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Thursday, March 31, 2016

"सैलानी परिंदे"

लंबी दूरी की यात्रा पर निकलने से पहले सैलानी परिंदे क्या-क्या तैयारी करते हैं एक बानगी:-
1. आकाश में सूरज व तारों की स्थिति देखकर सही वक़्त चुनते हैं।
2. धरती के चुम्बकीय क्षेत्र से सही दिशा का निर्धारण करते हैं।
3. पुराने पँख गिरा देते हैं, नए पँखों के आने का इंतज़ार करते हैं।
4. ख़ुराक बढ़ा देते हैं ताकि यात्रा के दौरान कम भोजन से भी काम चल सके।
5. हवा की धारा की दिशा में उड़ते हैं ताकि डैनों का कम इस्तेमाल करना पड़े।
6. अँग्रेज़ी के V आकार के समूह में उड़ते हैं। अगले सिरे पर उड़ने वाले पर सबसे अधिक बल लगता है, अतः उसका स्थान बारी-बारी से दूसरे पक्षी ले लेते हैं। (संगठन में शक्ति है)
7. प्रवास के दौरान प्रजनन नहीं करते। ☺
[सुर्खाब चकवा (ब्राह्मणी डक), लालसर (रेड क्रेस्टेड पोचार्ड), साइबेरियन क्रेन]
(कक्षा 6 की हिंदी की पुस्तक के पाठ पर आधारित)
मेरे द्वारा बच्चे को हिंदी भाषा से परिचित रखने के प्रयास

Wednesday, March 16, 2016

"प्रेम के बारे में" (5)

आप उम्रदराज़ हो चुके हैं और आप समझते हैं कि प्रेम के बारे में आप सबकुछ जानते हैं। क्या आपको लगता है कि प्रेम ज्ञान का विषय है और आप इसे उम्र के साथ सीखेंगे, क्योंकि ज्ञान तो अनुभवजन्य है ? क्या आपको लगता है कि यह सही दृष्टिकोण है ?
शायद नहीं।
प्रेम इन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय नहीं है अतः आप इसे समझने में चूक जाते हैं, सारी उम्र लगे रहते हैं इसकी ख़ोज में फ़िर भी हाथ ख़ाली रह जाते हैं। क्यों होता है ऐसा?
कुछ रिश्तों में आप अपना समय, पूँजी और भावनायें सब तिरोहित कर देते हैं परंतु अंत समय में उन रिश्तों से जो आपकी अपेक्षायें थीं वह पूरी नहीं होतीं हैं और आप इस दुनिया से अतृप्त चले जाते हैं। आप जानते हैं कि मैं ग़लत नहीं कह रही हूँ।
यहाँ आप मर्म समझ गये होंगे, कि जो प्रेम अपेक्षा के साथ होगा वह दुःख का कारण अवश्य बनेगा।
प्रेम में आपकी अपेक्षा होती है कि कोई आपको प्रेम करे, यह चाहना ही कष्ट का कारण है। आप अपनी स्वयं की प्रेम कर सकने की क्षमता से कितने परिचित हैं ? परिचित हैं भी या नहीं ? कहीं आप सौदेबाज़ी तो नहीं कर रहे हैं, कि तुम फलाँ तरह से बर्ताव करोगे/करोगी तब ही प्रेम होगा नहीं तो नहीं। यह तो किसी तरह से प्रेम नहीं है। यह आपके मन में बसा हुआ वह काल्पनिक स्वरुप है जिसे आप कल्पना में ही प्रेम कर रहे हैं और उसे वास्तविकता में देखना चाहते हैं। जबकि वास्तविकता तो वास्तविकता होती है।
- अनामिका

Monday, February 29, 2016

"जीवन की गति"

अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइये और आप पायेंगे कि जीवन की एक विशेष गति होती है। हर शहर, हर गाँव, हर देश की एक ख़ास गति। हम उस प्रवाह से अलग़ नहीं हैं। क्योंकि हम उस प्रवाह से अलग़ नहीं हैं, अतः जिस समय, स्थान और काल में हम उपस्थित हैं वहाँ हमारी अनुपस्थिति से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है। जो लोग आज आपके जीवन में हैं, जब वे नहीं थे तब भी आपका जीवन चल रहा था, जब वे नहीं होंगे तब भी आपका जीवन (यदि बाकी है तो) चलेगा। यही बात दूसरों पर भी लागू होती है, आप नहीं होंगे तब भी जीवन चलेगा, अपनी विशेष गति से। आपके पास अपने कर्मों का निर्वाह करते चले जाने के अतिरिक्त विशेष कोई अधिकार नहीं है। जो व्यक्ति इस सत्य से साक्षात्कार कर लेते हैं उनके लिये जीवन थोड़ा आसान हो जाता है।
अपने किये गये कर्मों पर भरोसा रखिये, प्रतिफल अवश्यम्भावी है, न रत्तीभर भी कम न ज़्यादा। धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा कीजिये।

Tuesday, February 23, 2016

"प्रेम के बारे में" (4)

प्रेम और उसका प्रदर्शन....
प्रश्न उठता है कई बार, कई-कई बार, कि क्या "प्रेम में प्रदर्शन" आवश्यक है? क्या "प्रेम का प्रदर्शन" आवश्यक है?
हाँ, आवश्यक है।
प्रेम का प्रदर्शन आवश्यक है, उससे, जिससे प्रेम है। प्रेम का प्रदर्शन दुनिया के लिये क्यूँ हो? दुनिया को क्या मतलब कि आप प्रेम में हैं या नहीं? यदि आप प्रेम में हैं तब तो यह स्वतः प्रकट है, प्रेम में होने के भौंडे प्रदर्शन की आवश्यकता क्या है?
क्या आप नहीं चाहते कि जो आपसे प्रेम करे वो जता भी दे।
कई बार लोग कहते पाये जाते हैं कि हम कोई "माइंड रीडर" थोड़े ही हैं जो बिना कहे समझ जायें। सही भी है, बिना कहे कोई कैसे जाने।
आमतौर पर कहा जाता है कि पहेलियाँ बुझाना अधिक लोगों को पसंद नहीं होता, जो बात है वो सीधे तौर पर कही जानी चाहिये, है कि नहीं!!!
लेकिन प्रेम का मामला तो बड़ा टेढ़ा है, सीधे कैसे कह दिया जाये, समझने की बात है, अब समझा कैसे जाये। बहुत चक्कर है।
प्रेम के सार्वजनिक प्रदर्शन का जग दीवाना हुआ लगता है, अतः प्रेम में होना आवश्यक नहीं रह गया, उसका प्रदर्शन ही आवश्यक है शायद।

