अवसर ऋण एक ऐसा नाम है जो मेरे मन की उपज है। जो भी अर्थशास्त्र की सामान्य जानकारी रखते हैं वह "अवसर लागत (Opportunity Cost)" टर्म(पद) से परिचित होंगे। एक बहुत ही साधारण से उदाहरण द्वारा अवसर लागत के एक पक्ष को समझा जा सकता है। मान लीजिये कि आपके पास नौकरी के दो अवसर हैं, दोनों में से आपको एक अवसर का चुनाव करना है। जिस अवसर को आप चुन लेते हैं उसके बदले में दूसरे अवसर से प्राप्त होने वाले अनेक लाभ आप खो देते हैं, यह नुकसान ही "अवसर लागत" है। इसका ठीक-ठीक मापन बहुत कठिन कार्य है क्योंकि बहुत से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नुकसान इसमें शामिल होते हैं।
इसी आधार पर मैंने "अवसर ऋण" टर्म निकाला है। हमारे आस-पास समाज में हमारे अनेक समवयस्क ऐसे हैं जिन्हें अवसर नहीं मिले क्योंकि वो अवसर हमें मिले। हमारे जन्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, जीविकोपार्जन इत्यादि, जीवन के अनेक सोपानों पर किसी न किसी ने वो अवसर खोया है जो हमें मिला है। इस लिहाज़ से हम पर हर उस समवयस्क का ऋण है जिसे सामान अवसर नहीं मिला। इस बात के अनेक कारण हो सकते हैं कि उन्हें अवसर क्यों नहीं मिले, लेकिन इससे भी यह तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता है।
कई बार मैं उदास होना चाहती हूँ, जीवन से निराश होना चाहती हूँ लेकिन इस ऋण का बोझ मुझे ऐसा करने नहीं देता।भले ही हम सब अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़ने के लिये संघर्षरत हैं, हमारे जीवन के लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं, प्राथमिकतायें भिन्न हैं, समस्याऐं भिन्न हैं, परिस्थितियाँ भिन्न हैं, फिर भी यह तथ्य वहीं का वहीं है।
अगली बार निराश या उदास होने से पहले सोचियेगा, कि यह ऋण उतारे बिना मुक्ति नहीं है।
इसी आधार पर मैंने "अवसर ऋण" टर्म निकाला है। हमारे आस-पास समाज में हमारे अनेक समवयस्क ऐसे हैं जिन्हें अवसर नहीं मिले क्योंकि वो अवसर हमें मिले। हमारे जन्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, जीविकोपार्जन इत्यादि, जीवन के अनेक सोपानों पर किसी न किसी ने वो अवसर खोया है जो हमें मिला है। इस लिहाज़ से हम पर हर उस समवयस्क का ऋण है जिसे सामान अवसर नहीं मिला। इस बात के अनेक कारण हो सकते हैं कि उन्हें अवसर क्यों नहीं मिले, लेकिन इससे भी यह तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता है।
कई बार मैं उदास होना चाहती हूँ, जीवन से निराश होना चाहती हूँ लेकिन इस ऋण का बोझ मुझे ऐसा करने नहीं देता।भले ही हम सब अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़ने के लिये संघर्षरत हैं, हमारे जीवन के लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं, प्राथमिकतायें भिन्न हैं, समस्याऐं भिन्न हैं, परिस्थितियाँ भिन्न हैं, फिर भी यह तथ्य वहीं का वहीं है।
अगली बार निराश या उदास होने से पहले सोचियेगा, कि यह ऋण उतारे बिना मुक्ति नहीं है।
No comments:
Post a Comment