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Monday, January 25, 2016

(6) "प्रेम जाल" (कहानी)

सोलह साल की कच्ची उम्र और प्रेम का पहला अहसास होने के बाद सुनैना के लिये दुनिया इससे हसीन कैसे हो सकती थी?

सावली रंगत वाली इस लड़की की बोली-भाषा इतनी मीठी कि कोई भी फ़िदा हो जाये। स्कूल जाने और शहर के अच्छे घरों की लड़कियों के साथ उठने-बैठने से अपनी ग़रीबी का उसे ज़रा भी भान न रहा था। हर लड़की की तरह सजने-संवरने और ढ़ंग से पहनने-ओढ़ने की तरफ़ उसका ख़ास रुझान था।

ग़रीबी तो हर किसी का मज़ाक उड़ाने का अधिकार लेकर ही आती हो जैसे, प्रेम भी इससे अछूता कैसे रह सकता है। अब सुनैना की ज़िन्दगी का मक़सद मनचाही शादी करके घर बसाना ही था बस। लेकिन, घर की बड़ी लड़की होने से और आर्थिक तंगी होने के कारण उसके माता-पिता ने उसे बेबी-सिटिंग के काम के लिये मेरे यहाँ काम पर लगा रखा था। अनुभवी होने के कारण इतना समझने में मुझे देर न लगी कि सुनैना को बच्चे पसंद हैं, मेरे बेटे के साथ जल्दी ही उसकी दोस्ती हो गयी। मैं उससे कहती कि तुम्हें अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिये, स्कूल से वापस आकर तुम बेबी-सिटिंग कर सकती हो, तुम्हारे स्कूल की फ़ीस भी मैं दे दूँगी। लेकिन अब सुनैना का मन पढ़ाई में नहीं था। उसने पढ़ाई को लेकर बिल्कुल भी उत्साह नहीं दिखाया। ख़ैर, जिंदगी चल पड़ी।

कुछ दिन बाद मुझे जानकारी हुई कि सुनैना मेहँदी की बहुत सुंदर डिज़ाइन बना लेती है। आर्ट और क्राफ़्ट में उसे बहुत रुचि है, बहुत सलीक़े से बना सकती है। मैंने उसे एक ड्रॉइंग कॉपी और मेहँदी की डिज़ाइन वाली क़िताबें उपलब्द्ध करा दीं। अब, उसका बेबी-सिटिंग का समय बोरिंग नहीं था, सुनैना और मेरा बेटा मिलकर ड्रॉइंग, कलरिंग, पेंटिंग, क्राफ़्ट आदि किया करते। शाम होने तक मैं घर आ जाती और उनके बनाये सामानों की तारीफ़ें किया करती। धीरे-धीरे उसे मुझ पर विश्वास हो गया कि मैं वास्तव में उसका भला ही चाहती हूँ।

एक दिन मेरी एक सहृदय पड़ोसन का फ़ोन आया कि आपका बेटा स्कूल से घर आ गया है, लेकिन सुनैना काम पर नहीं आयी है। उसका पता लगाने के बाद पता चला कि कुछ समस्या आ गयी है, अगले दिन भी वह काम पर नहीं आयी। उसके बजाये उसकी माँ आयी और रोते-रोते उसने अपनी आप बीती मुझे कह सुनाई। सुनैना ने हाथ की नस काटकर आत्महत्या करने का प्रयास किया है, डॉक्टर को दिखाकर पट्टी करा दी है, अब शायद ही वह काम पर आये। कारण पूछने पर पता चला कि, रिश्ते के एक लड़के से उसे प्रेम हो गया है और उसी से शादी करना चाहती है। हम अभी इस कम उम्र में उसकी शादी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन प्यार ने उसे अँधा बना दिया है, हम सब उसे दुश्मन नज़र आते हैं। मैंने कहा, उसे मेरे पास भेजना, मैं उससे बात करूँगी, और उसे ये मत कहना कि तुमने मुझे उसकी सारी बातें बता दी हैं, मैं उसके मुँह से ही सुनना चाहती हूँ, वो क्या कहती है, क्या सोचती है। दो-चार दिन बाद शाम को सुनैना हाथ में पट्टी बाँधे मेरे पास आयी। मैंने उसे बैठने का इशारा किया और चाय पीते-पीते पूछा (सुनैना चाय नहीं पीती थी), बेटा ये चोट कैसे लगी? उसने झूठ बोलने की कोशिश की, तो मैंने पूछा, सुनैना, क्या तुम सच में उस लड़के से इतना प्यार करती हो कि अपनी जान भी दे सकती हो? वह सिर झुकाए बैठी रही। मैंने दूसरा प्रश्न किया, क्या वह लड़का तुमसे शादी करना चाहता है? उसने हाँ में सिर हिलाकर जवाब दिया। क्या तुम कुछ दिन इंतज़ार कर सकती हो, ताकि कुछ पैसे जोड़ सको? वह चुप रही। हम्म, अच्छा, क्या तुम सिर्फ़ कुछ दिन रुक सकती हो जबतक मैं दूसरी बेबी-सिटर ढूँढ़ लूँ? उसने हाँ में सिर हिलाया। अच्छा तब ठीक है, मैं तुम्हारी माँ से बात करूँगी।