"प्रेम के बारे में" (3)

प्रेम के बारे में अक्सर लोग भ्रान्ति का शिकार होते हैं।

कुछ लोग हीन भावना से ग्रस्त होते हैं और अक्सर यह कहते पाये जाते हैं कि मुझसे कौन प्यार करेगा, मुझसे कोई क्यूँ प्यार करेगा, मुझमें ऐसा क्या है कि कोई प्यार करे। ऐसे लोगों को कभी अपने रूप-रंग पर शक़ होता है, कभी अपनी योग्यता पर, और प्यार किये जाने को एहसान तक मान लेते हैं।
वो गाना सुना है ना "मैंने प्यार किया" का..
"तुम मान इतना जो दे रहे हो, मुझ पे ये एहसान है"
गीत के ये बोल कहाँ से आ गये...कहीं न कहीं हीन भावना समाज में व्याप्त है, जिसका लोग अलग़-अलग़ तरह से फ़ायदा उठाते हैं। ऐसे लोगों को प्यार मिल जाता है तो वो अभिभूत हो जाते हैं।

अब दूसरी तरह के लोगों की बात करते हैं, जो ये समझते हैं कि प्यार उनका अधिकार है। ऐसे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं क्योंकि बचपन से उन्हें माता-पिता, अध्यापकों, परिजनों और मित्र-सखाओं का स्नेह व प्यार मिलता रहता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में बड़े होने पर वह हमेशा समझते हैं कि यह परिवेश सदा बना रहेगा, पर ऐसा होता नहीं है। पहला झटका ही काफ़ी होता है इनके लिये। छोटी सी भी अस्वीकार्यता उनसे सहन नहीं होती है।

इन दोनों ही स्थितियों में एक बात समान है, दोनों ही प्रकार के लोग स्वयं की प्रेम करने की क्षमता से अनभिज्ञ होते हैं। हीनभावना से ग्रस्त लोग यह नहीं जानते कि वो प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं, बशर्ते कि वो अपनी इस क्षमता से परिचित हों। अहंकार से ग्रस्त लोग हमेशा समझते हैं कि प्रेम उन्हें हमेशा प्रदत्त होगा, वो कभी जान ही नहीं पाते हैं कि वो स्वयं किस सीमा तक प्रेम कर सकते हैं। दोनों ही बेचारे ग़रीब होते हैं, कभी-कभी ऐसे ही इस जीवन को त्याग चले भी जाते हैं।

Wednesday, February 10, 2016

"प्रेम के बारे में" (2)

परस्पर निर्भरता ही संबंधों का आधार है। प्रेम का इस आदान-प्रदान में कोई योगदान नहीं है। (Relations are purely based on give and take, name any relation existing, existed, will exists).
यदि आप स्वतंत्र जीवन जीने के आदी हैं और स्वतंत्र जीवन ही जीना चाहते हैं तब आपको विवाह जैसे किसी बंधन में नहीं बंधना चाहिये।
हाल ही में एक मूवी देखी, "तमाशा", उसकी कहानी में भी नायक-नायिका यही सोच रखते थे। दोनों आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर थे, स्वतंत्र थे, फ़िर वो एक-दूसरे के साथ सम्बंध में भी बंध जाते हैं, लेकिन प्यार तो होता ही नहीं है, या यूँ कहें कि प्यार होता है पर देख नहीं पाते। अपनी-अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीने लगते हैं पर ख़ुश नहीं हैं।
कहाँ है ख़ुशी?
प्यार में है जीवन की ख़ुशी।
अब ये प्यार क्या बला है?
प्यार वो स्वतंत्रता है जो आप ख़ुद के लिये नहीं अपने साथी के लिये तलाशते हैं, और आपका साथी जानता/जानती है कि आप उस पर और उसकी ख़ुद की खोज पर विश्वास करते हैं। जब दोनों एक-दूसरे के लिये यह तलाश करते हैं तब प्यार प्रकट होता है। हो सकता है इस क्रम में आप सबकुछ खो दें।यही प्यार में सबसे बड़ा भय है, खो देने का भय, कभी-कभी ख़ुद को भी और साथी को भी।
"इक आग़ का दरिया है, और डूब के जाना है"

"प्रेम के बारे में" (1)

एक गीत की पंक्तियाँ याद आ गयीं,
"जो मैं ऐसा जानती, कि प्रीत किये दुःख होए,
नगर ढिंढोरा पीटती, कि प्रीत न करियो कोए..."

बहुत दिनों से सोच रही थी कि क्या लिखूँ प्रेम के बारे में, जितने लोग उतनी बातें, उतनी तरह से। हर कोई प्रेम को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है।
किसी के लिये प्रेम तपस्या है,
किसी के लिए सारे जीवन की साधना,
किसी के लिये जीवन का सार है,
किसी के लिये जीने का आधार है,
किसी के लिये समर्पण,
किसी के लिये सर्वस्व त्याग है।
न जाने कितने कवि, कितने साहित्यकार प्रेम को परिभाषित कर-कर के सिधार गये, पर ये आज भी एक जटिल पहेली बना हुआ है। नयी पीढ़ी भी इसे उन्हीं पुराने प्रतीकों के माध्यम से परिभाषित करना चाहती है, इसका अर्थ ये लिया जा सकता है कि प्रतीक शाश्वत हैं अतः प्रेम भी शाश्वत ही होगा, यानी कि ये दुनिया कभी प्रेम से खाली न होगी, प्रेम सदा विजयी होगा।

Tuesday, February 2, 2016

"कानपुर स्मार्ट सिटी है"

