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Friday, April 1, 2016

(30) "कविता"

किस रँग की मसि करूँ,
किस रँग से कहूँ कविता,
किस रँग में मैं हँसूं हँसी,
किस रँग में ख़ुशी मना लूँ,

किस रँग में समा जाऊँ मैं,
किस रँग में तुझे भिगो दूँ,
किस रँग का है तुझको यकीं,
किस रँग का विश्वास दिला दूँ,

किस रँग में ख़ुद को डुबा दूँ,
किस रँग में आनंद बसा दूँ,
किस रँग को धुएँ में उड़ा दूँ,
किस रँग में खो जाऊँ सदा।
- अनामिका

Thursday, March 31, 2016

(29) "आचमन करूँ"

सुमनों से सुरभित शाम लिखूँ,
या सुरमई सी एक रात लिखूँ,

मन उपवन का आनंद लिखूँ,
या तारों भरा आकाश लिखूँ,

सुरों से सजीला राग लिखूँ,
या कोई फागुनी फाग लिखूँ,

रंगों का कारोबार करूँ,
या तुम्हें गुलाल से लाल करूँ,

धानी रंग की मैं चूनर ओढूँ,
या रंग बसंती में तुम्हें ढ़कूँ,

बादामी रंग की लहर बनूँ,
या रुपहली सी चमकार बनूँ,

बैंगनी रंग का वृक्ष बनूँ,
या अँगूरी रंग की लता बनूँ,

नारंगी या लाल पलाश बनूँ,
या थोड़ा सा सुनहरा उठा लूँ,

हिमसागर सा हल्का नील बनूँ,
या जग सरिता सी मलीन दिखूँ,

(ईश्वर मेरे)
सब रंग तुमसे ही छीनूँ,
इन रंगों से आचमन करूँ।








Wednesday, March 9, 2016

(28) "पता नहीं क्यूँ डरती हूँ।"

स्नेह नहीं लगता है कोमल,
आँसू भी हैं कम ख़ारे,
नेह अब छलकता नहीं,
रिक्त हैं यह कुंभ सारे,

सड़ी हुई लकड़ी होती तो,
उग आते कुछ मशरूम,
किल्ले नहीं फ़ूटेंगे इसमें,
जान नहीं है ज़रा बाकी,

मन की अंतहीन गहराइयों में,
लगाती हूँ इक पुकार,
टकराकर आती नहीं वापस,
खो जाती है वहीं कहीं,

पल-पल बदलते हालातों से,
सिमटते जज़्बातों से,
बढ़ते हुये फ़ासलों से,
ख़ुद के मिट जाने से,
पता नहीं क्यूँ डरती हूँ।
- अनामिका

Friday, February 26, 2016

(27) "औरतें"

बहुत-बहुत दिनों के बाद मिल पाती हैं औरतें,
घरभर के काम-काज में उलझी रहती हैं औरतें,

प्रेम का हक़ भले न हो कर्तव्य पर निभाती हैं औरतें,
जाने क्या बँधन होता है जिसे हर हाल संवारती हैं औरतें,

आजकल दिल अपना कम ही खोलती हैं औरतें,
आँखों ही आँखों में बहुत कुछ कह जाती हैं औरतें,

बेटियों को गणित और विज्ञान में उलझाती हैं औरतें,
अपने सपनों को बच्चों की आँखों में सजाती हैं औरतें,

कितना कुछ सहती हैं फ़िर भी कम कहती हैं औरतें,
दिल में ज़ब्त करके बहुत मुस्कान बिखेरती हैं औरतें,

कभी वामपंथ तो कभी दक्षिणपंथ को गरियाती हैं औरतें,
अपने हालात में रत्तीभर भी बदलाव न कर पाती हैं औरतें,

कभी साड़ी-लहँगे, कभी जीन्स में टिकाई जाती हैं औरतें,
वक़्त, माहौल, देश, धर्म के अनुसार बदलाई जाती हैं औरतें,