ज़रा इधर आना मेरे पास, मैंने उसे पास बुलाया। उसका चेहरा हाथों में लेकर कहा, वादा करो कि ज़िन्दगी में ऐसी बेवकूफ़ी की हरक़त फ़िर कभी नहीं करोगी, तुम मुझे बहुत प्यारी हो। प्यार से पिघल गयी सुनैना, मेरे गले लगकर बोली, नहीं दीदी अब कभी नहीं, ऐसा कभी सोचूँगी भी नहीं।

अगले दिन उसकी माँ को बुलाकर बात करनी पड़ी, कि कुछ दिन तो रुक गयी है लड़की लेकिन अब इसकी शादी का इंतज़ाम करो।

वाक़ई कच्ची उम्र का हो या किसी भी उम्र का, यह प्यार, आकर्षण या जो भी आप इसे कहें, इसी तरह दिमाग़ पर असर करता है, आप पढेलिखे हों या अनपढ़-गंवार प्रेम के आकर्षण के विज्ञान को समझना अत्यंत कठिन है। यदि आप समझते हैं कि कोई भी किसी दूसरे के अनुभव से सीख सकता है तो आप ग़लती पर हैं। यह एक ऐसा अनुभव है जिससे हर कोई गुज़रना चाहता है। मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि आगे आने वाले समय का न ही पूर्वानुमान लगा सकता है न ही इतना आगे का सोच सकता है। सुनैना भी कोई अपवाद न थी।

आख़िर सत्रह साल की उम्र में सुनैना की शादी हो गयी। सुनैना को जैसे जीवन की सारी खुशियाँ मिल गयीं, मनचाहा जीवनसाथी मिल गया, मनपसंद ढंग से शादी हो गयी, प्यार सफ़ल हो गया। लेकिन, क्या वाक़ई यही सच था, शायद नहीं।

इस बीच हम शहर छोड़ कर दूसरे शहर में बस गये थे, सुनैना के फ़ोन आते रहते, हम सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो चुके थे।

शादी के छः महीने गुज़रते ही सुनैना का पहला गर्भपात हुआ। सुनैना को देखकर कोई भी बता सकता था कि सेहत के साथ खिलवाड़ हो गया है। ख़ैर, ज़िन्दगी फ़िर आगे बढ़ी, साल बीतते फ़िर से गर्भवती सुनैना को एक बेटी हुई। एक साल और बीतते ही एक और बेटी हुई। इक्कीस साल से भी कम उम्र में सुनैना दो बेटियों की माँ थी और एक बेरोज़गार पति की पत्नी थी। प्रेम!!! प्रेम क्या होता है, क्या यही प्रेम होता है, ख़ुद से सुनैना यह सवाल करने लगी थी।

बहुत दिनों के बाद एक दिन के लिये मेरा शहर आना हुआ और सुनैना ने मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की। उसकी राम कहानी सुनने के बाद मैंने पूछा, सुनैना अब क्या इरादा है, आगे ज़िन्दगी कैसे काटोगी? क्या पति कुछ काम-धाम करना चाहता है या नहीं? सुनैना बोली, दीदी जी, ड्राइवरी कर लेते हैं पर गाँव में काम मिलता नहीं, समझ में नहीं आता क्या करें। मैंने सुनैना को याद दिलाया कि तुम मेहंदी की बड़ी अच्छी डिज़ाइन बनाती थीं, याद है या भूल गयी? याद है दीदी जी, लेकिन अब समय ही नहीं मिलता, दिनभर तो घर के काम में बीत जाता है। लेकिन, इतना कहते ही सुनैना को जैसे राह मिल गयी। जल्दी से सामान समेट जाने को हुई, मैंने पूछा, कहाँ, इतनी जल्दी? नहीं, दीदी जी, अब रुक गयी तो बड़ी देर हो जायेगी। आपसे दो साल बाद मिलूँगी, यहीं इसी शहर में, आप मिलेंगी ना? हाँ, हाँ, क्यों नहीं, न जाने क्यों इस साहसी, आत्मविश्वासी लड़की को देख मेरे चहरे पर एक मुस्कान तैर गयी।

दो साल बाद, मैं "सुनैना ब्यूटी पार्लर" में सुनैना से बातें कर रही थी। कैसी हो सुनैना? दीदी जी, हम सब बहुत ख़ुश, बहुत मजे में हैं। मेरी बड़ी बेटी अब स्कूल जाती है, यहीं घर के पास में है, छोटी को घर पर सास सम्हाल लेती हैं, पति ने एक ऑटो ले लिया है, अपना ऑटो चलाते हैं। मैंने पूछा, सुनैना और बच्चे? कभी नहीं दीदी जी, अब कभी नहीं। हा हा हा। बेटा नहीं चाहिये तुम्हें? सुनैना मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दी।

Sunday, January 24, 2016

(5) "ऋषि पत्नी" (कहानी)

