Monday, February 16, 2015

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन, हरण भवभय दारुणं |

नवकंज लोचन कंजमुख, करकंज पदकंजारुणं ||


कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनीलनीरद सुन्दरं |

पटपीत मानहु तड़ित रुचि-शुचि, नौमि जनक सुतावरं ||

भजु दीनबंधु दिनेश, दानव दैत्यवंश निकंदनं |

रघुनंद आंनदकंद, कोशलचंद दशरथनंदनं ||

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु, उदारु अंग विभूषणं |

आजानुभुज शर चाप धर, संग्राम जित खर-दूषणं ||

इति वदित तुलसीदास, शंकरशेषमुनिमनरंजनं |

मम हृदय कुंज निवास कुरु, कामादि खल-दल गंजनं |

मनु जाहि राचेउ मिलिह, सो बरु सहज सुंदर साँवरो |

करुणानिधान सुजान शीलु, सनेहु जानत रावरो ||

एही भाँति गौरी असीस सुनि, सिय सहित हियँ हर्षितअली |

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि, मुदित मन-मंदिर चलीं ||

"जानि गौरी अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाहि कही |
मंजुल-मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे ||"

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