कल्पना हमारे साथ ग्यारहवीं में पढ़ती थी। सोलह साल की नयी उमर की लड़कियाँ और उनके सुनहरे सपने। पता नहीं उसके कोई सपने थे भी या नहीं, कुछ पता नहीं, कभी पूछा ही नहीं, क्योंकि वो हमसे अलग़ थी, मतलब शादीशुदा थी। लड़कियों के स्कूल में हमारे साथ विज्ञान की छात्रा थी। उसने जीवविज्ञान लिया था, मेरे पास गणित था, बस यही अंतर था हम दोनों में, ये कोई बड़ी बात नहीं थी, बाकि के चार विषय, हिन्दी, अँग्रेज़ी, भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान तो हम लोग साथ ही पढ़ते थे। हमारी प्रायोगिक कक्षायें अलग़-अलग़ होती थीं, कभी साथ नहीं पड़ा तो यह नहीं कह सकती कि वो कितनी अच्छी छात्रा थी, लेकिन इतना तो निश्चित है कि वो ज़रूर एक दृढ़निश्चयी लड़की थी।
मैंने उसे हमेशा दूर से ही देखा लेकिन गंभीरता से देखा, आज 23 साल बाद उसकी कहानी लिख रही हूँ तो ज़रूर ध्यान से ही देखा होगा। दूरी उसके कारण नहीं थी, वो बहुत प्यारी लड़की थी, मैं ही गणित में डूबी रही, दोस्ती करने और लोगों को जानने पर कभी ध्यान ही ना दिया।
मन में ये ज़रूर सोचती कि कोई न कोई मजबूरी ज़रूर रही होगी उसके माता-पिता की, जो उसे इतनी कम उमर में ब्याह दिया। लेकिन ये अच्छा लगता कि कम से कम उसे ज़िन्दगी ने एक मौका और दिया। शादी हो गयी और ज़िन्दगी ख़त्म, ऐसा तो नहीं हुआ उसके साथ।
लेकिन, ज़िन्दगी इतनी आसान कहाँ।
साल बीता और हम बारहवीं में आ गये। कल्पना अब गर्भवती थी। स्कूल में अन्य लड़कियों ने उसके बारे में तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। मैं सब सुनती थी, पर प्रतिक्रिया करना मेरी आदत में शुमार न था, इसलिये, सुना, सब सुना, बहुत बुरा लगा। एक शादीशुदा लड़की ने गर्भवती होकर कोई अपराध तो किया नहीं था, लेकिन, एक बात तभी समझ में आ गयी कि समाज ऐसा ही है। लड़कियों को हर स्थिति में समाज की कसौटी से गुज़रना ही होता है, उनकी इच्छा हो या ना हो। ना ही शादी कर लेने का निर्णय उसने लिया ना ही माँ बनने का या इसके विपरीत, जो भी हो। घटनायें एक-दूसरे से संबन्धित होती हैं फ़िर भी उसे बख़्शा नहीं गया। यहाँ तक कि अध्यापिकाओं ने भी उससे प्रश्न किये कि तुमने इस स्कूल में एडमिशन ही क्यों लिया, यहाँ तो ड्रेस के लिये भी बहुत कड़े निर्देश हैं (ड्रेस में सिर्फ़ स्कर्ट-शर्ट-सॉक्स-शूज़ पहनने की ही अनुमति थी)? वो लड़की, सबकुछ चुपचाप सुनती, शायद ही मैंने उसे कभी किसी को जवाब देते सुना हो। क्या ऐसी लड़की ने अपनी शादी या आने वाले बच्चे का निर्णय ख़ुद लिया होगा? शायद नहीं।
ख़ैर, वक़्त बीता, बीतता ही गया। कल्पना की बेटी हुई और धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। वक़्त ने कल्पना को बहुत कुछ सिखा दिया था, बस वही धैर्यवान, साहसी और दृढ़निश्चयी होने के गुण उसने अपनी बेटी मेघना में विकसित किये। एक सबसे ज़रूरी बात जो उसने मेघना को सिखायी, वो थी, अपने निर्णय स्वयं लेना।
मेघना बचपन से एक होशियार लड़की थी, और अपनी सहनशील माँ का साथ पा कर वह आगे बढ़ती गयी। गणित और भौतिक विज्ञान में अच्छे अंक लेकर पास हुई और भारतीय वायु सेना में ऑफिसर ड्यूटी के लिये मेघना का चयन हो गया।