भोर का समय है, चहुँ ओर अन्धकार व्याप्त है, प्राची के आकाश पर भगवान विवस्वान का रथ अभी भी उपस्थित नहीं है। गँगा नदी के तट के समीप निविड़ नीरव अरण्य में स्थित आश्रम में एक ऋषि तपस्या में लीन हैं। शांत मुख मंडल और शांत धरा। ऋषि पत्नी नित्यप्रति की भाँति व्यस्त हैं, अभी ऋषि गौतम गँगा स्नान के लिये जायेंगे, उनके लिये वस्त्र इत्यादि व्यवस्थित कर लूँ। वर्षों से नित्य-प्रति का यही नियम। ऋषि गौतम न्यायशास्त्र की रचना में लीन हैं, समर्पित पत्नी के होने से जीवन के कितने ही अभाव दूर हो गये हैं, कितने संतुष्ट और शांत हैं। न्यायशास्त्र की रचना करना क्या विचलित मनःस्थिति में संभव होता, कदाचित नहीं।
आह, ऋषि गौतम और ऋषि पत्नी इंद्र-चंद्र के खलयंत्र से कैसे अनभिज्ञ रह गये? अपने तेज़ से भूत-भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले ऋषि गौतम कैसे आप अनभिज्ञ रहे? या मात्र परीक्षा ही लेनी थी आपको अपनी पतिव्रता स्त्री की? विश्वास कैसे खण्डित हुआ? आने वाला समय प्रश्न अवश्य पूछेगा।
पुनः भोर है, वही दिनचर्या, नहीं, यह भोर भिन्न है, कुछ अवश्य ही सही नहीं है। ऋषि गौतम इतने शीघ्र स्नान से लौट आये हैं, यह कैसे? आकर पत्नी का सानिध्य चाहते हैं, क्यों? पति पर संदेह अहिल्या करें, यह कैसे संभव है? नहीं, यह छल है, छल, छल कैसे? पति पर संदेह, घोर अपराध। यही तो शिक्षा पायी है अहिल्या ने, पति समर्पण ही स्त्री-धर्म है। धर्म विमुख कैसे हो सकती हैं, नहीं हो सकतीं।
ऋषि गौतम गँगा-स्नान से वापस आकर, अपने आश्रम से अपनी ही छवि वाले मनुष्य को निकलते देख रुक जाते हैं। सहस्राक्ष शचीपति देवराज, क्यों? द्वारपाल के रूप में चंद्र, क्यों? कामी-लोलुप इंद्र-चंद्र द्वै, खलयंत्रकारी समुच्चय। तपस्या से उत्पन्न तेज अब क्रोधाग्नि में परिवर्तित हो चुका था, अहिल्या के सतीत्व पर कुदृष्टि डालने वाले देवराज, आज से तू पद्च्युत हो जा, तेरे सारे शरीर पर सहस्र नेत्र उग आयें, कभी कोई तेरी आराधना न करे, तुझसे कुछ याचना न करे, हे चंद्र, तेरी ओर देखने वाला कलंकी हो, नीच।
ऋषि पत्नी अहिल्या यह देख-सुनकर उसी क्षण शिला समान हो भूमि पर स्थापित हुईं, यह कैसा दुर्भाग्य, यह कैसा अनर्थ हुआ। क्या समर्पण ही मेरा दोष, क्या विश्वास ही मेरा दोष?
ऋषि गौतम ने आश्रम त्याग दिया, अहिल्या शिलारूप में वहीं रह गयीं। अनेक युग बीत गये। 
दो सुकुमार बालक अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के साथ वन भ्रमण पर आये हैं। पुनः भोर का समय है, भगवान विवस्वान के उदय के साथ ही दूर गहन वन में एक निर्जीव आश्रम दृष्टिगोचर होता है। बालक अपने गुरु से प्रश्न करते हैं, गुरु जी, यह कोई आश्रम प्रतीत होता है, परन्तु इतना निर्जीव क्यों है? किसी पशु-पक्षी के भी दर्शन नहीं होते? ऋषि विश्वामित्र निर्देश देते हैं, बालकों, यह ऋषि गौतम का आश्रम है, उनकी पत्नी तपस्या में लीन हैं, जाकर उनके दर्शन करो पुत्र।
राम, ऋषि पत्नी अहिल्या के समीप हैं, अहिल्या के प्रथम दर्शन पाने वाले राम उनकी चरणरज लेकर माथे से लगाते हैं। अहिल्या नेत्र खोल देती हैं, राम, पुत्र राम। शिलारूप प्राप्त ऋषि पत्नी पुत्र राम के स्पर्श मात्र से जैसे सजीव हो उठी थीं। राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है, अहिल्या के नेत्रों से इतने दिनों का संचित अपराधबोध बह निकलता है जैसे आज सारी सीमायें तोड़ ही देगा। राम, मेरे राम, मेरा....कुछ नहीं माँ, आप सदा वंदनीया, प्रातः स्मरणीया हैं, आप ऋषि पत्नी हैं माँ। शांत होइये, मुझे आशीर्वाद दीजिये माँ।
सदा सुखी रहो राम, विजयी भव पुत्र।
सजल नेत्रों से राम को विदा करती हैं ऋषि पत्नी।

