कुछ समय पहले तक "कवियों और लेखकों" से मेरा मन उचाट हो गया था, और एक धारणा बन गयी थी कि इनकी कई श्रेणियाँ होती हैं।
पहली एवं उत्कृष्ट श्रेणी:- वे रचनाकार जो ईमानदारी से विशुद्ध लेखन करते हैं, निडरतापूर्वक "स्व" को रूप देते हैं, शायद ऐसे ही रचनाकारों की रचनायें कालजयी होती हैं।
दूसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो अर्थशास्त्री होते हैं, बाज़ार की क्रियाओं के अनुरूप लेखन करते हैं। माँग और पूर्ति के नियम से भली-भाँति परिचित होते हैं।
तीसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो किसी भी प्रकार निष्पक्ष नहीं होते हैं, अर्थात किसी न किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं।
चतुर्थ श्रेणी:- खिचड़ी होते हैं, या कहें कि सर्वगुणसंपन्न होते हैं।
कुल मिला कर निष्कर्ष ये निकला कि रचनाकार चाहें किसी भी श्रेणी में आयें, इनका साहसी होना पहली अनिवार्यता है, क्योंकि जो साहसी ही नहीं वो "स्व" को रूप कैसे प्रदान कर सकता है? ये सारा जीवन इसी "स्व" के रूपांतरण हेतु ही तो है, अन्यथा इसका क्या प्रयोजन है?
[पढ़ने-लिखने की आशा पुनः जाग्रत हो गयी है]
पहली एवं उत्कृष्ट श्रेणी:- वे रचनाकार जो ईमानदारी से विशुद्ध लेखन करते हैं, निडरतापूर्वक "स्व" को रूप देते हैं, शायद ऐसे ही रचनाकारों की रचनायें कालजयी होती हैं।
दूसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो अर्थशास्त्री होते हैं, बाज़ार की क्रियाओं के अनुरूप लेखन करते हैं। माँग और पूर्ति के नियम से भली-भाँति परिचित होते हैं।
तीसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो किसी भी प्रकार निष्पक्ष नहीं होते हैं, अर्थात किसी न किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं।
चतुर्थ श्रेणी:- खिचड़ी होते हैं, या कहें कि सर्वगुणसंपन्न होते हैं।
कुल मिला कर निष्कर्ष ये निकला कि रचनाकार चाहें किसी भी श्रेणी में आयें, इनका साहसी होना पहली अनिवार्यता है, क्योंकि जो साहसी ही नहीं वो "स्व" को रूप कैसे प्रदान कर सकता है? ये सारा जीवन इसी "स्व" के रूपांतरण हेतु ही तो है, अन्यथा इसका क्या प्रयोजन है?
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