दो अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करके देखना चाहती हूँ (समाजशास्त्र का मेरा कोई अध्ययन नहीं है, अलबत्ता अर्थशास्त्र थोड़ा-बहुत, मतलब परास्नातक स्तर तक पढ़ा है, यह तुलना मेरे "ऑब्जरवेशन" पर आधारित है)
जापान में वर्तमान में दो समस्यायें मुँह फैलाये खड़ी हैं, पहली है, "नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि", और दूसरी है, "वयोवृद्ध लोगों की संख्या कुल जनसँख्या की ४०% है"। लगभग हर दूसरा व्यक्ति इन समस्यायों पर चिंता जताता मिल जाता है। कुछ के अनुसार यह बहुत बड़ा ज़ुल्म है, कि कमाने वाली जनता उन लोगों का भी उत्तरदायित्व उठाये जो नहीं कमाते हैं। हाल ही में मेरी एक मित्र ने इसी प्रकार की बात की, तो मुझसे रहा नहीं गया, आख़िरकार मैंने उनका विरोध करते हुए कहा कि, जितने भी वयोवृद्ध लोग आपके यहाँ हैं, उन्होंने अपनी युवावस्था में आपकी अर्थव्यवस्था को सबल बनाने में अपना योगदान दिया है, कर(टैक्स) दिया है, साथ ही अपनी पेंशन के लिये भी स्वयं इंतज़ाम किया है, इसलिये आपकी यह चिंता स्वीकार्य नहीं है। जो पहली समस्या है, नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि की, वो एक बड़ी चिंता है, क्योंकि जब भविष्य में काम करने वाले हाथों की आवश्यकता पड़ेगी तो उसका इंतज़ाम कैसे होगा? यहाँ जनसँख्या का माध्य (एवरेज) प्रति परिवार १ बच्चा आता है, उसके बहुत से कारण हैं, जिनमें से एक निःसंतान दम्पत्तियों की बहुत अधिक सँख्या भी है, तथा "दत्तक पुत्र/पुत्री" (एडॉप्शन) का विकल्प न के बराबर (शायद शून्य)।
भारत की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। भारत में जनसँख्या वृद्धि अपनी सभी सीमाओं के पार जा चुकी है (भले ही हाल में वो रुक गयी है), तथा यह देश की अर्थव्यस्था को जितना नुकसान पहुँचा सकती थी, पहुँचा चुकी है। माल्थस तो अपने जनसँख्या के सिद्धांत में बता ही चुके हैं कि, "प्रकृति अपना बदला स्वयं ले लेती है", तो क्या आप वर्तमान समय में ऐसी किसी स्थिति की कल्पना या आकाँक्षा कर सकते हैं कि, "प्रकृति स्वयं अपना बदला ले?", कम से कम मैं तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहूँगी कि ऐसा कुछ हो। जितनी तीव्रता से भारत की "युवावस्था" आयी है उतनी तीव्रता से रोज़गार उत्पन्न करने में हम असफल रहे हैं। लेकिन, रोज़गार हो या न हो विवाह सबका करा दिया जाता है। विवाह संस्था का मूल-आधार संतानोत्पत्ति एवं उसका पालन-पोषण है (सारी दुनिया में)। अब वर्तमान भारत में जो १८% का "कामगार"(वर्क-फ़ोर्स) है उसके ऊपर कितना बोझ है आपको इसका अंदाज़ा लगना शुरू हो गया होगा। शिशु, बालक, स्त्रियाँ तथा वृद्धजन (जो प्रकटरूप से अर्थव्यवस्था में अपना योगदान नहीं कर रहे हैं) सबके भरण-पोषण का भार, वर्तमान "कामगार"(कार्यरत जनता) पर है। आशा है कि आप एक विस्तृत चित्र देख पाये होंगे। समाधान और कौन सी योजनायें प्रभावी होंगी, यह मैं नहीं जानती, परंतु इतना तो तय है, कि भारत को अपनी सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा, तथा यह भी समझना होगा कि अभी भारत की सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि वह "योगक्षेमं वहामि अहम्" कर सके।
