उल्टे ही गिरे आकर धरती पर,
उल्टा ही चित्र दिखा दर्पण में,
उल्टा ही सँसार बना नयनन में,
उल्टा ही विज्ञान पढ़ा बचपन में,
सूर्य उदय होता पूरब से,
अस्त हुआ पच्छिम में,
आभासी क्षितिज, आभासी सँसार,
हर वस्तु है कम्पन में, गति में,
परिवर्तन चराचर में,
हम अचरज में, ठिठके,
चाहे मन थामना, किसको,
निहारता अपलक, अवलम्ब,
छोड़ना जटिल है, प्रक्रिया कठिन,
डिगना अहं का नहीं सरल,
मन विकल, पीता गरल,
त्याग देह, जाता निकल,
जीवन आलोड़न, मध्य शिव बिंदु दो,
प्रारंभ जिसका अंत से,
जन्म घटना, होती घटित,
युगों-युगों से, युगों-युगों तक,
न समझना इसे, सीधा है या उल्टा,
जीवन बस जीते जाना है,
क्या जी का कर पाना है,
जीवन बस जीते जाना है।
उल्टा ही चित्र दिखा दर्पण में,
उल्टा ही सँसार बना नयनन में,
उल्टा ही विज्ञान पढ़ा बचपन में,
सूर्य उदय होता पूरब से,
अस्त हुआ पच्छिम में,
आभासी क्षितिज, आभासी सँसार,
हर वस्तु है कम्पन में, गति में,
परिवर्तन चराचर में,
हम अचरज में, ठिठके,
चाहे मन थामना, किसको,
निहारता अपलक, अवलम्ब,
छोड़ना जटिल है, प्रक्रिया कठिन,
डिगना अहं का नहीं सरल,
मन विकल, पीता गरल,
त्याग देह, जाता निकल,
जीवन आलोड़न, मध्य शिव बिंदु दो,
प्रारंभ जिसका अंत से,
जन्म घटना, होती घटित,
युगों-युगों से, युगों-युगों तक,
न समझना इसे, सीधा है या उल्टा,
जीवन बस जीते जाना है,
क्या जी का कर पाना है,
जीवन बस जीते जाना है।
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