गिरिजा देवी, यही नाम था अजिया का। अजिया मतलब, दूर के रिश्ते में वो मेरी नानी की सास लगीं। जब हम लोग नानी के गाँव जाते तो उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुये बिना न रह पाते थे। वो जानती थीं कि हम बच्चे शहर के स्कूलों में पढ़ते हैं, गाँव की बोली-भाषा हमारे पल्ले नहीं पड़ेगी और हम लोग पगलैट नज़र आयेंगे, इसलिये हम लोगों से खड़ी बोली हिंदी में ही बात करतीं थीं। उनका स्वर बहुत रौबदार हुआ करता। गोरा-चिट्टा रंग-रूप और कलफ़दार सूती साड़ी पहने वह किसी सुंदरी से कम न लगती थीं। उनका पक्का मकान गाँव में सबसे अच्छा था। घर से लगा हुआ पक्की जगत वाला, मीठे पानी का एक पुश्तैनी कुआँ था। हम बच्चों के लिये कुँए से पानी भरकर लाना एक मजेदार अनुभव होता था।
दादा-अजिया शहर की सरकारी नौकरी से रिटायर होकर गाँव वाले अपने पक्के मकान में आकर बस गये थे। एक पक्का मकान अब शहर में भी था। अजिया की एकमात्र संतान उनका पुत्र था। वह शहर में बैंक में काम करते, देखने-सुनने में बेहतरीन, पर उन्हें शराब पीने की बुरी लत लगी हुई थी। हर महीने के अंत में मिलने वाली सारी तनख़्वाह इसी लत को समर्पित थी। हर बस वाला जिससे वो गाँव आते-जाते थे उन्हें पियक्कड़ बाबू के नाम से जानता था। पियक्कड़ बाबू जब इस लत के शिकार नहीं थे तब उनका विवाह एक सुंदर-सुशील कन्या जानकी के साथ हुआ था और इस युगल के दो पुत्र थे। यह परिवार शहर वाले मकान में रहता था। बच्चे शहर में ही स्कूलों में पढ़ते थे।
अपने बेटे की शराब पीने की लत से अजिया बहुत दुःखी रहतीं और सोचतीं कि किसी प्रकार इस दुर्गति से छुटकारा मिले।लेकिन वो दोहा है ना,
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय।।
उसी प्रकार, एक बार बिगड़े हुये बाग़ को तो फ़िर से बसाया जा सकता है पर बिगड़ी संतति को फ़िर से बनाने का कोई उपाय नहीं, निश्चितरूप से कोई उपाय नहीं। एक संतान आगे आने वाली कई पीढ़ियों की वाहक होती है, वह उन्हीं संस्कारों को लेकर आगे बढ़ती है जो उसे विरासत में मिले हैं, आप लाख़ प्रयास कर लें इसे बदल पाना अत्यंत कठिन है।
अंततः वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था, पर जो होकर ही रहा। पिता की देखादेखी वही करतूतें अजिया के बड़े पोते ने भी शुरू कर दीं, दिन बीतने की देर न थी कि छोटा भाई भी उसी राह पर। दो सुंदर-सुंदर बच्चे जो बड़े तो हुये पर इंसान न बन पाये।
जैसी जिसकी आदतें होती हैं उसका उठना-बैठना भी समान आदतों वालों के साथ होता है। इसी संगति के चलते शहर वाले मकान पर दबंगों का कब्ज़ा हुआ और गाँव की ज़मीन भी बिक गयी। ले दे कर गाँव का मकान ही बचा था जिसमें अब बस अजिया ही जीवित बची थीं।
इंसान चाहें शिशु हो या युवा या वृद्ध, एक बात जो जीवन की हर अवस्था में समानरूप से उपस्थित रहती है वह है भूख़, यह मृत्यु के साथ ही समाप्त होती है। अजिया का परिवार पतन के उस दौर से गुज़र रहा था जो अपनी नियति के लिये स्वयं उत्तरदायी था। आर्थिक सम्पन्नता क्या चीज़ है, कुछ नहीं। अजिया से अधिक धनी स्त्री तो पूरे गाँव में नहीं थी। चल-अचल सब संपत्ति थी उनके पास, आह दुर्भाग्य! आज यह कि एक रोटी के लिये वह सबके दर पर जातीं और लोग दुत्कार देते।
नानी सहृदय थीं और अपनी क्षमता भर उनकी सेवा करतीं फ़िर भी, अपनों की कमी उन वृद्ध स्त्री के हृदय पर गहरा आघात कर गयी थी।
