मेरी सिन्दूरी शाम भी तुम हो,
मेरी पीली उजास भी तुम हो,
मेरी सुनहरी सुबह भी तुम हो,
मेरी चाँदनी रात भी तुम हो,
तुम बिन जीना सह पाऊँ कैसे,
तुम बिन अब मैं रह पाऊँ कैसे,
बालक बनकर आये हो तुम,
तुमको व्यक्ति बनाऊँ कैसे,
जबतक तुमको जाना न था,
मानो कुछ पहचाना न था,
हर कर्म समर्पित ईश्वर को,
स्वयं विधाता बन जाऊँ कैसे,
है यही पहचानी उधेड़-बुन,
हरपल गुनता रहता है मन,
मेरी इच्छा तुम भले न मानो,
परहित अवश्य पहचानो तुम।
मेरी पीली उजास भी तुम हो,
मेरी सुनहरी सुबह भी तुम हो,
मेरी चाँदनी रात भी तुम हो,
तुम बिन जीना सह पाऊँ कैसे,
तुम बिन अब मैं रह पाऊँ कैसे,
बालक बनकर आये हो तुम,
तुमको व्यक्ति बनाऊँ कैसे,
जबतक तुमको जाना न था,
मानो कुछ पहचाना न था,
हर कर्म समर्पित ईश्वर को,
स्वयं विधाता बन जाऊँ कैसे,
है यही पहचानी उधेड़-बुन,
हरपल गुनता रहता है मन,
मेरी इच्छा तुम भले न मानो,
परहित अवश्य पहचानो तुम।
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