कानपुर को स्मार्ट सिटीज़ की लिस्ट में नहीं चुना गया इस बात से हम सभी दुःखी भी हुये और क्रोधित भी। कुछ लोगों की प्रतिक्रियायें तो इस प्रकार लगीं जैसे किसी एग्जाम में फ़ेल हो जाने पर घर वाले बच्चे को ही डाँटने-डपटने लगते हैं कि तू है ही नालायक, तेरा कुछ हो ही नहीं सकता (मसलन, कानपुर हमेशा से ही गन्दा है, यहाँ के लोगों में सिविक सेंस नहीं है, आदि आदि)।
क्या आप भी ऐसी ही नकारात्मक सोच रखते हैं? यदि हाँ तो ज़रा ग़ौर फरमाइये:-
1. आज़ादी की लड़ाई की चिंगारी सुलगाने वाला शहर है कानपुर, ये शहर न होता तो आज हमारा संविधान न होता। अँग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद हो गये तो क्या गन्दगी और लाचारी दूर न कर सकेंगे?
2. अनेक डॉक्टर, इंजीनियर, IAS, IPS, वक़ील, शिक्षाविद, साहित्यकार, गायक, व्यापारी, उद्यमी, कानपुर से ही निकले हैं और दुनियाभर में छाये हैं। अग़र कानपुर में लाखों बुराइयाँ ही हैं तो यह कैसे संभव हुआ?
3. पूरे उत्तर प्रदेश में महिलाओं की साक्षरता का प्रतिशत भी सबसे अधिक कानपुर में ही है। ~71%, क्या शिक्षित महिलायें सहयोग न करेंगी?
किसी प्रतियोगिता में चयन हो पाना या न हो पाना कई कारणों पर निर्भर हो सकता है परंतु इसका अर्थ यह नहीं है हम सब आत्महीनता की भावना से ग्रस्त हो जायें, और ख़ुद को ही ख़री-खोटी सुनाने लगें।
यदि आपको शहर के प्रशासन व रख-रखाव में अनेक समस्यायें दिखती हैं तो कृपया स्वयं से भी पूछें कि क्या सही जगह सवाल उठाये गये हैं? यदि नहीं, तो क्या अब सवाल नहीं उठाये जाने चाहियें? ख़ुद से भी पूछिये, कितना बदला है ख़ुद को?
क्या बिना सरकारी सहायता के हम स्मार्ट नहीं हो सकते?

"सबसे बड़ा दुःख"

जानते हैं जीवन में सबसे बड़ा दुःख क्या होता है?
जीवन में सबसे बड़ा दुःख है बिछड़ना, बिछुड़ना, विछोह, बिछोह, दूरी। अपने प्रियजनों से दूरी की कल्पना मात्र से ही आप द्रवित हो उठते हैं। यहाँ तक कि कोई अपने प्रियजनों से दूर होने की बात भी आपको बताये तो आप घंटों तक रो सकते हैं, हाल ही में एक मित्र ने 10 वर्ष की आयु में हॉस्टल जाने और माँ से बिछड़ने का ज़िक्र किया और मुझे ख़ूब रुलाया, लेकिन ऐसे में ही आपको कुछ शक्तिशाली और सहनशील प्रियजन भी याद आते हैं जो अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रख सकते हैं। कैसे कर पाते हैं वो ऐसा? इसे एक उदाहरण से समझते हैं:-
जब छोटे बच्चे पहली बार स्कूल जाना शुरू करते हैं तो आपसे अलग़ होने से एहसास मात्र से ही वो रोने लगते हैं, ऐसा सिलसिला दो-चार दिन तक चलता है फ़िर सब सामान्य हो जाता है। क्यों? ऐसा इसलिये होता है कि आप जानते हैं कि आप जो कर रहे हैं उसके भले के लिये कर रहे हैं (separation anxiety), :) नहीं।
ऐसा इसलिये होता है क्योंकि आप जानते हैं कि हर व्यक्ति इस जगत में एक यात्री है, फ़िर चाहे वह आपका पुत्र या पुत्री हो या मित्र या प्रियजन। आगे की यात्रा उसका विधान है।
जब हम यहाँ (जापान) रहने आये थे हम नहीं जानते थे कि कितने दिन या कितने साल यहाँ रहना है। भाषा भी नहीं जानते थे। किसी से भावनात्मक सम्बन्ध बनेंगे इसकी आशा भी न की थी और आवश्यकता भी नहीं लगी। लेकिन फ़िर भी लोगों से मिलना-जुलना हुआ और जुड़ाव भी हो गया, अब यह जुड़ाव ही तो आधार है ना। मेरे इस ज़िक्र भर से ही कि मैं वापस चली जाऊँगी, मेरी सहेलियों की आँखें भर आती हैं। ऐसे में, मैं ख़ुद को बहुत विचित्र स्थिति में पाती हूँ, क्योंकि इस विछोह की पीड़ा के कारण को समझ जाने के कारण मैं दुःखी नहीं हो पाती हूँ। हम यात्री हैं और साथ होने का यही परिणाम है।
यह हम सभी समझते हैं कि भौगोलिकरूप से दूर हो जाने पर कई सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं, कई सम्बन्ध सुप्त हो जाते हैं, और कई सम्बन्ध बने रहते हैं। अतः कौन सा सम्बन्ध किन नयी ऊँचाइयों को छुऐगा, कौन सा सम्बन्ध दुःख का कारण बनेगा, यह पहले से कहा नहीं जा सकता। कोशिश कीजिये कि जिससे भी मिलिये प्रेमपूर्वक मिलिये। लोग आपको भूल जायेंगे, पर आपके व्यवहार को कभी नहीं भूलेंगे (व्यवहार की कई गलतियाँ मुझसे हो चुकी हैं)।

Friday, January 29, 2016

श्री पारीक जी की सलाह पर घरेलू कचरे के प्रबंधन से सम्बंधित कुछ अनुभव साझा कर रही हूँ:-
ये कुछ आसान उपाय हैं जिन्हें यदि हम चाहें तो रोज़ाना व्यवहार में ला सकते हैं।
1. कोशिश करें कि पॉलिथीन बैग्स का इस्तेमाल कम से कम करें। अपने हैण्ड बैग में एक फोल्डिंग बैग/कपड़े का बैग साथ रखें, अक्सर बाहर से आते वक़्त हम कुछ न कुछ फल या सब्जियाँ ख़रीद लाते हैं और बैग न होने पर पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल कर लेते हैं जोकि बाद में कचरे में ही जाता है।
2. कानपुर परिवर्तन फोरम के लोग कोई चार्ज नहीं लेते हैं गार्बेज कलेक्शन के लिये, मेरे विचार से वो उन घरों से पुराने अख़बार और पेपर वेस्ट को कलेक्ट कर सकते हैं। पुराने अखबार/पेपर वेस्ट लिफ़ाफ़े बनाने के काम में आते हैं या रीयूज़/रीसेल कर सकते हैं।
3. घर में कम से कम 2 डस्टबिन रखें। किचन वेस्ट और एक्स्ट्रा वेस्ट घर से ही सेपरेट हो कर जाये।
4. कानपुर परिवर्तन फोरम में अधिक से अधिक मेंबर्स जोड़े जायें ताकि मेंबर्स तो यह अच्छा कार्य करने में सहयोगी हों।
5. याद रखिये इस काम में सहयोग करके आप वास्तव में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। स्वच्छता हमारे बच्चों के भविष्य लिये अच्छी है। बच्चों को इस प्रक्रिया में सहयोगी बना लीजिये, बच्चे कभी निराश नहीं करते।
(आप सभी के सुझाव आमंत्रित हैं 😊)
Cleanliness Counts
"Waste reduction is the best solution to waste management"
कचरे को कम करने के कुछ उपाय:-
1. प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम करें।
2. प्लास्टिक के कप या ग्लास में गर्म चीज़ें पीने से कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। (यदि ये जानकारी ग़लत है तो कृपया संशोधन कर दें)। मिट्टी के कुल्हड़ या सकोरे के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाये।
3. डिस्पोज़ेबल चीज़ों का इस्तेमाल कम से कम करें।
4. प्लास्टिक के बर्तनों में रखकर कभी कोई चीज़ माइक्रोवेव न करें। प्लीज़।
5. सफ़ाई कर्मचारी को भी इंसान ही समझें, उसके लिये काम न बढ़ायें ☺

