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Monday, February 23, 2015

अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम |
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरुवै नमः ||

अर्थ : खण्डित न हो सकने वाले, संपूर्ण संसाररूपी, प्रत्येक चर व अचर में व्याप्त, ऐसे ईश्वर के दर्शन कराने वाले गुरु को मैं नमन करता हूँ |

आज-कल ये श्लोक " चक्रवर्ती सम्राट अशोक" नाम से प्रसिद्ध सीरियल में सुनाई देता है, आज मेरे पुत्र जी ने मुझसे इसका अर्थ पूछा, यदि मेरे द्वारा किये हुए अनुवाद में कोई त्रुटि हो तो कृपया सूचित करें |

"मातृभाषा दिवस" 21 फरवरी 2015 के उपलक्ष में यह पोस्ट हिंदी में.……

Wednesday, February 18, 2015

रूद्राष्टक (महाशिवरात्रि २०१५ )

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं | विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ||
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं | चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं || 
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं | गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं ||
करालं महाकाल कालं कृपालं | गुणागार संसारपारं नतोहं ||
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं | मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरं |
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा | लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ||
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं | प्रसन्नानं नीलकण्ठं दयालं ||
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं | प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं | अखण्डं अजंभानुकोटिप्रकाशम् ||
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं | भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं ||
कालातीत कल्याण कल्पांतकारी | सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ||
चिदानंद सन्दोह मोहापहारी | प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ||
न यावद उमानाथ पादारविन्दं | भजंतीह लोके परे वा नराणाम् ||
न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं | प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ||
न जानामि योगं जपं नैव पूजाम् | नतोहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ||
जरा जन्मदुःखौघ तातप्यमानं | प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेणाहरतोषये |
ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शंभु प्रसीदति ||