(पौराणिक कथाओं की अधिक जानकारी मुझे नहीं है, संदर्भ व प्रसंग में त्रुटियाँ संभव हैं, अतः आप सभी से अनुरोध है कि इसे एक काल्पनिक कथा ही मानें 

Friday, January 22, 2016

(4) "भूख़ (मेरी चौथी कहानी)"

गिरिजा देवी, यही नाम था अजिया का। अजिया मतलब, दूर के रिश्ते में वो मेरी नानी की सास लगीं। जब हम लोग नानी के गाँव जाते तो उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुये बिना न रह पाते थे। वो जानती थीं कि हम बच्चे शहर के स्कूलों में पढ़ते हैं, गाँव की बोली-भाषा हमारे पल्ले नहीं पड़ेगी और हम लोग पगलैट नज़र आयेंगे, इसलिये हम लोगों से खड़ी बोली हिंदी में ही बात करतीं थीं। उनका स्वर बहुत रौबदार हुआ करता। गोरा-चिट्टा रंग-रूप और कलफ़दार सूती साड़ी पहने वह किसी सुंदरी से कम न लगती थीं। उनका पक्का मकान गाँव में सबसे अच्छा था। घर से लगा हुआ पक्की जगत वाला, मीठे पानी का एक पुश्तैनी कुआँ था। हम बच्चों के लिये कुँए से पानी भरकर लाना एक मजेदार अनुभव होता था।
दादा-अजिया शहर की सरकारी नौकरी से रिटायर होकर गाँव वाले अपने पक्के मकान में आकर बस गये थे। एक पक्का मकान अब शहर में भी था। अजिया की एकमात्र संतान उनका पुत्र था। वह शहर में बैंक में काम करते, देखने-सुनने में बेहतरीन, पर उन्हें शराब पीने की बुरी लत लगी हुई थी। हर महीने के अंत में मिलने वाली सारी तनख़्वाह इसी लत को समर्पित थी। हर बस वाला जिससे वो गाँव आते-जाते थे उन्हें पियक्कड़ बाबू के नाम से जानता था। पियक्कड़ बाबू जब इस लत के शिकार नहीं थे तब उनका विवाह एक सुंदर-सुशील कन्या जानकी के साथ हुआ था और इस युगल के दो पुत्र थे। यह परिवार शहर वाले मकान में रहता था। बच्चे शहर में ही स्कूलों में पढ़ते थे।
अपने बेटे की शराब पीने की लत से अजिया बहुत दुःखी रहतीं और सोचतीं कि किसी प्रकार इस दुर्गति से छुटकारा मिले।लेकिन वो दोहा है ना,
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय।।
उसी प्रकार, एक बार बिगड़े हुये बाग़ को तो फ़िर से बसाया जा सकता है पर बिगड़ी संतति को फ़िर से बनाने का कोई उपाय नहीं, निश्चितरूप से कोई उपाय नहीं। एक संतान आगे आने वाली कई पीढ़ियों की वाहक होती है, वह उन्हीं संस्कारों को लेकर आगे बढ़ती है जो उसे विरासत में मिले हैं, आप लाख़ प्रयास कर लें इसे बदल पाना अत्यंत कठिन है।
अंततः वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था, पर जो होकर ही रहा। पिता की देखादेखी वही करतूतें अजिया के बड़े पोते ने भी शुरू कर दीं, दिन बीतने की देर न थी कि छोटा भाई भी उसी राह पर। दो सुंदर-सुंदर बच्चे जो बड़े तो हुये पर इंसान न बन पाये।
जैसी जिसकी आदतें होती हैं उसका उठना-बैठना भी समान आदतों वालों के साथ होता है। इसी संगति के चलते शहर वाले मकान पर दबंगों का कब्ज़ा हुआ और गाँव की ज़मीन भी बिक गयी। ले दे कर गाँव का मकान ही बचा था जिसमें अब बस अजिया ही जीवित बची थीं।
इंसान चाहें शिशु हो या युवा या वृद्ध, एक बात जो जीवन की हर अवस्था में समानरूप से उपस्थित रहती है वह है भूख़, यह मृत्यु के साथ ही समाप्त होती है। अजिया का परिवार पतन के उस दौर से गुज़र रहा था जो अपनी नियति के लिये स्वयं उत्तरदायी था। आर्थिक सम्पन्नता क्या चीज़ है, कुछ नहीं। अजिया से अधिक धनी स्त्री तो पूरे गाँव में नहीं थी। चल-अचल सब संपत्ति थी उनके पास, आह दुर्भाग्य! आज यह कि एक रोटी के लिये वह सबके दर पर जातीं और लोग दुत्कार देते।
नानी सहृदय थीं और अपनी क्षमता भर उनकी सेवा करतीं फ़िर भी, अपनों की कमी उन वृद्ध स्त्री के हृदय पर गहरा आघात कर गयी थी।
बहुत दिनों के बाद मेरा गाँव जाना हुआ। देखा तो उनके मकान पर ताला लगा था। मैंने नानी से पूछा, अजिया कहाँ गयीं। नानी ने बताया कि दो दिन तक किवाड़ नहीं खुले और तोड़ कर देखा गया। वो खटिया पर निष्प्राण पड़ी थीं। आख़िर साँसों की डोर कब तक थमी रहती।
- अनामिका

