भोर का समय है, चहुँ ओर अन्धकार व्याप्त है, प्राची के आकाश पर भगवान विवस्वान का रथ अभी भी उपस्थित नहीं है। गँगा नदी के तट के समीप निविड़ नीरव अरण्य में स्थित आश्रम में एक ऋषि तपस्या में लीन हैं। शांत मुख मंडल और शांत धरा। ऋषि पत्नी नित्यप्रति की भाँति व्यस्त हैं, अभी ऋषि गौतम गँगा स्नान के लिये जायेंगे, उनके लिये वस्त्र इत्यादि व्यवस्थित कर लूँ। वर्षों से नित्य-प्रति का यही नियम। ऋषि गौतम न्यायशास्त्र की रचना में लीन हैं, समर्पित पत्नी के होने से जीवन के कितने ही अभाव दूर हो गये हैं, कितने संतुष्ट और शांत हैं। न्यायशास्त्र की रचना करना क्या विचलित मनःस्थिति में संभव होता, कदाचित नहीं।
आह, ऋषि गौतम और ऋषि पत्नी इंद्र-चंद्र के खलयंत्र से कैसे अनभिज्ञ रह गये? अपने तेज़ से भूत-भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले ऋषि गौतम कैसे आप अनभिज्ञ रहे? या मात्र परीक्षा ही लेनी थी आपको अपनी पतिव्रता स्त्री की? विश्वास कैसे खण्डित हुआ? आने वाला समय प्रश्न अवश्य पूछेगा।
पुनः भोर है, वही दिनचर्या, नहीं, यह भोर भिन्न है, कुछ अवश्य ही सही नहीं है। ऋषि गौतम इतने शीघ्र स्नान से लौट आये हैं, यह कैसे? आकर पत्नी का सानिध्य चाहते हैं, क्यों? पति पर संदेह अहिल्या करें, यह कैसे संभव है? नहीं, यह छल है, छल, छल कैसे? पति पर संदेह, घोर अपराध। यही तो शिक्षा पायी है अहिल्या ने, पति समर्पण ही स्त्री-धर्म है। धर्म विमुख कैसे हो सकती हैं, नहीं हो सकतीं।
ऋषि गौतम गँगा-स्नान से वापस आकर, अपने आश्रम से अपनी ही छवि वाले मनुष्य को निकलते देख रुक जाते हैं। सहस्राक्ष शचीपति देवराज, क्यों? द्वारपाल के रूप में चंद्र, क्यों? कामी-लोलुप इंद्र-चंद्र द्वै, खलयंत्रकारी समुच्चय। तपस्या से उत्पन्न तेज अब क्रोधाग्नि में परिवर्तित हो चुका था, अहिल्या के सतीत्व पर कुदृष्टि डालने वाले देवराज, आज से तू पद्च्युत हो जा, तेरे सारे शरीर पर सहस्र नेत्र उग आयें, कभी कोई तेरी आराधना न करे, तुझसे कुछ याचना न करे, हे चंद्र, तेरी ओर देखने वाला कलंकी हो, नीच।
ऋषि पत्नी अहिल्या यह देख-सुनकर उसी क्षण शिला समान हो भूमि पर स्थापित हुईं, यह कैसा दुर्भाग्य, यह कैसा अनर्थ हुआ। क्या समर्पण ही मेरा दोष, क्या विश्वास ही मेरा दोष?
ऋषि गौतम ने आश्रम त्याग दिया, अहिल्या शिलारूप में वहीं रह गयीं। अनेक युग बीत गये।
दो सुकुमार बालक अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के साथ वन भ्रमण पर आये हैं। पुनः भोर का समय है, भगवान विवस्वान के उदय के साथ ही दूर गहन वन में एक निर्जीव आश्रम दृष्टिगोचर होता है। बालक अपने गुरु से प्रश्न करते हैं, गुरु जी, यह कोई आश्रम प्रतीत होता है, परन्तु इतना निर्जीव क्यों है? किसी पशु-पक्षी के भी दर्शन नहीं होते? ऋषि विश्वामित्र निर्देश देते हैं, बालकों, यह ऋषि गौतम का आश्रम है, उनकी पत्नी तपस्या में लीन हैं, जाकर उनके दर्शन करो पुत्र।
राम, ऋषि पत्नी अहिल्या के समीप हैं, अहिल्या के प्रथम दर्शन पाने वाले राम उनकी चरणरज लेकर माथे से लगाते हैं। अहिल्या नेत्र खोल देती हैं, राम, पुत्र राम। शिलारूप प्राप्त ऋषि पत्नी पुत्र राम के स्पर्श मात्र से जैसे सजीव हो उठी थीं। राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है, अहिल्या के नेत्रों से इतने दिनों का संचित अपराधबोध बह निकलता है जैसे आज सारी सीमायें तोड़ ही देगा। राम, मेरे राम, मेरा....कुछ नहीं माँ, आप सदा वंदनीया, प्रातः स्मरणीया हैं, आप ऋषि पत्नी हैं माँ। शांत होइये, मुझे आशीर्वाद दीजिये माँ।