इस फ़ोरम से जुड़े हुये लोगों में से 100% लोग ये चाहते होंगे कि कानपुर की सड़कें, गलियाँ, पार्क, पब्लिक स्पेस सब एकदम साफ़-सुथरा हो।
1. क्या आप ईमानदारी से जवाब दे सकते हैं कि कितने लोग "अपने घर" की सफ़ाई ख़ुद करते हैं ?
2. आपके घर की सफ़ाई कौन करता है/करती है, और उस सफ़ाई में आपका क्या और कितना योगदान है?
3. इस बात की संभावना अधिक है कि आप शहर के एक बड़े हिस्से में रहते हैं जबकि आपका सफ़ाई कर्मचारी शायद बहुत ही छोटी सी जगह में रहता है, शहर के प्रति उसकी जवाबदेही कम बल्कि आपकी ज़्यादा है।
4. सफ़ाई करने से सफ़ाई नहीं होती, सफ़ाई रखनी पड़ती है। सफ़ाई एक सुविधा नहीं बल्कि ज़रुरत है। सफ़ाई एक आदत है।
5. सफ़ाई का कोई विकल्प नहीं है।
"Change begins at home"

"लड़का होगा या लड़की होगी"

प्रकृति ने मनुष्य को दो रूपों में बनाया है। लड़का या लड़की।
माँ बनने जा रही हर लड़की के मन में यह जानने की उत्सुकता होती है कि उसके गर्भ में पल रही संतान लड़की है या लड़का है। इस विषय पर तीन अलग़-अलग़ देशों के संदर्भ देखते हैं।
1. भारत से सुदूर पश्चिम (अमेरिका):-
यहाँ माता-पिता बनने जा रहे दम्पति को डॉक्टर पहले ही बता देते हैं कि आपके घर बेटी आने वाली है या बेटा। (आज ही अपने एक मित्र दम्पति से हुई बातचीत के आधार पर कह रही हूँ) ये बात वैसे भी अनेक मित्रों के लिये नई नहीं है क्योंकि आपमें से अनेक लोग इस प्रैक्टिस से परिचित हैं।
A) मेरी जिज्ञासा यह है कि जेन्डर डिफरेंस में विश्वास न करने वाला देश इस प्रकार की प्रैक्टिस क्यों करता है?
B) बेटा हो या बेटी हो, यह बात पैदा होने के बाद ही पता चले तो उसके क्या नुकसान हैं, पहले जानकारी होने के क्या फ़ायदे हैं?
2. भारत :-
भारत में लिङ्ग परीक्षण अवैध है। अतः सामान्य तौर पर यह जानकारी सिर्फ़ डॉक्टर को ही होती है कि गर्भ में पल रही संतान लड़की है या लड़का है।
A) मेरी जिज्ञासा है कि भारत के कई परिवारों में आज भी नवजात शिशु के पैदा होने से पूर्व ख़रीदारी करने का रिवाज़ नहीं है। ऐसा करने के पीछे वजहें क्या हैं और ऐसा करने के फ़ायदे क्या हैं?
3. सुदूर पूर्व (जापान):-
जापान भी अमेरिका के नक़्शे-क़दम पर चलता है और यहाँ भी अजन्मे बच्चे का जेंडर बता देते हैं।
इसके फ़ायदे क्या हैं यह तो नहीं जानती, लेकिन एक नुकसान ज़रूर देखा है। दो वर्ष पूर्व एक बांग्लादेशी मित्र थीं यहाँ, एक बच्ची की माँ, दुबारा माँ बनने वाली थीं, मुझे ख़रीदारी करती हुयी मिलीं और मैंने बधाई व भविष्य के लिये शुभकामनायें दीं तो वो उदास हो गयीं कि फ़िर से बेटी है। उस वक़्त मुझे इस प्रकार की पूर्व जानकारी का कोई औचित्य समझ में नहीं आया।
जहाँ तक जापानियों का प्रश्न है, मुझे लगता है कि पूर्व जानकारी से उन्हें कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता है, यहाँ वैसे भी बच्चों की जनसँख्या अनुपात में काफ़ी कम है।

