Tuesday, August 25, 2015

(15) "वर्षा ऋतु"

हरहर हरहर चले हवारा,
मौसम का कैसा है नज़ारा,
गहरे काले बादल छाये,
तूफां का अंदेशा जगाये,
मन मतवाला पँछी बनता,
बिना डरे ही गाता जाता,
ओ बादल आकाश के राजा,
थोड़ी वर्षा इधर करा जा,
हरी भरी चूनर सज जाये,
धरती माता ख़ुश हो जाये,
तपे हुये तन-मन खिल जायें,
लोग चाय और पकौड़ी खायें,
वर्षा ऋतु है बड़ी सुहानी,
एक बरस के बाद है आनी,
जीभर याद बसा लो मन में,
फिर ना कहना भीग न पाये।

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