Monday, January 18, 2016

(3) "कँचन (मेरी तीसरी कहानी)"

उसने एक हाथ में झोला उठाया जिसमें आशीष के कुछ कपड़े और थोड़ा सा ज़रुरत का सामान था। डेढ़ साल का नन्हा आशीष उसके वक्ष से लगा सो रहा था, दुनिया की हक़ीक़त से बेख़बर। किराये भर के चंद रूपये ले कर और मन में एक निश्चय के साथ कँचन ने घर की देहरी के बाहर अपना अंतिम पग रख दिया था, फ़िर कभी मुड़कर न देखने के लिये।
छः बहनों की सबसे छोटी बहन, घर में सबकी लाड़ली। बड़ी बहनों के रहते कभी घर के काम न करने पड़े थे, बस एक ही काम था जो उसे हमेशा करना होता, वो था कॉलेज जाना और फ़िर सारा दिन क़िताबों में सिर खपाना। दिन बीतते गये और कँचन अब रसायन विज्ञान में परास्नातक हो चुकी थी। एक-एक कर सारी बहनें अपने-अपने घर ब्याह कर जा चुकी थीं। कँचन ने अब एक विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया था, समय रहते बीएड भी कर लिया। कँचन के दिन इसी तरह गुज़र रहे थे।
पिता के लिये कँचन की शादी से बढ़कर अब कोई ज़िम्मेदारी नहीं बची थी अतः एक बैंक में काम करने वाले शैल के साथ कँचन की शादी पक्की की और शुभ दिवस पर यह कार्य भी संपन्न हुआ।
पिता के घर से विदा होकर शैल के घर की देहरी पूजते हुये मन में सोचती जाती कि अब यहीं से मेरी अंतिम यात्रा होगी। गृहणी, पत्नी, बहू और माँ बस यही रूप तो सोचे थे अपने लिये कँचन ने, इतने ही उसके सपने और इतनी ही उसकी दुनिया, उसके आस-पास की दुनिया इससे अलग़ कब थी।
लेकिन, नियति को तो शायद कुछ और ही मंज़ूर था।
शैल, यथा नाम तथा गुण। शैल को कँचन का साधारण रूप रंग पसंद न था। विवाह किस मजबूरी में किया था ये तो ईश्वर ही जानें। घर को बनाने, बसाने की कँचन की हर कोशिश शैल को नागवार गुज़रती। जब किसी को कोई व्यक्ति अप्रिय होता है तो उसके द्वारा किया गया हर कार्य अवाँछित लगता है, अतः कँचन एक रूपया भी खर्चती तो वह शैल की नज़रों में फ़िज़ूलखर्ची होता। धीरे-धीरे इन बातों में सास की शह भी शामिल हो गयी। अब हर छोटी से छोटी बात तिल का ताड़ बन जाती। कँचन यह सोचकर सब सहती कि हर घर की यही कहानी होती है, मैं कौन सी अनोखी हूँ। इस बीच आशीष का जन्म हुआ, कँचन को लगा कि शायद अब स्थितियाँ कुछ बदल जायेंगी। लेकिन, ये तो एक मरीचिका थी, और मरीचिका कोई समस्या नहीं कि जिसका कोई हल हो। स्थितियाँ बदलती तो हैं, कँचन की भी बदलीं, पहले से भी बदतर।
आख़िरकार शैल ने सीमायें तोड़ ही दीं और कँचन को पीटते हुये कहा की अग़र ज़रा भी ग़ैरत बाकी है तुझमें तो मुझे अपनी शक़्ल भी न दिखाना। अपमान और तिरस्कार अब असहनीय हो चला था, एक पल भी और इस घर में रुक जाना मानो मृत्यु के सामान था। सहनशक्ति की भी एक सीमा है, हतप्रभ सी कँचन को जीवन की चुनौती स्वीकार करनी थी, रह-रह कर उसे अपने नन्हे शिशु का ख़याल आता और वो सोचती कि एक बालक के लिये माता-पिता समानरूप से आवश्यक हैं, लेकिन उसे यह भी समझ आ चुका था कि स्त्री को अपमानित करने वाला पुरुष एक अच्छा पिता नहीं हो सकता। बिना पिता के शिशु का पालन किया जा सकता है परन्तु असामाजिक पिता एक अच्छी संतति के लिये घातक है। निर्णय लेकर कँचन निकल पड़ी थी जीवन का सामना करने।