Monday, January 18, 2016

हेल्थ-टिप्स

आज आप सभी के साथ कुछ हेल्थ-टिप्स शेयर करने जा रही हूँ, हालाँकि मैं ख़ुद ऐसा नहीं मानती कि मैं 100% सही ही कह रही हूँ। ये टिप्स "अन्य बातें सामान रहने पर" की assumption के साथ ही काम करेंगे।
१. हमेशा ताज़ा: नियम बना लें कि बासी भोजन को हमेशा के लिये ना, और इस नियम का कड़ाई से पालन करें, जैसे ही आपने यह नियम तोड़ा आपका वज़न बढ़ना शुरू हो जायेगा, जिसे कण्ट्रोल करना टेढ़ी खीर है। केवल ताज़ा भोजन ही करें। स्वास्थ्य की कोई समस्या नहीं होगी। ताज़े भोजन का अर्थ है, अच्छी तरह साफ़ किया हुआ भोजन। इसलिये अपने भोजन की ज़िम्मेदारी आपको ख़ुद ही ले लेनी चाहिये, दूसरा व्यक्ति पता नहीं क्या बनाकर दे।
२. शाकाहार: मैं पूर्णतया शाकाहारी हूँ। शायद स्लिम रहने में शाकाहारी होना काफ़ी मददगार है। सर्दियों के मौसम के अलावा तला-भुना खाना खाने में परहेज़ ही करती हूँ।
३. मीठे हो लिमिटेड: मैं ख़ुद को लकी मानती हूँ कि मीठा खाना अधिक पसंद नहीं, चाय ज़रूर मीठी ही पीती हूँ। मीठा पसंद करने वालों के लिये weight control अधिक कठिन प्रक्रिया है। उन्हें चाहिये कि वो मीठे ड्राई फ्रूट्स से काम चलायें।
४. बाज़ारी चीज़ों से परहेज़: जो चीज़ें एक ही प्रकार के तेल में बार-बार तली जाती हैं,(बाज़ार की चीज़ें) उस तेल में बार-बार गर्म किये जाने के कारण हानिकारक केमिकल reactions होती हैं, ये हमारे शरीर के स्वास्थ्य के लिये बहुत ही हानिकारक हैं, अतः परहेज़ करें।
५. प्रकृति के क़रीब रहें: बनावटी/आर्टिफिशल चीज़ों और लोगों से दूर रहें, अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार चलें। ज़रूरी नहीं कि जो चीज़ मुझे सूट करती हो आपको भी करे। जितना हो सके साधारण और सरल जीवनशैली अपनायें।
६. व्यायाम: मनुष्य का शरीर चलने-फिरने के लिये बना है। पैदल चलना, सीढ़ियाँ चढ़ना, साइकिल चलाना, रस्सी कूदना, तैरना, बैडमिंटन खेलना, योगा-प्राणायाम-ध्यान, इत्यादि, यानि की, जो भी आपसे हो सके वो व्यायाम करें, कम से कम व्यायाम करना है इस बात का स्ट्रेस मत लें। मस्त रहें।
७. हॉबीज़: ख़ुद को किसी न किसी हॉबी में बिज़ी रखें। यह हमें ओवरईटिंग से बचाता है।
८. नवब्याहता: नयी-नयी शादी के बाद स्लिम से स्लिम लड़कियों से साथ वेट issues होने लगते हैं, उसका सबसे बड़ा कारण होता है कि वो कई बार संकोचवश खाने के मामले में ना नहीं कह पाती हैं और घरवालों से हार जाती हैं, उन सभी से मेरा एक निवेदन है, आपका शरीर आपकी पहली ज़िम्मेदारी है, अतः दृढ़ता से काम लें। "पहला सुख, निरोगी काया"
९. डाइटिंग: किसी के कहने पर अचानक से कोई नयी डाइटिंग मत शुरू करें, ख़ासकर लड़कियाँ। आपका एंडोक्राइन सिस्टम बहुत ही नाज़ुक होता है, वातावरण के हल्क़े से हल्क़े सिग्नल को भी पकड़ लेता है और फ़िर आपका शरीर उसी प्रकार प्रतिक्रिया देता है। अतः हर काम साधारण तरीके से करें, किसी भी प्रकार की अति से बचें। याद रखिये कि शरीर को किसी पुरानी आदत को छोड़ने या नयी आदत अपनाने में कम से कम २१ से ४० दिन का समय लगता है।
१०. नींद: भरपूर नींद लें। जल्दी सुबह उठना स्वास्थ्य के लिये निःसंदेह लाभकारी है, कैसे मैनेज होगा ये आप स्वयं निर्धारित कीजिये। अच्छे स्वास्थ्य के लिये यह कोई बहुत बड़ी कीमत नहीं है।
निष्कर्ष:- अच्छी बातें हम सभी को लगभग पता हैं, जो इनका पालन कर पाता है वही राजा है, उसका अपने शरीर की गतिविधि पर काफ़ी हद तक कण्ट्रोल होता है।

"परिवर्तन सृष्टि का नियम है।"

हम सब में से अधिकाँश लोग उदासी के दौर से गुज़रते हैं, कुछ समय के बाद सबकुछ सामान्य हो जाता है। इस अवस्था के अनेक मनोवैज्ञानिक और क्लिनिकल कारण हो सकते हैं परंतु मेरे विचार से, इन कारणों में जो सबसे सामान्य कारण है, वह है अवस्था परिवर्तन को स्वीकार न कर पाना( refusal to change, inertia)।
आपने छोटे बच्चों को कम ही उदास देखा होगा, उसका कारण है कि छोटे बच्चे अवस्था परिवर्तन को सहजरूप से स्वीकार कर लेते हैं, फ़िर क्या कारण है कि बड़े लोग ऐसा नहीं कर पाते? उम्र में बड़े होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि हम हर स्थिति को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि आराम की जो भी स्थिति निर्मित हो गयी है उसमें रत्ती भर भी बदलाव न आये। दिन-पर-दिन हमारी अवस्था परिवर्तन को स्वीकार कर सकने की क्षमता कम होती जाती है और साथ ही हमारे सब्र का बाँध भी टूटने लगता है। नतीज़तन हम एक हताश व निराश व्यक्ति में बदलने लगते हैं। आप स्वयं देखिये, उचित क्या है? अवस्था परिवर्तन के साथ स्वयं को ढ़ालना या बदलने से इंकार करना? यहाँ आपको यह याद रखना होगा कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है और इस नियम में सृष्टि वज्र समान निष्ठुर है। परिवर्तन तो होकर ही रहता है, आप चाहें या न चाहें। जिसने जन्म ले लिया, वह सदैव शिशु बनकर तो नहीं रह सकता, उसे हर अवस्था से गुज़रना ही पड़ेगा, उसके चाहने या न चाहने से कुछ अंतर नहीं पड़ता। अब यह निर्णय आपको करना है कि आपको प्रकृति/सृष्टि के साथ चलना है या उसके विपरीत। इसका उत्तर आप भलीभाँति जानते हैं।

Friday, December 11, 2015

"ख़ुशी कहाँ है?"