सदा सुखी रहो राम, विजयी भव पुत्र।
सजल नेत्रों से राम को विदा करती हैं ऋषि पत्नी।
(पौराणिक कथाओं की अधिक जानकारी मुझे नहीं है, संदर्भ व प्रसंग में त्रुटियाँ संभव हैं, अतः आप सभी से अनुरोध है कि इसे एक काल्पनिक कथा ही मानें
आह, ऋषि गौतम और ऋषि पत्नी इंद्र-चंद्र के खलयंत्र से कैसे अनभिज्ञ रह गये? अपने तेज़ से भूत-भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले ऋषि गौतम कैसे आप अनभिज्ञ रहे? या मात्र परीक्षा ही लेनी थी आपको अपनी पतिव्रता स्त्री की? विश्वास कैसे खण्डित हुआ? आने वाला समय प्रश्न अवश्य पूछेगा।
पुनः भोर है, वही दिनचर्या, नहीं, यह भोर भिन्न है, कुछ अवश्य ही सही नहीं है। ऋषि गौतम इतने शीघ्र स्नान से लौट आये हैं, यह कैसे? आकर पत्नी का सानिध्य चाहते हैं, क्यों? पति पर संदेह अहिल्या करें, यह कैसे संभव है? नहीं, यह छल है, छल, छल कैसे? पति पर संदेह, घोर अपराध। यही तो शिक्षा पायी है अहिल्या ने, पति समर्पण ही स्त्री-धर्म है। धर्म विमुख कैसे हो सकती हैं, नहीं हो सकतीं।
ऋषि गौतम गँगा-स्नान से वापस आकर, अपने आश्रम से अपनी ही छवि वाले मनुष्य को निकलते देख रुक जाते हैं। सहस्राक्ष शचीपति देवराज, क्यों? द्वारपाल के रूप में चंद्र, क्यों? कामी-लोलुप इंद्र-चंद्र द्वै, खलयंत्रकारी समुच्चय। तपस्या से उत्पन्न तेज अब क्रोधाग्नि में परिवर्तित हो चुका था, अहिल्या के सतीत्व पर कुदृष्टि डालने वाले देवराज, आज से तू पद्च्युत हो जा, तेरे सारे शरीर पर सहस्र नेत्र उग आयें, कभी कोई तेरी आराधना न करे, तुझसे कुछ याचना न करे, हे चंद्र, तेरी ओर देखने वाला कलंकी हो, नीच।
ऋषि पत्नी अहिल्या यह देख-सुनकर उसी क्षण शिला समान हो भूमि पर स्थापित हुईं, यह कैसा दुर्भाग्य, यह कैसा अनर्थ हुआ। क्या समर्पण ही मेरा दोष, क्या विश्वास ही मेरा दोष?
ऋषि गौतम ने आश्रम त्याग दिया, अहिल्या शिलारूप में वहीं रह गयीं। अनेक युग बीत गये।
दो सुकुमार बालक अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के साथ वन भ्रमण पर आये हैं। पुनः भोर का समय है, भगवान विवस्वान के उदय के साथ ही दूर गहन वन में एक निर्जीव आश्रम दृष्टिगोचर होता है। बालक अपने गुरु से प्रश्न करते हैं, गुरु जी, यह कोई आश्रम प्रतीत होता है, परन्तु इतना निर्जीव क्यों है? किसी पशु-पक्षी के भी दर्शन नहीं होते? ऋषि विश्वामित्र निर्देश देते हैं, बालकों, यह ऋषि गौतम का आश्रम है, उनकी पत्नी तपस्या में लीन हैं, जाकर उनके दर्शन करो पुत्र।
राम, ऋषि पत्नी अहिल्या के समीप हैं, अहिल्या के प्रथम दर्शन पाने वाले राम उनकी चरणरज लेकर माथे से लगाते हैं। अहिल्या नेत्र खोल देती हैं, राम, पुत्र राम। शिलारूप प्राप्त ऋषि पत्नी पुत्र राम के स्पर्श मात्र से जैसे सजीव हो उठी थीं। राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है, अहिल्या के नेत्रों से इतने दिनों का संचित अपराधबोध बह निकलता है जैसे आज सारी सीमायें तोड़ ही देगा। राम, मेरे राम, मेरा....कुछ नहीं माँ, आप सदा वंदनीया, प्रातः स्मरणीया हैं, आप ऋषि पत्नी हैं माँ। शांत होइये, मुझे आशीर्वाद दीजिये माँ।
सदा सुखी रहो राम, विजयी भव पुत्र।
सजल नेत्रों से राम को विदा करती हैं ऋषि पत्नी।
(पौराणिक कथाओं की अधिक जानकारी मुझे नहीं है, संदर्भ व प्रसंग में त्रुटियाँ संभव हैं, अतः आप सभी से अनुरोध है कि इसे एक काल्पनिक कथा ही मानें
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