कँचन ने अपनी शिक्षा को आगे जारी रखने के साथ-साथ एक विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया। आशीष की परवरिश में कँचन कोई कसर नहीं रहने देना चाहती थी, इसलिये ऍम फ़िल, पीएचडी, नेट सब कर डाला, और आख़िरकार कँचन को व्याख्याता पद मिल ही गया। बच्चा धीरे-धीरे बड़ा हो गया। इंजीनियरिंग करके आशीष की पोस्टिंग मुम्बई में हो गयी थी।
कोई बहुत देर से दरवाज़े की बेल बजाये जा रहा था। आती हूँ, आती हूँ, कह कर कँचन ने दरवाज़ा खोला, देखा तो सामने आशीष खड़ा था। पच्चीस साल का आकर्षक नवयुवक है आशीष। आशीष ने झुककर माँ के पैर छुये, कँचन आश्चर्य से उसे देख रही है, ये पैर क्यों छू रहा है रे। तभी दरवाज़े की ओट से एक सुंदर नवयुवती निकल आयी है, आशीष ने अपनी माँ से उस युवती का परिचय करवाया। माँ यह तुम्हारी बहू निशा हैं, आशीर्वाद नहीं दोगी।
सदा सुखी रहो मेरे बच्चों, ज़रा ठहरो। अंदर से पूजा की थाली ला कर, दोनों की आरती कर गृहप्रवेश कराया। बेटी तुम इस कमरे में आराम करो, किसी प्रकार की चिंता मत करना, आज से मैं ही तुम्हारी माँ हूँ।
चाय का एक कप आशीष को दे कर कँचन सामने बैठी हैं, आशीष भी माँ को देख रहा है। विश्वास है ना माँ मुझपर, आशीष ने पूछा। प्रत्युत्तर में कँचन बस मुस्कुरा दीं।  
सबकुछ बहुत जल्दी में हुआ माँ, तुम्हें ख़बर ही न कर पाया। तुम जानती हो ना, मेरे दोस्त श्याम की शादी थी, जिस लड़की से श्याम की शादी हुयी है, निशा उसी की बड़ी बहन हैं। सभी लोग ये जानने को उत्सुक थे कि बड़ी बहन के अविवाहित होते हुये छोटी बहन की शादी क्यों हो रही है। सभी निशा को अविवाहित समझ रहे थे जबकि सच तो ये था कि इनकी शादी हो चुकी थी और शादी के पंद्रह दिन बाद ही रोड एक्सीडेंट में इनके पति की मृत्यु हो गयी थी। तब से ये अपशकुनी होने का कलंक अपने माथे ढ़ो रही थीं। इनके जीवन में ख़ुशियों के रंग भरने के लिये उसी मण्डप में मैंने निर्णय लिया कि मैं शादी करूँगा तो इन्ही से वरना सारी ज़िन्दगी शादी नहीं करूँगा। मैंने इन्हें अपने निर्णय के बारे में बताया तो इन्होंने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन मेरा निश्चय अडिग था। आख़िरकार सबको राज़ी होना ही पड़ा। बोलो माँ, मैंने सही किया ना?
हाँ, मेरे बच्चे, तुमने बिल्कुल ठीक किया, और कँचन ने उठकर बेटे को गले से लगा लिया। मन ही मन ईश्वर को नमन किया, आज मेरी तपस्या पूर्ण हुई, अब जीवन से कुछ नहीं चाहिये।
- अनामिका 