कभी मोहरा, कभी देवी, कभी वेश्या बना दी जाती हैं औरतें,
सह-देख-सुन कर, तमाशा दुनिया का, चली जाती हैं औरतें।

(26) "गुंजाइश"

रिश्तों में भरम बना रहने दे,
ज़रा सी गुंजाइश बनी रहने दे,

रस्ते तो सबके कट ही जायेंगे,
ज़रा ये विश्वास बना रहने दे,

मन का मिलना न मिलना सही,
दुआ-सलाम तो ज़ारी रहने दे,

ज़िन्दगी पूछेगी सवाल आख़री,
कुछ बदी नेकी में तब्दील होने दे,

सब हैं परिंदे परदेशी, पर न क़तर,
आज यहाँ और कल वहाँ उड़ने दे,

पानी का बुलबुला है ज़िन्दगी,
कुछ अपन सुना, कुछ मुझे कहने दे।

Tuesday, December 29, 2015

(25) "मायके आयी हुई लड़कियाँ"

(डिस्क्लेमर:- अग़र रोना आ जाये तो मुझे मत कहना, अपने रिस्क पर पढ़ना)
मायके आयी हुई लड़कियाँ,
माँ से लिपट रोती हैं ज़ार-ज़ार,
पिता से करती हैं,
आँखों ही आँखों में बहुत सा दुलार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
बार-बार जाती हैं बाज़ार,
लाती हैं रंग-बिरंगी चूड़ियाँ काँच की,
खनखनाती हैं झिलमिलाती हैं हर बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
सोती हैं देर तक निश्चिन्त,
उठती हैं खाने की महक से,
अंतरमन में बसा लेती हैं खुशबू घर की,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
झाँकती हैं देर तक माँ की आँखों में,
चुनने लगती हैं उनमें बसे ख़्वाब,
बस वही जानती हैं सजाना उन ख्वाबों को,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
जानती हैं वापसी का दिन पक्का है,
धूप भर लेती हैं आँचल में अपने,
और रातों का लगा लेती हैं काजल,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
जी लेती हैं बचपन इक बार फ़िर से,
बन जाती हैं पापा की नन्ही गुड़िया,
और सीखती हैं खाना बनाना माँ से,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
मिल लेना चाहती हैं सबसे,
के ये मुलाक़ात आख़िरी हो जैसे,
यादें जमा करती हैं पल-पल बार-बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
सबकुछ छोड़ आती हैं दहलीज़ पर,
अपने संसार में जाकर जीती हैं,
जन्म लेती हैं फ़िर भी बार-बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
होती हैं बेहद ख़ूबसूरत कि,
उनके होंठों पर बसती है मुस्कुराहट,
आँखों में चमकते हैं सितारे कई,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
इनका यही अफ़साना है,
के ये संसार भी छूटे सदा,
वो संसार भी बेगाना है।
- अनामिका

Tuesday, December 22, 2015

(24) "अलख"

कितने ख़्वाब ग़ुमशुदा होंगे,
हसरतें कितनी खोई होंगी,
दिन कितने बोझिल होंगे,
कितनी रातें तुम रोयी होंगी,

ज़ख़्म अभी भी ताज़ा होंगे,
यादें कितनी न बासी होंगी,
मन कितनों के भारी होंगे,
कितनी रातें न सोयी होंगी,

औरत को इज़्ज़त न दे पायेंगे,
कैसे हिन्दुस्तानी कहलायेंगे,
न्याय समय पर नहीं हुआ,
फ़िर कैसी ये परिपाटी होगी,

प्रण लेकर ही बनाना होगा,
ऐसा समाज अब रचाना होगा,
हर लड़की दुर्गा का रूप बने,
अब हमें ही अलख जगानी होगी।

Saturday, December 19, 2015

(23) "बेख़ुदी"

ख़ुशियों का समंदर है,
या ग़म की ये गहराई है,
वादियों की ख़ामोशी है,
या मन की ये तन्हाई है,

