Wednesday, June 3, 2015

स्वर्णिम और मेरी कल की बात-चीत (जिसने मुझे सोचने पर मजबूर किया):-
स्वर्णिम ने बताया, "मम्मा,स्कूल से आते समय आज मुझे वो फिर से दिखा।"
मैंने पूछा, "कौन?"
स्वर्णिम का उत्तर,"वही होमलेस मैन। और एक बालक(स्वर्णिम का सहपाठी) ने कहा कि पुलिस इसे पकड़ती क्यों नहीं है?"
मैंने कहा, "हाँ, पुलिस को उसे रिमांड होम/ करेक्शन होम में रखना चाहिये। कम से कम उसे खाना तो मिलेगा"
स्वर्णिम का कथन, "पुलिस उसे क्यों पकड़े? आखिर उसका अपराध क्या है ? क्या ये अपराध है कि उसके पास घर नहीं है ?"
मैंने तर्क दिया, "शायद वो बीमार हो, शायद वो पागल हो (हमने कई बार उसे कूड़े में से खाना और दूसरी चीज़ें ढूंढते देखा है, पर दिन के समय वो इस इलाके में नहीं दिखता, पता नहीं कहाँ चला जाता है)"
स्वर्णिम का उत्तर, "नहीं मम्मा, वो पागल नहीं है, रेड लाइट के सिग्नल पर रुक जाता है, लाइट ग्रीन होने पर ही रोड क्रॉस करता है"
मैंने बात आगे बढ़ाई,"तुम्हारे विचार से ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिये?"
स्वर्णिम ने सुझाव दिया, "यहाँ की सरकार को ऐसे लोगों के लिये, जिनके पास घर और पैसे नहीं हैं, शेल्टर-होम बनाने चाहिये"
(मुझे याद आ गये भारत के वो असंख्य रेलवे स्टेशन जो इन जैसे निराश्रित लोगों के घर हैं, सर्दी-गर्मी-वर्षा से बचने के शरण-स्थल हैं) घर-भोजन-रिश्तों की अहमियत बढ़ जाती है जब आप किसी ऐसे इंसान से रूबरू होते हैं।

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