कल किसी ने इनबॉक्स में पूछा "ख़ुशी कहाँ है?", मैं मन ही मन मुस्कुरायी, अजी ये तो शाश्वत प्रश्न है, सदियों से ज्ञानीजन यही तो ख़ोज रहे हैं।
अच्छा प्रश्न है ना मित्रों, इसके उत्तर में कुछ बिंदु यहाँ रख रही हूँ, आप इस सूची को विस्तार दें। (आज प्रवचन देने के मूड में हूँ, मन न हो तो आगे मत पढ़ना)
1. ख़ुशी आपका प्रथम और जन्मसिद्ध अधिकार है।
2. ख़ुशी आपकी नितान्त व्यक्तिगत संपत्ति है, किसी दूसरे से इसका कोई ख़ास लेना-देना नहीं, जबतक आप स्वयं न चाहें।
3. ख़ुशी हाथ में उठाई हुई रेत के असंख्य कणों जितनी असीम है, बस इसे पकड़ने की कोशिश मत करना, सब सरक जायेगी, कुछ कण ही चिपके रह जायेंगे।
4. ख़ुशी जल की शीतलता में भी है और उसकी गर्माहट में भी, वक़्त-वक़्त की बात है।
5. ख़ुशी का आपकी बौद्धिकता, पद, प्रतिष्ठा, सम्पन्नता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है, सत्य से इसका सीधा सम्बन्ध ज़रूर है, आप जितना अधिक झूठ बोलेंगे उसी अनुपात में नाख़ुश रहेंगे। यदि आप ये समझते हैं कि आपके झूठ को पकड़ने वाली कोई मशीन ही ईज़ाद नहीं हुई आज तक, मतलब कि आप बहुत स्मार्ट हैं, तो भइया आपका दिल बहुत ज़ल्द इसका जवाब आपको देने वाला है।
6. ख़ुशी आपका चयन है, आपके पास दूसरा विकल्प भी नहीं, दुःख-तकलीफ़ की कहीं कोई कमी नहीं, आपकी सोच पर ही सब निर्भर करता है।
7. हर बार हर चीज़ आपके अनुसार नहीं हो सकती, लाख़ परहेज़ से रहिये, कुछ-न-कुछ तो लगा ही रहेगा ना, "टेक इट ईज़ी (Take it Easy)"।
8. Keep it Simple Silly (KISS) ये अपना लें तो काफ़ी हद तक ख़ुश रहा जा सकता है।
9. शांत मन ही ख़ुश रहता है, मन को शांत रखने के प्रयास करने न छोड़े। इस रास्ते पर मित्र हमारे सबसे बड़े साथी होते हैं, उतार-चढ़ाव सबकी ज़िन्दगी में आते हैं, आप अकेले नहीं।
10. अंतिम मार्ग जो ख़ुशी के रास्ते पर ले जाता है, वो "आराधना" का मार्ग है, या तो अपने कर्म से प्रेम करिये, या जिससे प्रेम हो उसके लिये कर्म करिये, तभी आप ख़ुश रह सकेंगे। ना ही आप प्रेम करना चाहते हैं, ना ही आप कर्म करना चाहते हैं तो ये प्रश्न पूछना बंद कर दीजिये कि, ख़ुशी कहाँ है? अरे भई ख़ुशी का मन, जहाँ मन किया चली गयी, कोई आपकी ग़ुलाम थोड़े न है।

Tuesday, December 8, 2015

भारत के शहरों में प्रदूषण

प्रदूषण आज के शहरी जीवन की सच्चाई है। क्या आपने कभी गंभीरता से सोचा है कि हम इस भयावह सच्चाई तक कैसे आ गये? (यह लेख भारत के शहरों के सन्दर्भ में है)।
भारतीय होने के नाते हम सब जानते हैं कि हमारे दैनिक जीवन में, हमारे खान-पान, रहन-सहन, भाषा-व्यवहार आदि में प्रतीकों का कितना अधिक महत्त्व है। आधुनिकता की अंधी-दौड़ हमें कहाँ ले आयी है। क्या आपको लगता नहीं कि यही सही समय है, जब कुछ पल ठहरकर दिशा निर्धारित की जाये?
भारतीय होने के नाते हमने, बरगद-पीपल पूजे (इनके औषधीय गुणों की छानबीन कीजिये, आप अवश्य सहमत हो जायेंगे कि इन्हें पूजना ही चाहिये), नाग को हमने देवता माना (नाग-पँचमी का त्योहार मनाया ताकि अकारण इनका वध न हो), भगवान शंकर के गले में सर्प, शीश पर चंद्र, और जटाओं में गँगा की अवधारणा की, (इन्हें पूजनीय बनाया ताकि हम इनके महत्व को सदैव याद रखें), खेतों पर हल चलाने से पहले उसकी पूजा की, घर बनाने से पहले "भूमि-पूजन" किया। गज (हाथी), वानर (बंदर), मूषक (चूहा), उलूक (उल्लू), मयूर (मोर), वाराह, मत्स्य, क्या-क्या गिनेंगे, हमने इन्हें प्रतीक बनाया ताकि हमें याद रहे। कमल-नारियल आदि वनस्पतियाँ भी हमारे प्रतीकों में सम्मिलित रहे। कभी आपने वास्तव में सोचा है कि ये प्रतीक, अंधविश्वास के प्रतीक न होकर हमारी पर्यावरण के प्रति जागरूकता को इंगित करते हैं।
आज भी हमें कहा जाता है कि सोकर उठने पर धरती पर पैर रखने से पहले, धरती माँ की चरण-वंदना करनी चाहिये, यह हमारी कृतज्ञता का द्योतक है या अंधविश्वास है, यह निर्णय आप स्वयं करें।
सुबह सबसे पहले अपने दोनों हाथों की हथेलियों को प्रणाम करना क्या इस बात का द्योतक नहीं कि हम कर्म-प्रधान सभ्यता हैं?
आज भी नदी में स्नान करने जाने पर नदी के जल को स्पर्श करके नदी को प्रणाम करते हैं, क्या हमें नदी का कृतज्ञ नहीं होना चाहिये?
यदि हम इस वैज्ञानिक सोच वाली संस्कृति के अंग हैं तो क्या कारण है कि आज भारत के शहर रो रहे हैं? भूमि (कचरा), वायु (धुँआ-धूल, कीटाणु), जल (विषाणु, केमिकल वेस्ट), भोजन (हर चीज़ में मिलावट), आकाश (अनेक प्रकार की तरंगें), जिन 5 तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है, हर उस तत्व को हम सब ने मिलकर प्रदूषित कर दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारा "लालची स्वभाव" है। अभी हम एक विकासशील देश हैं, अभी हमारी जेबें इतनी नहीं भरी हैं कि हम हर स्तरीय वस्तु का उपभोग कर सकें, फलस्वरूप, हमारे देश में हर वस्तु " सेकंड या थर्ड ग्रेड" की ही आती है, फिर चाहें वो "टेक्नोलॉजी" हो, " केमिकल" हों, "इलेक्ट्रॉनिक" या "कॉस्मेटिक"।
स्तरीय चीज़ों को पाने के लिये हमारे प्रयास अभी भी नहीं हैं।क्या आपको लगता है कि आयातित चीज़ों पर भरोसा किया जाना चाहिये? क्या आप जो गाड़ियाँ चला रहे हैं उनके फ़िल्टर हानिकारक तत्वों को हवा में, और बाद में आपकी साँस में जाने से रोक रहे हैं?
आँखें खोलिये, देखिये अपने चारों ओर, कहीं ऐसा न हो कि कल आपका बच्चा आपसे सवाल करे और कहे कि सारी गंदगी तुमने ही विरासत में दी है मुझे।

Thursday, November 26, 2015

उच्च शिक्षा: क्या सबके लिये?

मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि उच्चशिक्षा के सम्बंध में कुछ प्रश्न पूछे जायें।
1. क्या वास्तव में उच्च शिक्षा का सुलभ होना देश की प्रगति के लिये उचित है?
2. क्या उच्चशिक्षा हेतु भारत सरकार द्वारा जितना भी धन व्यय किया जाता है वो प्रतिफल में परिवर्तित होता है? (Is the "return of money" equally proportional to the "money spent" in developing the infrastructure for higher education system in India?)
3. क्या कारण हैं कि उच्च शिक्षा रोज़गारप्रद नहीं है?
4. क्या उच्च शिक्षा को जीविकोपार्जन से जोड़ा जाना उचित है?
5. क्या विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्रायें वास्तव में उस शिक्षा को प्राप्त करने योग्य हैं?
6. क्या विश्वविद्यालयों में आने वाले छात्र-छात्रायें स्वयं अपनी इच्छा से, ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं?
7. क्या छात्र-छात्रायें मजबूरी व घरवालों के दबाव में विश्वविद्यालयी शिक्षा का हिस्सा बन रहे हैं?
8. क्या छात्र-छात्रायें मात्र एक फ़ैशन के रूप में और "कुछ नहीं से कुछ अच्छा" के विचार से महाविद्यालय आते हैं?
9. क्या भारत जैसा देश इस प्रकार की फ़ैशनेबल शिक्षा का वहन कर सकता है?
10. क्या ये अच्छा न हो कि जिन लोगों के लिये सरकारी नौकरियों में पद/स्थान आरक्षित हैं उसी वर्ग विशेष के लोग महाविद्यालयों में अपना समय और धन व्यय करें। बाकी बचा-खुचा वर्ग 12th के बाद की पढ़ाई में वह कार्य सीखे जो उसके लिये आगे जाकर जीविकोपार्जन में सहायक सिद्ध हो?

Tuesday, November 17, 2015

अवसर ऋण

अवसर ऋण एक ऐसा नाम है जो मेरे मन की उपज है। जो भी अर्थशास्त्र की सामान्य जानकारी रखते हैं वह "अवसर लागत (Opportunity Cost)" टर्म(पद) से परिचित होंगे। एक बहुत ही साधारण से उदाहरण द्वारा अवसर लागत के एक पक्ष को समझा जा सकता है। मान लीजिये कि आपके पास नौकरी के दो अवसर हैं, दोनों में से आपको एक अवसर का चुनाव करना है। जिस अवसर को आप चुन लेते हैं उसके बदले में दूसरे अवसर से प्राप्त होने वाले अनेक लाभ आप खो देते हैं, यह नुकसान ही "अवसर लागत" है। इसका ठीक-ठीक मापन बहुत कठिन कार्य है क्योंकि बहुत से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नुकसान इसमें शामिल होते हैं।
इसी आधार पर मैंने "अवसर ऋण" टर्म निकाला है। हमारे आस-पास समाज में हमारे अनेक समवयस्क ऐसे हैं जिन्हें अवसर नहीं मिले क्योंकि वो अवसर हमें मिले। हमारे जन्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, जीविकोपार्जन इत्यादि, जीवन के अनेक सोपानों पर किसी न किसी ने वो अवसर खोया है जो हमें मिला है। इस लिहाज़ से हम पर हर उस समवयस्क का ऋण है जिसे सामान अवसर नहीं मिला। इस बात के अनेक कारण हो सकते हैं कि उन्हें अवसर क्यों नहीं मिले, लेकिन इससे भी यह तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता है।
कई बार मैं उदास होना चाहती हूँ, जीवन से निराश होना चाहती हूँ लेकिन इस ऋण का बोझ मुझे ऐसा करने नहीं देता।भले ही हम सब अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़ने के लिये संघर्षरत हैं, हमारे जीवन के लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं, प्राथमिकतायें भिन्न हैं, समस्याऐं भिन्न हैं, परिस्थितियाँ भिन्न हैं, फिर भी यह तथ्य वहीं का वहीं है।
अगली बार निराश या उदास होने से पहले सोचियेगा, कि यह ऋण उतारे बिना मुक्ति नहीं है।

Wednesday, November 4, 2015

"अहिंसा"


क्या अहिंसा का अर्थ मात्र हिंसा के अभाव से लिया जा सकता है या इसे इससे अधिक व्यापक अर्थ में समझने की आवश्यकता है? है, क्योंकि, हर स्थान पर शान्ति दिखने को ही शान्ति है ऐसा नहीं माना जा सकता।

शान्ति से सम्बंधित एक बहुप्रचलित मंत्र है जोकि यजुर्वेद से लिया गया है, निम्नप्रकार है:-

ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष: शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्मा शान्ति: सर्वः शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॐ॥
इस मंत्र का अर्थ एवं तात्पर्य सम्पूर्ण जगत में शांति स्थापित करने हेतु है।

यदि अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइये तो आप पायेंगे कि हर व्यक्ति की अपने जीवन में एक ही खोज है, और वह खोज है शांति की खोज। हर व्यक्ति न जाने कब से इस खोज में लगा हुआ है और खोज है कि पूरी होने का नाम ही नहीं लेती। अब प्रश्न यह उठता है कि क्यों यह खोज अनवरत बनी हुई है? कोई ऐसा नहीं मिलता जो अपनी खोज पूरी करके सुस्ताता हुआ मिला हो। खोज पूरी क्यों नहीं होती?

खोज पूरी नहीं होती है और अनवरत बनी हुई है क्योंकि, हम अहिंसा को नहीं जानते हैं। अहिंसा को जाने बिना शांति की खोज कभी पूरी नहीं हो सकती।