Saturday, January 16, 2016

(2) "कल्पना" (मेरी दूसरी कहानी)

कल्पना हमारे साथ ग्यारहवीं में पढ़ती थी। सोलह साल की नयी उमर की लड़कियाँ और उनके सुनहरे सपने। पता नहीं उसके कोई सपने थे भी या नहीं, कुछ पता नहीं, कभी पूछा ही नहीं, क्योंकि वो हमसे अलग़ थी, मतलब शादीशुदा थी। लड़कियों के स्कूल में हमारे साथ विज्ञान की छात्रा थी। उसने जीवविज्ञान लिया था, मेरे पास गणित था, बस यही अंतर था हम दोनों में, ये कोई बड़ी बात नहीं थी, बाकि के चार विषय, हिन्दी, अँग्रेज़ी, भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान तो हम लोग साथ ही पढ़ते थे। हमारी प्रायोगिक कक्षायें अलग़-अलग़ होती थीं, कभी साथ नहीं पड़ा तो यह नहीं कह सकती कि वो कितनी अच्छी छात्रा थी, लेकिन इतना तो निश्चित है कि वो ज़रूर एक दृढ़निश्चयी लड़की थी।
मैंने उसे हमेशा दूर से ही देखा लेकिन गंभीरता से देखा, आज 23 साल बाद उसकी कहानी लिख रही हूँ तो ज़रूर ध्यान से ही देखा होगा। दूरी उसके कारण नहीं थी, वो बहुत प्यारी लड़की थी, मैं ही गणित में डूबी रही, दोस्ती करने और लोगों को जानने पर कभी ध्यान ही ना दिया।
मन में ये ज़रूर सोचती कि कोई न कोई मजबूरी ज़रूर रही होगी उसके माता-पिता की, जो उसे इतनी कम उमर में ब्याह दिया। लेकिन ये अच्छा लगता कि कम से कम उसे ज़िन्दगी ने एक मौका और दिया। शादी हो गयी और ज़िन्दगी ख़त्म, ऐसा तो नहीं हुआ उसके साथ।
लेकिन, ज़िन्दगी इतनी आसान कहाँ।
साल बीता और हम बारहवीं में आ गये। कल्पना अब गर्भवती थी। स्कूल में अन्य लड़कियों ने उसके बारे में तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। मैं सब सुनती थी, पर प्रतिक्रिया करना मेरी आदत में शुमार न था, इसलिये, सुना, सब सुना, बहुत बुरा लगा। एक शादीशुदा लड़की ने गर्भवती होकर कोई अपराध तो किया नहीं था, लेकिन, एक बात तभी समझ में आ गयी कि समाज ऐसा ही है। लड़कियों को हर स्थिति में समाज की कसौटी से गुज़रना ही होता है, उनकी इच्छा हो या ना हो। ना ही शादी कर लेने का निर्णय उसने लिया ना ही माँ बनने का या इसके विपरीत, जो भी हो। घटनायें एक-दूसरे से संबन्धित होती हैं फ़िर भी उसे बख़्शा नहीं गया। यहाँ तक कि अध्यापिकाओं ने भी उससे प्रश्न किये कि तुमने इस स्कूल में एडमिशन ही क्यों लिया, यहाँ तो ड्रेस के लिये भी बहुत कड़े निर्देश हैं (ड्रेस में सिर्फ़ स्कर्ट-शर्ट-सॉक्स-शूज़ पहनने की ही अनुमति थी)? वो लड़की, सबकुछ चुपचाप सुनती, शायद ही मैंने उसे कभी किसी को जवाब देते सुना हो। क्या ऐसी लड़की ने अपनी शादी या आने वाले बच्चे का निर्णय ख़ुद लिया होगा? शायद नहीं।
ख़ैर, वक़्त बीता, बीतता ही गया। कल्पना की बेटी हुई और धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। वक़्त ने कल्पना को बहुत कुछ सिखा दिया था, बस वही धैर्यवान, साहसी और दृढ़निश्चयी होने के गुण उसने अपनी बेटी मेघना में विकसित किये। एक सबसे ज़रूरी बात जो उसने मेघना को सिखायी, वो थी, अपने निर्णय स्वयं लेना।
मेघना बचपन से एक होशियार लड़की थी, और अपनी सहनशील माँ का साथ पा कर वह आगे बढ़ती गयी। गणित और भौतिक विज्ञान में अच्छे अंक लेकर पास हुई और भारतीय वायु सेना में ऑफिसर ड्यूटी के लिये मेघना का चयन हो गया।
आज मेघना की शादी उसी के सहपाठी शान्तनु से है। कल्पना की आँखों में दो सितारे से चमक आये हैं, इससे पहले कि ये बूँदें लुढ़क जायें, उन्हें मेरे हाथों ने बढ़कर थाम लिया है।
कल्पना ये ख़ुशी के आँसू हैं, जाया मत करो इन्हें, अभी बहुत लम्हें देखने हैं इन्हें।

Wednesday, May 20, 2015

(1) "सावित्री (मेरी पहली कहानी)"

पाँच बहनों में सबसे ख़ूबसूरत ब्राह्मण-कन्या,सावित्री। माता-पिता ने नाम बस रख दिया, कोई नाम तो रखना ही था। एक वो सावित्री थीं, रूपसी, राजा की पुत्री, राज-कन्या, अपने जीवन के सारे निर्णय लेने के लिये स्वतन्त्र, जो मन को भा गया वही पतिरूप में सदा के लिये स्वीकार्य हो गया, क्षत्राणी थीं, साहस तो रक़्त में व्याप्त था। सबने मना किया कि सत्यवान से विवाह न करो पर राजकन्या के प्रेम के आगे किसकी चली है, यमराज को भी हार माननी पड़ी। पर मेरी सावित्री को तो प्रेम का अधिकार ही नहीं। बचपन बीत गया जवानी के इंतज़ार में और जवानी बीतती जा रही थी, ब्याह के इंतज़ार में। बूढ़े होते जा रहे माता-पिता दिन-रात यही सोचते कि किसी तरह यह कन्या भी हिल्ले लगे। गरीब की कन्या को सुंदर होने का भी अधिकार नहीं होता। मनचाहा वर तो किसी-किसी की तपस्या में होता होगा, सावित्री दिन-रात यही सोचती रहती। देने लायक दहेज़ जुटा सकें इसकी हैसियत तो माता-पिता चार बेटियों का ब्याह करके पहले ही चुका चुके थे, बस किसी तरह इसकी भी गाँठी जुड़े तो गङ्गा नहायें और सत्यनारायण का पाठ धरें।