आज मेघना की शादी उसी के सहपाठी शान्तनु से है। कल्पना की आँखों में दो सितारे से चमक आये हैं, इससे पहले कि ये बूँदें लुढ़क जायें, उन्हें मेरे हाथों ने बढ़कर थाम लिया है।
कल्पना ये ख़ुशी के आँसू हैं, जाया मत करो इन्हें, अभी बहुत लम्हें देखने हैं इन्हें।
मैंने उसे हमेशा दूर से ही देखा लेकिन गंभीरता से देखा, आज 23 साल बाद उसकी कहानी लिख रही हूँ तो ज़रूर ध्यान से ही देखा होगा। दूरी उसके कारण नहीं थी, वो बहुत प्यारी लड़की थी, मैं ही गणित में डूबी रही, दोस्ती करने और लोगों को जानने पर कभी ध्यान ही ना दिया।
मन में ये ज़रूर सोचती कि कोई न कोई मजबूरी ज़रूर रही होगी उसके माता-पिता की, जो उसे इतनी कम उमर में ब्याह दिया। लेकिन ये अच्छा लगता कि कम से कम उसे ज़िन्दगी ने एक मौका और दिया। शादी हो गयी और ज़िन्दगी ख़त्म, ऐसा तो नहीं हुआ उसके साथ।
लेकिन, ज़िन्दगी इतनी आसान कहाँ।
साल बीता और हम बारहवीं में आ गये। कल्पना अब गर्भवती थी। स्कूल में अन्य लड़कियों ने उसके बारे में तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। मैं सब सुनती थी, पर प्रतिक्रिया करना मेरी आदत में शुमार न था, इसलिये, सुना, सब सुना, बहुत बुरा लगा। एक शादीशुदा लड़की ने गर्भवती होकर कोई अपराध तो किया नहीं था, लेकिन, एक बात तभी समझ में आ गयी कि समाज ऐसा ही है। लड़कियों को हर स्थिति में समाज की कसौटी से गुज़रना ही होता है, उनकी इच्छा हो या ना हो। ना ही शादी कर लेने का निर्णय उसने लिया ना ही माँ बनने का या इसके विपरीत, जो भी हो। घटनायें एक-दूसरे से संबन्धित होती हैं फ़िर भी उसे बख़्शा नहीं गया। यहाँ तक कि अध्यापिकाओं ने भी उससे प्रश्न किये कि तुमने इस स्कूल में एडमिशन ही क्यों लिया, यहाँ तो ड्रेस के लिये भी बहुत कड़े निर्देश हैं (ड्रेस में सिर्फ़ स्कर्ट-शर्ट-सॉक्स-शूज़ पहनने की ही अनुमति थी)? वो लड़की, सबकुछ चुपचाप सुनती, शायद ही मैंने उसे कभी किसी को जवाब देते सुना हो। क्या ऐसी लड़की ने अपनी शादी या आने वाले बच्चे का निर्णय ख़ुद लिया होगा? शायद नहीं।
ख़ैर, वक़्त बीता, बीतता ही गया। कल्पना की बेटी हुई और धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। वक़्त ने कल्पना को बहुत कुछ सिखा दिया था, बस वही धैर्यवान, साहसी और दृढ़निश्चयी होने के गुण उसने अपनी बेटी मेघना में विकसित किये। एक सबसे ज़रूरी बात जो उसने मेघना को सिखायी, वो थी, अपने निर्णय स्वयं लेना।
मेघना बचपन से एक होशियार लड़की थी, और अपनी सहनशील माँ का साथ पा कर वह आगे बढ़ती गयी। गणित और भौतिक विज्ञान में अच्छे अंक लेकर पास हुई और भारतीय वायु सेना में ऑफिसर ड्यूटी के लिये मेघना का चयन हो गया।
आज मेघना की शादी उसी के सहपाठी शान्तनु से है। कल्पना की आँखों में दो सितारे से चमक आये हैं, इससे पहले कि ये बूँदें लुढ़क जायें, उन्हें मेरे हाथों ने बढ़कर थाम लिया है।
कल्पना ये ख़ुशी के आँसू हैं, जाया मत करो इन्हें, अभी बहुत लम्हें देखने हैं इन्हें।
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