अफ़सोस की बात है कि पश्चिमी जगत जिस योग को गले से लगाये बैठा है, उसके अनेक लाभ ले रहा है, और ले चुका है, हम भारतवासी उसके मूल तत्व से ही अनभिज्ञ हैं। स्पष्ट कर दूँ कि, योग का अर्थ अनेक प्रकार के आसान, प्राणायाम या मुद्रायें नहीं है। योग एक जीवन-पद्धति है जिसका आधार अहिंसा है। इस अहिंसा का आरम्भ आपकी स्वयं पर अहिंसा से होता है। हममें से अनेक संवेदनशील लोग अहंकारवश, (जी हाँ, अहंकारवश, क्योंकि बहुत सी घटनाओं पर मानव का कोई नियंत्रण ही नहीं होता है, परन्तु मानव स्वभाववश हर प्रक्रिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है) अनेक प्रकार की घटनाओं के लिये स्वयं को उत्तरदायी समझते हैं और लम्बे समय तक स्वयं को क्षमा नहीं करते, दूसरे शब्दों में कहूँ तो ये कि, ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर बहुत सी घटनाओं के लिये ख़ुद को दोषी समझते रहते हैं, ख़ुद से नाराज़ रहते हैं, और यही नाराज़गी बहुत सी शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं के रूप में प्रकट होती है। इन बीमारियों (व्याधियों) के इलाज़ के लिये आप डॉक्टर्स के चक्कर काटते हैं, लेकिन नतीज़ा सिफ़र(शून्य) मिलता है, आपके सारे परीक्षणों (tests) के परिणाम(reports) सही आते हैं। अब आप और आपका डॉक्टर समझ नहीं पाता है कि आख़िर समस्या की जड़ कहाँ है। मुश्क़िल है जड़ तक पहुँचना, क्योंकि वर्तमान चिकित्सा पद्धति लक्षणों का इलाज़ करने के लिये विकसित हुई है, कारणों का इलाज़ करने के लिये नहीं। 

यदि स्वस्थ रहने की आपकी इच्छा है तो अहिंसा ही वह मूलभूत औषधि है, जिसका आपको प्रयोग नहीं बल्कि पालन करना है। मृत्यु तो अंतिम सत्य है ही, स्वयं को क्षमा करके भी और स्वयं पर क्रोधित रहते हुये भी।

यही अहिंसा की मूल अवधारणा है, स्वयं को क्षमा करो और दूसरों को भी।

सरोगेसी: किराये की कोख़

सरोगेसी यानि किराए की कोख़ पर बहुत कुछ पढ़ा, देखा और सुना, और अंत में जाकर मैं इसी नतीजे पर पहुँची हूँ कि ये स्त्री शरीर के साथ विज्ञान का एक खिलवाड़ है और मैं इस खिलवाड़ के विरोध में हूँ।
अब, बहुत से लोग, जो सरोगेसी के पक्ष में हैं, उनसे निवेदन है कि वो अपना समय मेरे विचारों को आगे पढ़ने में न नष्ट करें।
बिन्दुवार अपने विचार रखने का प्रयास करूँगी:-
1. सरोगेसी के बारे में सबसे ख़तरनाक विचार, जिसके द्वारा स्वस्थ, पढ़ी-लिखी परन्तु आर्थिकरूप से असमर्थ महिलाओं की कंडीशनिंग की जाती है वो ये है कि, सरोगेसी एक बहुत "पुण्य" का काम है, जिसे करके वो किसी दम्पति को ख़ुशी देने जा रही हैं, माँ न बन सकी स्त्री को मातृत्व सुख देने जा रही हैं। अब आप सोचेंगे कि ये ख़तरनाक विचार क्यों हो गया, ये तो बहुत अच्छी सोच है। तो मैं कहूँगी, बिल्कुल अच्छी सोच है यदि, सरोगेसी का निर्णय लेने वाली महिला आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर है (उसे और रुपयों की ज़रुरत नहीं है) तो, ये विचार, अपनी कोख़ का " दान" सर्वथा उचित है। पर समस्या यही है हमारे समाज की, कि हमने "पाप" और "पुण्य" के बड़े-बड़े मानदण्ड बना रखे हैं। यदि कोई महिला सहवास करके गर्भिणी हो जाती है, किन्ही विशेष परिस्थितियों में, तो वो पापी होती है, उसके अलग़ पैमाने, संतान भी अवैध हो गयी फिर। परन्तु यदि वो सेरोगेसी के लिए अपनी कोख़ किराये पर दे देती है, तो वो पुण्यात्मा हो गयी। (यदि इस पूरी प्रक्रिया में धन/मुद्रा न सम्मिलित हो तो शायद इसे पुण्य माना भी जाये, मैं बिल्कुल ऐसा नहीं मानती)
2. सरोगेसी से प्राप्त धन क्या उस महिला को मिलता है जिसने नौ-दस महीने एक जीव को गर्भ में रखा। उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा, क्योकि, आर्थिक कठिनाई, जिसके कारण महिला इस प्रक्रिया के लिए राज़ी हुई थी, वह आर्थिक कठिनाई अकेले महिला की नहीं अपितु पूरे परिवार की है। यदि आर्थिक कठिनाई के कारण महिला को अपनी कोख़ किराये पर चढ़ानी पड़ी तो फिर शरीर बेचना भी वैध होना चाहिये।
3. क्या आप मानते हैं कि गर्भावस्था मात्र नौ-दस महीने की होती है? प्रसव के बाद क्या स्त्री में शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक बदलाव नहीं आते? क्या सरोगेसी इस सब से अछूती है?
4. गर्भावस्था के पूरे काल में कितनी अप्रत्याशित समस्यायें आ सकती हैं। स्त्री की मृत्यु भी हो सकती है। क्या सरोगेसी इन सबसे ऊपर है?
5. आज तक कितनी सक्षम स्त्रियों ने, जो स्वयं डॉक्टर हैं, और सरोगेसी के पक्ष में हैं, सरोगेसी के लिये अपनी कोख़ उधार दी है? बिना स्वयं इस प्रक्रिया का हिस्सा बने, इसके पक्ष में होना आपकी ईमानदारी पर प्रश्न उठाता है। वो बात अलग़ है जब आप स्वयं ही किसी और की सरोगेसी का इंतज़ार कर रही हों।
6. सरोगेसी किसी भी प्रकार से महिला सशक्तिकरण नहीं है। भविष्य में महिलायें यह भी कह सकती हैं कि मैं तो पैसा बना सकती हूँ क्योंकि मेरे पास एक कोख़ है जिसे मैं किराये पर चढ़ा सकती हूँ। मेरा शरीर ही मेरी संपत्ति है।
7. अपने ही बीज का पौधा क्यों चाहिये? इसलिये क्योंकि हम समर्थ हैं, क्योंकि हम पैसा देकर कोख़ उधार ले सकते हैं, क्योंकि हम अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि हमें और चाहिये।
8. यदि किसी स्त्री की माँ, सासू-माँ या कोई और शुभचिंतक ऐसी सहायता करने में समर्थ है, और करता है, तो मैं इसे अनुचित नहीं मानती, पर क्या ऐसा होता है?
यदि आपके पास इनके विपरीत तर्क हैं और उनसे मैं सहमत हूँ तो मैं संशोधन अवश्य करूँगी।