ख़ैर, देर-अबेर ईश्वर ने उनकी सुन ही ली, एक बिचवानी ने एक रिश्ता बताया। शहर के एक बड़े धनवान ब्राह्मण हैं उन्होंने आपकी कन्या को एक विवाह समारोह में देखा था, उन्हें आपकी कन्या बहुत जँच गयी है, लेन-देन का कोई चक्कर नहीं, ईश्वर की कृपा से सारा घर भरा है, उन्हें कुछ नहीं चाहिये। यह सुनकर तो सावित्री के माता-पिता को तो मानों मुँह मांगी मुराद मिल गयी। फिर भी बिचवानी से पूछ ही लिया, कि ऐसा क्यूँ कि कुछ लेना-देना ही नहीं? बिचवानी बोले, दूसरा ब्याह है, पहली पत्नी इन्हें छोड़कर चली गयी, जीवन काटना कठिन जान पड़ा तो फिर से ब्याह की इच्छा जताये रहे, इसी से हम आपसे बात किये, लड़कियों की कोई कमी थोड़े ही होती है धनवान को। लड़की को सारी उमर बैठाये रखने का इरादा हो तो ना कर दो, कोई गरजू थोड़े ही हैं। इतना कह कर आग-बबूला होते हुये बिचवानी महाराज उठकर जाने लगे, तो सावित्री के पिता उनके पैरों पर गिर पड़े, महाराज हमसे भूल हो गयी जो आपसे सवाल-ज़वाब किये, आप तो हमारे हितैषी ही हैं, मेरी ही मति मारी गयी थी, क्षमा महाराज, क्षमा। अच्छा-अच्छा ठीक है, रहने दो ये सब, रिश्ता पक्का समझूँ फिर? जी महाराज, अवश्य, शुभस्य शीघ्रम। इसी जेठ में ब्याह कर देते हैं।

सावित्री, फिर खो गयी सपनों की दुनिया में? उधर से आती हुई सरिता ने चुटकी ली। ब्याह होगा, मैडम जी का, कार में मायके आयेंगी। सावित्री भी सोचती, कि काश हम-उम्र दूल्हा मिल जाता तो "तुम" करके बात करती, इस अधेड़ को तो सारी उमर "आप" कहना होगा। तीस की होने को आयी थी और ख़ुद को नवयौवना समझ, सपने भी कच्चे देखती थी।

जैसे-तैसे ब्याह निपटा, सारा ख़र्च लड़के वालों की तरफ़ से ही किया गया। नाते-रिश्तेदार सब विदा हुये और विदा होकर सावित्री अपने पति के साथ बंगले पर चली आयी। सावित्री के मन में एक प्रश्न मथता रहता, कि इनकी पहली पत्नी इन जैसे भले मानुष को छोड़ कर, अपना सारा सौभाग्य छोड़कर क्यूँ चली गयी? फिर सोचती कि, ये न हुआ होता तो मेरे भाग्य क्यूँकर खुलते, ख़ैर मुझे क्या, यह सोचते-सोचते नवविवाहिता का शृङ्गार करके, दर्पण में स्वरुप पर ही मुग्ध होती रहती। दिन इसी तरह बीतते गये और सच्चाई की अनगिनत परतें शनैः-शनैः खुलती गयीं। चार वर्ष होने को आये थे विवाह को पर सावित्री की गोद अभी तक सूनी थी। बाँझ के ताने सुन-सुन कर कान पक गये, बेचारी अपने मन की व्यथा किससे कहती। हारकर पति से एक बच्चा गोद लेने के लिये कहा, तो उसने सारी भलमनसाहत का आवरण उतार कर फेंका और एक झन्नाटेदार थप्पड़ सावित्री को रसीद दिया। तेरी हिम्मत कैसे हुई यह बात कहने की? हम ख़ानदानी लोग हैं, हम अपनी वंशबेल किराये के पौधों से नहीं बढ़ाते। सावित्री तो जैसे होश में आ गयी, अब तक जो देखा वो सब स्वप्न था? इस नपुंसक के सम्मान की रक्षा, अब तक क्यूँकर करती रही? मन में कुछ ठानकर आँसू पोछकर सावित्री मुस्कुरा उठी। सावित्री के भीतर एक पत्नी की हत्या हो गयी थी, बची थी तो बस एक औरत।

कुछ दिन बीते और सावित्री के पति ने सत्यार्थ कुमार को अपनी सहायता के लिये काम पर रख लिया और अन्य नौकरों के साथ उनके रहने की व्यवस्था कर दी।

सावित्री का शव विवाहिता के पूरे शृङ्गार के साथ रखा हुआ है, परिवार की सभी स्त्रियाँ सावित्री की चरणरज लेने को व्याकुल हैं। स्त्रियाँ आपस में बातें करती हैं, सती स्त्री थीं सावित्री बहन, जाने से पहले पति की वंशबेल बढ़ा कर ही गयीं, पास ही एक स्त्री की गोद में एक मनोहारी नवजात बालक आकाश को निहारने का असफ़ल प्रयास कर रहा है। यह सावित्री का पुत्र है, सावित्री इस बालक को जन्म देते ही सिधार गयी।

सावित्री के पति श्मशान घाट पर सोच में डूबे खड़े हैं, शून्य में निहारते हैं, बालक के लालन-पालन की चिंता उन्हें खाये जा रही है, तीसरा ब्याह कर लें क्या, सोचते हैं?