Wednesday, November 4, 2015

"अहिंसा"


क्या अहिंसा का अर्थ मात्र हिंसा के अभाव से लिया जा सकता है या इसे इससे अधिक व्यापक अर्थ में समझने की आवश्यकता है? है, क्योंकि, हर स्थान पर शान्ति दिखने को ही शान्ति है ऐसा नहीं माना जा सकता।

शान्ति से सम्बंधित एक बहुप्रचलित मंत्र है जोकि यजुर्वेद से लिया गया है, निम्नप्रकार है:-

ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष: शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्मा शान्ति: सर्वः शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॐ॥
इस मंत्र का अर्थ एवं तात्पर्य सम्पूर्ण जगत में शांति स्थापित करने हेतु है।

यदि अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइये तो आप पायेंगे कि हर व्यक्ति की अपने जीवन में एक ही खोज है, और वह खोज है शांति की खोज। हर व्यक्ति न जाने कब से इस खोज में लगा हुआ है और खोज है कि पूरी होने का नाम ही नहीं लेती। अब प्रश्न यह उठता है कि क्यों यह खोज अनवरत बनी हुई है? कोई ऐसा नहीं मिलता जो अपनी खोज पूरी करके सुस्ताता हुआ मिला हो। खोज पूरी क्यों नहीं होती?

खोज पूरी नहीं होती है और अनवरत बनी हुई है क्योंकि, हम अहिंसा को नहीं जानते हैं। अहिंसा को जाने बिना शांति की खोज कभी पूरी नहीं हो सकती।

अफ़सोस की बात है कि पश्चिमी जगत जिस योग को गले से लगाये बैठा है, उसके अनेक लाभ ले रहा है, और ले चुका है, हम भारतवासी उसके मूल तत्व से ही अनभिज्ञ हैं। स्पष्ट कर दूँ कि, योग का अर्थ अनेक प्रकार के आसान, प्राणायाम या मुद्रायें नहीं है। योग एक जीवन-पद्धति है जिसका आधार अहिंसा है। इस अहिंसा का आरम्भ आपकी स्वयं पर अहिंसा से होता है। हममें से अनेक संवेदनशील लोग अहंकारवश, (जी हाँ, अहंकारवश, क्योंकि बहुत सी घटनाओं पर मानव का कोई नियंत्रण ही नहीं होता है, परन्तु मानव स्वभाववश हर प्रक्रिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है) अनेक प्रकार की घटनाओं के लिये स्वयं को उत्तरदायी समझते हैं और लम्बे समय तक स्वयं को क्षमा नहीं करते, दूसरे शब्दों में कहूँ तो ये कि, ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर बहुत सी घटनाओं के लिये ख़ुद को दोषी समझते रहते हैं, ख़ुद से नाराज़ रहते हैं, और यही नाराज़गी बहुत सी शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं के रूप में प्रकट होती है। इन बीमारियों (व्याधियों) के इलाज़ के लिये आप डॉक्टर्स के चक्कर काटते हैं, लेकिन नतीज़ा सिफ़र(शून्य) मिलता है, आपके सारे परीक्षणों (tests) के परिणाम(reports) सही आते हैं। अब आप और आपका डॉक्टर समझ नहीं पाता है कि आख़िर समस्या की जड़ कहाँ है। मुश्क़िल है जड़ तक पहुँचना, क्योंकि वर्तमान चिकित्सा पद्धति लक्षणों का इलाज़ करने के लिये विकसित हुई है, कारणों का इलाज़ करने के लिये नहीं। 

यदि स्वस्थ रहने की आपकी इच्छा है तो अहिंसा ही वह मूलभूत औषधि है, जिसका आपको प्रयोग नहीं बल्कि पालन करना है। मृत्यु तो अंतिम सत्य है ही, स्वयं को क्षमा करके भी और स्वयं पर क्रोधित रहते हुये भी।

यही अहिंसा की मूल अवधारणा है, स्वयं को क्षमा करो और दूसरों को भी।

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