पाँच बहनों में सबसे ख़ूबसूरत ब्राह्मण-कन्या,सावित्री। माता-पिता ने नाम बस रख दिया, कोई नाम तो रखना ही था। एक वो सावित्री थीं, रूपसी, राजा की पुत्री, राज-कन्या, अपने जीवन के सारे निर्णय लेने के लिये स्वतन्त्र, जो मन को भा गया वही पतिरूप में सदा के लिये स्वीकार्य हो गया, क्षत्राणी थीं, साहस तो रक़्त में व्याप्त था। सबने मना किया कि सत्यवान से विवाह न करो पर राजकन्या के प्रेम के आगे किसकी चली है, यमराज को भी हार माननी पड़ी। पर मेरी सावित्री को तो प्रेम का अधिकार ही नहीं। बचपन बीत गया जवानी के इंतज़ार में और जवानी बीतती जा रही थी, ब्याह के इंतज़ार में। बूढ़े होते जा रहे माता-पिता दिन-रात यही सोचते कि किसी तरह यह कन्या भी हिल्ले लगे। गरीब की कन्या को सुंदर होने का भी अधिकार नहीं होता। मनचाहा वर तो किसी-किसी की तपस्या में होता होगा, सावित्री दिन-रात यही सोचती रहती। देने लायक दहेज़ जुटा सकें इसकी हैसियत तो माता-पिता चार बेटियों का ब्याह करके पहले ही चुका चुके थे, बस किसी तरह इसकी भी गाँठी जुड़े तो गङ्गा नहायें और सत्यनारायण का पाठ धरें।
ख़ैर, देर-अबेर ईश्वर ने उनकी सुन ही ली, एक बिचवानी ने एक रिश्ता बताया। शहर के एक बड़े धनवान ब्राह्मण हैं उन्होंने आपकी कन्या को एक विवाह समारोह में देखा था, उन्हें आपकी कन्या बहुत जँच गयी है, लेन-देन का कोई चक्कर नहीं, ईश्वर की कृपा से सारा घर भरा है, उन्हें कुछ नहीं चाहिये। यह सुनकर तो सावित्री के माता-पिता को तो मानों मुँह मांगी मुराद मिल गयी। फिर भी बिचवानी से पूछ ही लिया, कि ऐसा क्यूँ कि कुछ लेना-देना ही नहीं? बिचवानी बोले, दूसरा ब्याह है, पहली पत्नी इन्हें छोड़कर चली गयी, जीवन काटना कठिन जान पड़ा तो फिर से ब्याह की इच्छा जताये रहे, इसी से हम आपसे बात किये, लड़कियों की कोई कमी थोड़े ही होती है धनवान को। लड़की को सारी उमर बैठाये रखने का इरादा हो तो ना कर दो, कोई गरजू थोड़े ही हैं। इतना कह कर आग-बबूला होते हुये बिचवानी महाराज उठकर जाने लगे, तो सावित्री के पिता उनके पैरों पर गिर पड़े, महाराज हमसे भूल हो गयी जो आपसे सवाल-ज़वाब किये, आप तो हमारे हितैषी ही हैं, मेरी ही मति मारी गयी थी, क्षमा महाराज, क्षमा। अच्छा-अच्छा ठीक है, रहने दो ये सब, रिश्ता पक्का समझूँ फिर? जी महाराज, अवश्य, शुभस्य शीघ्रम। इसी जेठ में ब्याह कर देते हैं।
सावित्री, फिर खो गयी सपनों की दुनिया में? उधर से आती हुई सरिता ने चुटकी ली। ब्याह होगा, मैडम जी का, कार में मायके आयेंगी। सावित्री भी सोचती, कि काश हम-उम्र दूल्हा मिल जाता तो "तुम" करके बात करती, इस अधेड़ को तो सारी उमर "आप" कहना होगा। तीस की होने को आयी थी और ख़ुद को नवयौवना समझ, सपने भी कच्चे देखती थी।
जैसे-तैसे ब्याह निपटा, सारा ख़र्च लड़के वालों की तरफ़ से ही किया गया। नाते-रिश्तेदार सब विदा हुये और विदा होकर सावित्री अपने पति के साथ बंगले पर चली आयी। सावित्री के मन में एक प्रश्न मथता रहता, कि इनकी पहली पत्नी इन जैसे भले मानुष को छोड़ कर, अपना सारा सौभाग्य छोड़कर क्यूँ चली गयी? फिर सोचती कि, ये न हुआ होता तो मेरे भाग्य क्यूँकर खुलते, ख़ैर मुझे क्या, यह सोचते-सोचते नवविवाहिता का शृङ्गार करके, दर्पण में स्वरुप पर ही मुग्ध होती रहती। दिन इसी तरह बीतते गये और सच्चाई की अनगिनत परतें शनैः-शनैः खुलती गयीं। चार वर्ष होने को आये थे विवाह को पर सावित्री की गोद अभी तक सूनी थी। बाँझ के ताने सुन-सुन कर कान पक गये, बेचारी अपने मन की व्यथा किससे कहती। हारकर पति से एक बच्चा गोद लेने के लिये कहा, तो उसने सारी भलमनसाहत का आवरण उतार कर फेंका और एक झन्नाटेदार थप्पड़ सावित्री को रसीद दिया। तेरी हिम्मत कैसे हुई यह बात कहने की? हम ख़ानदानी लोग हैं, हम अपनी वंशबेल किराये के पौधों से नहीं बढ़ाते। सावित्री तो जैसे होश में आ गयी, अब तक जो देखा वो सब स्वप्न था? इस नपुंसक के सम्मान की रक्षा, अब तक क्यूँकर करती रही? मन में कुछ ठानकर आँसू पोछकर सावित्री मुस्कुरा उठी। सावित्री के भीतर एक पत्नी की हत्या हो गयी थी, बची थी तो बस एक औरत।
कुछ दिन बीते और सावित्री के पति ने सत्यार्थ कुमार को अपनी सहायता के लिये काम पर रख लिया और अन्य नौकरों के साथ उनके रहने की व्यवस्था कर दी।
सावित्री का शव विवाहिता के पूरे शृङ्गार के साथ रखा हुआ है, परिवार की सभी स्त्रियाँ सावित्री की चरणरज लेने को व्याकुल हैं। स्त्रियाँ आपस में बातें करती हैं, सती स्त्री थीं सावित्री बहन, जाने से पहले पति की वंशबेल बढ़ा कर ही गयीं, पास ही एक स्त्री की गोद में एक मनोहारी नवजात बालक आकाश को निहारने का असफ़ल प्रयास कर रहा है। यह सावित्री का पुत्र है, सावित्री इस बालक को जन्म देते ही सिधार गयी।
सावित्री के पति श्मशान घाट पर सोच में डूबे खड़े हैं, शून्य में निहारते हैं, बालक के लालन-पालन की चिंता उन्हें खाये जा रही है, तीसरा ब्याह कर लें क्या, सोचते हैं?