जापान में वर्तमान में दो समस्यायें मुँह फैलाये खड़ी हैं, पहली है, "नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि", और दूसरी है, "वयोवृद्ध लोगों की संख्या कुल जनसँख्या की ४०% है"। लगभग हर दूसरा व्यक्ति इन समस्यायों पर चिंता जताता मिल जाता है। कुछ के अनुसार यह बहुत बड़ा ज़ुल्म है, कि कमाने वाली जनता उन लोगों का भी उत्तरदायित्व उठाये जो नहीं कमाते हैं। हाल ही में मेरी एक मित्र ने इसी प्रकार की बात की, तो मुझसे रहा नहीं गया, आख़िरकार मैंने उनका विरोध करते हुए कहा कि, जितने भी वयोवृद्ध लोग आपके यहाँ हैं, उन्होंने अपनी युवावस्था में आपकी अर्थव्यवस्था को सबल बनाने में अपना योगदान दिया है, कर(टैक्स) दिया है, साथ ही अपनी पेंशन के लिये भी स्वयं इंतज़ाम किया है, इसलिये आपकी यह चिंता स्वीकार्य नहीं है। जो पहली समस्या है, नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि की, वो एक बड़ी चिंता है, क्योंकि जब भविष्य में काम करने वाले हाथों की आवश्यकता पड़ेगी तो उसका इंतज़ाम कैसे होगा? यहाँ जनसँख्या का माध्य (एवरेज) प्रति परिवार १ बच्चा आता है, उसके बहुत से कारण हैं, जिनमें से एक निःसंतान दम्पत्तियों की बहुत अधिक सँख्या भी है, तथा "दत्तक पुत्र/पुत्री" (एडॉप्शन) का विकल्प न के बराबर (शायद शून्य)।
भारत की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। भारत में जनसँख्या वृद्धि अपनी सभी सीमाओं के पार जा चुकी है (भले ही हाल में वो रुक गयी है), तथा यह देश की अर्थव्यस्था को जितना नुकसान पहुँचा सकती थी, पहुँचा चुकी है। माल्थस तो अपने जनसँख्या के सिद्धांत में बता ही चुके हैं कि, "प्रकृति अपना बदला स्वयं ले लेती है", तो क्या आप वर्तमान समय में ऐसी किसी स्थिति की कल्पना या आकाँक्षा कर सकते हैं कि, "प्रकृति स्वयं अपना बदला ले?", कम से कम मैं तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहूँगी कि ऐसा कुछ हो। जितनी तीव्रता से भारत की "युवावस्था" आयी है उतनी तीव्रता से रोज़गार उत्पन्न करने में हम असफल रहे हैं। लेकिन, रोज़गार हो या न हो विवाह सबका करा दिया जाता है। विवाह संस्था का मूल-आधार संतानोत्पत्ति एवं उसका पालन-पोषण है (सारी दुनिया में)। अब वर्तमान भारत में जो १८% का "कामगार"(वर्क-फ़ोर्स) है उसके ऊपर कितना बोझ है आपको इसका अंदाज़ा लगना शुरू हो गया होगा। शिशु, बालक, स्त्रियाँ तथा वृद्धजन (जो प्रकटरूप से अर्थव्यवस्था में अपना योगदान नहीं कर रहे हैं) सबके भरण-पोषण का भार, वर्तमान "कामगार"(कार्यरत जनता) पर है। आशा है कि आप एक विस्तृत चित्र देख पाये होंगे। समाधान और कौन सी योजनायें प्रभावी होंगी, यह मैं नहीं जानती, परंतु इतना तो तय है, कि भारत को अपनी सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा, तथा यह भी समझना होगा कि अभी भारत की सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि वह "योगक्षेमं वहामि अहम्" कर सके।
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