तुमसे मिलने की ख़ुशी है,
या आलम-ऐ-बेरुख़ी है,
कुछ दूर तक तो साथ चल,
फ़िर इक ग़मग़ीन ज़ुदाई है,

तेरा नाम बड़ा ऊँचा है,
नाम लेना भी रुसवाई है,
ख़याल भर ही से तेरे,
कहीं शबनम मुस्कुराई है,

आग़ के दरिया में सम्हलना है,
या पार होना ही बेमानी है,
रूठ गयी है ज़िन्दगी तेरी,
या तेरा अंदाज़-ऐ-बेख़ुदी है।

Tuesday, December 8, 2015

(22) "बिसात"

ज़िन्दगी की बिसात पर,
ज़िन्दगी की बाज़ी क्या,
क्या होती है शोहरत,
होती है बर्बादी क्या,

ग़र मिल सके सुकूँ कहीं,
दो पल को ठहर जा,
किसी से थी मोहब्बत कभी,
उससे अब लड़ाई क्या,

समय का पहिया यूँ ही चले,
हर बात तेरे बस में नहीं,
कभी था इंतज़ार तुझे,
अब फ़िक़्र क्या रुसवाई क्या,

छू लेना है तुझको तेरा मकां,
फ़िर ज़ब्त क्या परेशानी क्या,
पानी है तुझको दौलत सच्ची,
अब अच्छाई क्या बुराई क्या।

Monday, December 7, 2015

(21) "चंद बातें दोस्तों से"

अपनी-अपनी दुश्वारियों से जूझते हम-आप सब,
कभी मिल बैठेंगे तो बतियाएंगे।

कुछ किस्से कहेंगे अपनों के, गैरों के,
गीत कुछ गुनगुनाएंगे।

ज़िन्दगी ख़ुदग़र्ज़ है, बुलाने पर नहीं आती,
मिलेगी जिस दिन, पकड़ बैठेंगे, मुस्कुरायेंगे।

दोस्तों का साथ और, अपनों की बात और,
कुछ जख़्म कुरेदेंगे, मलहम कुछ पर लगायेंगे।

मत समझना बड़े मज़बूत हो, ग़फ़लत में न जीना,
दिल के तार छेड़ेंगे तो, अश्क़ ढ़लक जायेंगे।

कहने का सलीक़ा हो तो, बातें भी फ़ूल बनें,
बताने से उसके, न जाने क्या-क्या मंज़र नज़र आयेंगे।

दिल से दिल मिल जाये, तो जीना आसान बने,
ग़ैरों में क़ूवत है मोहब्बत की, देखकर अपने भी शर्मायेंगे।

मत कर ऐहसान फ़रामोशी ऐ दीवाने इंसान,
उसको ही नहीं, एक दिन ग़म तुझको भी रुलायेंगे।

होगा हिसाब ज़िंदगी का तेरा भी, मेरा भी,
एक दिन फ़रिश्ते तुझको भी और मुझको भी, ले जाएंगे। 

Tuesday, December 1, 2015

(20) "पर्णपाती वन"

ओ पर्णपाती वन, 
क्या कहें तुम पर कविता,
कैसे करें गुणगान,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

देखकर लगता है तुम हो,
निष्ठुर,नीरस,
निर्भय, निर्द्वंध,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

सहना है तुमको,
सघन शीत औ हिमपात,
शेष है जीवन सुप्त,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

क्यों है प्रतीक्षा तुमको,
भंगुर है जीवन,
अनवरत है चक्र,
होते हो तैयार,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

तुम ही हो जीवनसार,
स्वयं में समाहित,
कण-कण में गर्भित,
समानुकूल प्रस्फुटित,
ओ पर्णपाती वन,
तुम ही हो मर्म।

Friday, November 6, 2015

(19) "तुम हो"

अंतहीन आकाश के विस्तार में तुम हो,
सागरों की अतल गहराईयों में तुम हो,
पर्वतों के हृदय की कोमलता में तुम हो,
जल-नृत्य करतीं सुनहरी किरणों में तुम हो,

