मित्र हमारे सबसे बड़े साथी होते हैं, उतार-चढ़ाव सबकी ज़िन्दगी में आते हैं, आप अकेले नहीं।
10. अंतिम मार्ग जो ख़ुशी के रास्ते पर ले जाता है, वो "आराधना" का मार्ग है, या तो अपने कर्म से प्रेम करिये, या जिससे प्रेम हो उसके लिये कर्म करिये, तभी आप ख़ुश रह सकेंगे। ना ही आप प्रेम करना चाहते हैं, ना ही आप कर्म करना चाहते हैं तो ये प्रश्न पूछना बंद कर दीजिये कि, ख़ुशी कहाँ है? अरे भई ख़ुशी का मन, जहाँ मन किया चली गयी, कोई आपकी ग़ुलाम थोड़े न है।

Tuesday, December 8, 2015

भारत के शहरों में प्रदूषण

प्रदूषण आज के शहरी जीवन की सच्चाई है। क्या आपने कभी गंभीरता से सोचा है कि हम इस भयावह सच्चाई तक कैसे आ गये? (यह लेख भारत के शहरों के सन्दर्भ में है)।
भारतीय होने के नाते हम सब जानते हैं कि हमारे दैनिक जीवन में, हमारे खान-पान, रहन-सहन, भाषा-व्यवहार आदि में प्रतीकों का कितना अधिक महत्त्व है। आधुनिकता की अंधी-दौड़ हमें कहाँ ले आयी है। क्या आपको लगता नहीं कि यही सही समय है, जब कुछ पल ठहरकर दिशा निर्धारित की जाये?
भारतीय होने के नाते हमने, बरगद-पीपल पूजे (इनके औषधीय गुणों की छानबीन कीजिये, आप अवश्य सहमत हो जायेंगे कि इन्हें पूजना ही चाहिये), नाग को हमने देवता माना (नाग-पँचमी का त्योहार मनाया ताकि अकारण इनका वध न हो), भगवान शंकर के गले में सर्प, शीश पर चंद्र, और जटाओं में गँगा की अवधारणा की, (इन्हें पूजनीय बनाया ताकि हम इनके महत्व को सदैव याद रखें), खेतों पर हल चलाने से पहले उसकी पूजा की, घर बनाने से पहले "भूमि-पूजन" किया। गज (हाथी), वानर (बंदर), मूषक (चूहा), उलूक (उल्लू), मयूर (मोर), वाराह, मत्स्य, क्या-क्या गिनेंगे, हमने इन्हें प्रतीक बनाया ताकि हमें याद रहे। कमल-नारियल आदि वनस्पतियाँ भी हमारे प्रतीकों में सम्मिलित रहे। कभी आपने वास्तव में सोचा है कि ये प्रतीक, अंधविश्वास के प्रतीक न होकर हमारी पर्यावरण के प्रति जागरूकता को इंगित करते हैं।
आज भी हमें कहा जाता है कि सोकर उठने पर धरती पर पैर रखने से पहले, धरती माँ की चरण-वंदना करनी चाहिये, यह हमारी कृतज्ञता का द्योतक है या अंधविश्वास है, यह निर्णय आप स्वयं करें।
सुबह सबसे पहले अपने दोनों हाथों की हथेलियों को प्रणाम करना क्या इस बात का द्योतक नहीं कि हम कर्म-प्रधान सभ्यता हैं?
आज भी नदी में स्नान करने जाने पर नदी के जल को स्पर्श करके नदी को प्रणाम करते हैं, क्या हमें नदी का कृतज्ञ नहीं होना चाहिये?
यदि हम इस वैज्ञानिक सोच वाली संस्कृति के अंग हैं तो क्या कारण है कि आज भारत के शहर रो रहे हैं? भूमि (कचरा), वायु (धुँआ-धूल, कीटाणु), जल (विषाणु, केमिकल वेस्ट), भोजन (हर चीज़ में मिलावट), आकाश (अनेक प्रकार की तरंगें), जिन 5 तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है, हर उस तत्व को हम सब ने मिलकर प्रदूषित कर दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारा "लालची स्वभाव" है। अभी हम एक विकासशील देश हैं, अभी हमारी जेबें इतनी नहीं भरी हैं कि हम हर स्तरीय वस्तु का उपभोग कर सकें, फलस्वरूप, हमारे देश में हर वस्तु " सेकंड या थर्ड ग्रेड" की ही आती है, फिर चाहें वो "टेक्नोलॉजी" हो, " केमिकल" हों, "इलेक्ट्रॉनिक" या "कॉस्मेटिक"।
स्तरीय चीज़ों को पाने के लिये हमारे प्रयास अभी भी नहीं हैं।क्या आपको लगता है कि आयातित चीज़ों पर भरोसा किया जाना चाहिये? क्या आप जो गाड़ियाँ चला रहे हैं उनके फ़िल्टर हानिकारक तत्वों को हवा में, और बाद में आपकी साँस में जाने से रोक रहे हैं?
आँखें खोलिये, देखिये अपने चारों ओर, कहीं ऐसा न हो कि कल आपका बच्चा आपसे सवाल करे और कहे कि सारी गंदगी तुमने ही विरासत में दी है मुझे।