Wednesday, October 28, 2015

(18) "सखी री"

"सखी री"
अंतस को मत बँटने दो,
मनपाश को कुछ खुलने दो,
मुक्त उड़ो अब नील गगन में,
पँखों को स्वयं फैलने दो,

ज्वाला अंतर की बुझ जायेगी,
दिया ज्ञान का जलने दो,
संबंध पाश को खुलने दो,
मन को अब मुक्त विचरने दो,

साथ सत्य का सदा ही देना,
अब झूठ की परतें खुलने दो,
पीड़ा अंतर की मिट जायेगी,
स्वयं को समर्पित होने दो,

कितना भागोगे, लड़ोगे कितना,
कर लो थोड़ा आराम अहो,
मत करो संघर्ष अब आज सखी,
कल के लिये भी कुछ रहने दो।

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