तितली के पैरों से चिपके पराग में तुम हो,
पुष्पों में सुगंध और पल्लवों के रंग में तुम हो,
काँपती हथेली की झुर्रीदार सलवटों में तुम हो,
नन्हे शिशुओं की अकारण मुस्कानों में तुम हो,

मेरे ईश्वर, जब भी बुलाऊँ, मेरे साथ में तुम हो,
मित्र-सखा, माता-पिता, कण-कण में तुम हो।

Wednesday, October 28, 2015

(18) "सखी री"

"सखी री"
अंतस को मत बँटने दो,
मनपाश को कुछ खुलने दो,
मुक्त उड़ो अब नील गगन में,
पँखों को स्वयं फैलने दो,

ज्वाला अंतर की बुझ जायेगी,
दिया ज्ञान का जलने दो,
संबंध पाश को खुलने दो,
मन को अब मुक्त विचरने दो,

साथ सत्य का सदा ही देना,
अब झूठ की परतें खुलने दो,
पीड़ा अंतर की मिट जायेगी,
स्वयं को समर्पित होने दो,

कितना भागोगे, लड़ोगे कितना,
कर लो थोड़ा आराम अहो,
मत करो संघर्ष अब आज सखी,
कल के लिये भी कुछ रहने दो।

(17) "तुम"

मेरी सिन्दूरी शाम भी तुम हो,
मेरी पीली उजास भी तुम हो,
मेरी सुनहरी सुबह भी तुम हो,
मेरी चाँदनी रात भी तुम हो,

तुम बिन जीना सह पाऊँ कैसे,
तुम बिन अब मैं रह पाऊँ कैसे,
बालक बनकर आये हो तुम,
तुमको व्यक्ति बनाऊँ कैसे,

जबतक तुमको जाना न था,
मानो कुछ पहचाना न था,
हर कर्म समर्पित ईश्वर को,
स्वयं विधाता बन जाऊँ कैसे,

है यही पहचानी उधेड़-बुन,
हरपल गुनता रहता है मन,
मेरी इच्छा तुम भले न मानो,
परहित अवश्य पहचानो तुम।

Saturday, August 29, 2015

(16) "रक्षा-बंधन"

हमको लगता सबसे प्यारा,
भाई-बहन का रिश्ता न्यारा,

भाई बड़ा हो छोटी बहना,
बस उसके अब ऐश क्या कहना,
मनमानी चीज़ें मंगवाये,
रूठ जाये तो भाई मनाये,

बड़ी बहन हो छोटा भाई,
हर ग़लती पर डाँट लगाई,
नये-नये पकवान खिलाये,
भाई पर कोई आँच न आये,

जुड़वाँ हुये तो साथ ही खेलें,
मम्मी-पापा फूले न समायें,
कठिन प्रक्रिया इनका पालन,
एक लाड़ली, दूजा लालन,

घर में जब हों भाई-बहनें,
कभी कहीं न अकेले जायें,
लड़ते-झगड़ते, रूठें-मनायें,
मित्र बनें, दिल खुलते जायें,

रक्षा-बंधन है प्रेम का बंधन,
रिश्ते दिल से निभते जायें,
सामाजिकता का पाठ-पढ़ाते,
त्योहार हैं बस प्रतीक हमारे।

Tuesday, August 25, 2015

(15) "वर्षा ऋतु"

हरहर हरहर चले हवारा,
मौसम का कैसा है नज़ारा,
गहरे काले बादल छाये,
तूफां का अंदेशा जगाये,
मन मतवाला पँछी बनता,
बिना डरे ही गाता जाता,
ओ बादल आकाश के राजा,
थोड़ी वर्षा इधर करा जा,
हरी भरी चूनर सज जाये,
धरती माता ख़ुश हो जाये,
तपे हुये तन-मन खिल जायें,
लोग चाय और पकौड़ी खायें,
वर्षा ऋतु है बड़ी सुहानी,
एक बरस के बाद है आनी,
जीभर याद बसा लो मन में,
फिर ना कहना भीग न पाये।