बहुत दिनों के बाद मेरा गाँव जाना हुआ। देखा तो उनके मकान पर ताला लगा था। मैंने नानी से पूछा, अजिया कहाँ गयीं। नानी ने बताया कि दो दिन तक किवाड़ नहीं खुले और तोड़ कर देखा गया। वो खटिया पर निष्प्राण पड़ी थीं। आख़िर साँसों की डोर कब तक थमी रहती।
- अनामिका
दादा-अजिया शहर की सरकारी नौकरी से रिटायर होकर गाँव वाले अपने पक्के मकान में आकर बस गये थे। एक पक्का मकान अब शहर में भी था। अजिया की एकमात्र संतान उनका पुत्र था। वह शहर में बैंक में काम करते, देखने-सुनने में बेहतरीन, पर उन्हें शराब पीने की बुरी लत लगी हुई थी। हर महीने के अंत में मिलने वाली सारी तनख़्वाह इसी लत को समर्पित थी। हर बस वाला जिससे वो गाँव आते-जाते थे उन्हें पियक्कड़ बाबू के नाम से जानता था। पियक्कड़ बाबू जब इस लत के शिकार नहीं थे तब उनका विवाह एक सुंदर-सुशील कन्या जानकी के साथ हुआ था और इस युगल के दो पुत्र थे। यह परिवार शहर वाले मकान में रहता था। बच्चे शहर में ही स्कूलों में पढ़ते थे।
अपने बेटे की शराब पीने की लत से अजिया बहुत दुःखी रहतीं और सोचतीं कि किसी प्रकार इस दुर्गति से छुटकारा मिले।लेकिन वो दोहा है ना,
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय।।
उसी प्रकार, एक बार बिगड़े हुये बाग़ को तो फ़िर से बसाया जा सकता है पर बिगड़ी संतति को फ़िर से बनाने का कोई उपाय नहीं, निश्चितरूप से कोई उपाय नहीं। एक संतान आगे आने वाली कई पीढ़ियों की वाहक होती है, वह उन्हीं संस्कारों को लेकर आगे बढ़ती है जो उसे विरासत में मिले हैं, आप लाख़ प्रयास कर लें इसे बदल पाना अत्यंत कठिन है।
अंततः वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था, पर जो होकर ही रहा। पिता की देखादेखी वही करतूतें अजिया के बड़े पोते ने भी शुरू कर दीं, दिन बीतने की देर न थी कि छोटा भाई भी उसी राह पर। दो सुंदर-सुंदर बच्चे जो बड़े तो हुये पर इंसान न बन पाये।
जैसी जिसकी आदतें होती हैं उसका उठना-बैठना भी समान आदतों वालों के साथ होता है। इसी संगति के चलते शहर वाले मकान पर दबंगों का कब्ज़ा हुआ और गाँव की ज़मीन भी बिक गयी। ले दे कर गाँव का मकान ही बचा था जिसमें अब बस अजिया ही जीवित बची थीं।
इंसान चाहें शिशु हो या युवा या वृद्ध, एक बात जो जीवन की हर अवस्था में समानरूप से उपस्थित रहती है वह है भूख़, यह मृत्यु के साथ ही समाप्त होती है। अजिया का परिवार पतन के उस दौर से गुज़र रहा था जो अपनी नियति के लिये स्वयं उत्तरदायी था। आर्थिक सम्पन्नता क्या चीज़ है, कुछ नहीं। अजिया से अधिक धनी स्त्री तो पूरे गाँव में नहीं थी। चल-अचल सब संपत्ति थी उनके पास, आह दुर्भाग्य! आज यह कि एक रोटी के लिये वह सबके दर पर जातीं और लोग दुत्कार देते।
नानी सहृदय थीं और अपनी क्षमता भर उनकी सेवा करतीं फ़िर भी, अपनों की कमी उन वृद्ध स्त्री के हृदय पर गहरा आघात कर गयी थी।
बहुत दिनों के बाद मेरा गाँव जाना हुआ। देखा तो उनके मकान पर ताला लगा था। मैंने नानी से पूछा, अजिया कहाँ गयीं। नानी ने बताया कि दो दिन तक किवाड़ नहीं खुले और तोड़ कर देखा गया। वो खटिया पर निष्प्राण पड़ी थीं। आख़िर साँसों की डोर कब तक थमी रहती।
- अनामिका
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