Wednesday, July 22, 2015

(14) "जीवन"

उल्टे ही गिरे आकर धरती पर,
उल्टा ही चित्र दिखा दर्पण में,
उल्टा ही सँसार बना नयनन में,
उल्टा ही विज्ञान पढ़ा बचपन में,

सूर्य उदय होता पूरब से,
अस्त हुआ पच्छिम में,
आभासी क्षितिज, आभासी सँसार,
हर वस्तु है कम्पन में, गति में,

परिवर्तन चराचर में,
हम अचरज में, ठिठके,
चाहे मन थामना, किसको,
निहारता अपलक, अवलम्ब,

छोड़ना जटिल है, प्रक्रिया कठिन,
डिगना अहं का नहीं सरल,
मन विकल, पीता गरल,
त्याग देह, जाता निकल,

जीवन आलोड़न, मध्य शिव बिंदु दो,
प्रारंभ जिसका अंत से,
जन्म घटना, होती घटित,
युगों-युगों से, युगों-युगों तक,

न समझना इसे, सीधा है या उल्टा,
जीवन बस जीते जाना है,
क्या जी का कर पाना है,
जीवन बस जीते जाना है।

Friday, June 26, 2015

(13) "बारिशें"

बारिशें,
भिगोयें सारा आलम,
भिगोयें धरती औ गगन,

बारिशें,
महकाएँ अपनी ख़ुश्बू से,
मेरा मन तेरा मन,


बारिशें,
न जाने कहाँ से आयें,
शीतल कर जायें पवन,

बारिशें,
अनोखे अनकहे प्रेम की,
सफल कर जायें जीवन।

Monday, April 20, 2015

(12) "समझ रह गयी कच्ची है"

शून्य में मिलकर शून्य हुये सब,
साथ आये दस गुना गये बढ़,
एक मिले एक और एक से,
मिलकर हो गए एक,
गणित तो हमारी पक्की है, 
पर समझ रह गयी कच्ची है.

विपरीत मिले से हो आकर्षण,
समान मिले विकर्षण,
गुण सही मिले तो युग्म बने,
नहीं तो होता घर्षण,
भौतिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

जो चीज़ ज़रूरी है जीवन में,
वह मिले बहुत ही सस्ती,
पत्थर-मिट्टी बन जाते क़ीमती,
होती है उनकी हस्ती,
आर्थिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

परिकल्पना बनी, मिले आंकड़े,
सिद्ध हुये सिद्धांत,
जीवन चले न कल्पना से,
चाहिए उसे स्वाभिमान,
सांख्यिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

Sunday, April 19, 2015

(11) "पिता"

पिता बोता है सपने,
सुनहरे, रुपहले, सतरंगी, अनोखे,
रोज़,

पिता बढ़ता है वट सा,
छाया देता, पोषक, रक्षक,
रोज़,

पिता बदलता है सपने,
बच्चों के सपनों से,
रोज़,

पिता देता है उड़ान,
पंखों को, डोर जीवन की,
रोज़,

पिता मिटाता है रुकावट,
बनकर एक रुकावट,
रोज़,

पिता पी जाता है आँसू, विदा के
बसाकर बेटी को दिल में,
रोज़,

पिता सहता है पीड़ायें,
अनेक, प्रेम के बदले में,
रोज़,

पिता होता है इक बाग़बाँ,
देख कोंपलें ख़ुश होता है,
रोज़,

पिता चुकाता है क़ीमत,
ताक़तवर होने की,
रोज़,

पिता जिज्ञासा की कड़ी,
पहली, आधार ज्ञान का,
रोज़,

पिता खिलता है, बच्चों से,
मुस्कान से, खिलता है चेहरा जिसका,
रोज़,

पिता, पहला परिचय, संसार से,
वयस्क होने से पहले,
रोज़,

पिता साथ है, हमारे सदा,
हर रूप में, हर जगह,
रोज़.…

(हर संवेदनशील पिता को समर्पित)