Thursday, November 26, 2015

उच्च शिक्षा: क्या सबके लिये?

मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि उच्चशिक्षा के सम्बंध में कुछ प्रश्न पूछे जायें।
1. क्या वास्तव में उच्च शिक्षा का सुलभ होना देश की प्रगति के लिये उचित है?
2. क्या उच्चशिक्षा हेतु भारत सरकार द्वारा जितना भी धन व्यय किया जाता है वो प्रतिफल में परिवर्तित होता है? (Is the "return of money" equally proportional to the "money spent" in developing the infrastructure for higher education system in India?)
3. क्या कारण हैं कि उच्च शिक्षा रोज़गारप्रद नहीं है?
4. क्या उच्च शिक्षा को जीविकोपार्जन से जोड़ा जाना उचित है?
5. क्या विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्रायें वास्तव में उस शिक्षा को प्राप्त करने योग्य हैं?
6. क्या विश्वविद्यालयों में आने वाले छात्र-छात्रायें स्वयं अपनी इच्छा से, ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं?
7. क्या छात्र-छात्रायें मजबूरी व घरवालों के दबाव में विश्वविद्यालयी शिक्षा का हिस्सा बन रहे हैं?
8. क्या छात्र-छात्रायें मात्र एक फ़ैशन के रूप में और "कुछ नहीं से कुछ अच्छा" के विचार से महाविद्यालय आते हैं?
9. क्या भारत जैसा देश इस प्रकार की फ़ैशनेबल शिक्षा का वहन कर सकता है?
10. क्या ये अच्छा न हो कि जिन लोगों के लिये सरकारी नौकरियों में पद/स्थान आरक्षित हैं उसी वर्ग विशेष के लोग महाविद्यालयों में अपना समय और धन व्यय करें। बाकी बचा-खुचा वर्ग 12th के बाद की पढ़ाई में वह कार्य सीखे जो उसके लिये आगे जाकर जीविकोपार्जन में सहायक सिद्ध हो?

Tuesday, November 17, 2015

अवसर ऋण

अवसर ऋण एक ऐसा नाम है जो मेरे मन की उपज है। जो भी अर्थशास्त्र की सामान्य जानकारी रखते हैं वह "अवसर लागत (Opportunity Cost)" टर्म(पद) से परिचित होंगे। एक बहुत ही साधारण से उदाहरण द्वारा अवसर लागत के एक पक्ष को समझा जा सकता है। मान लीजिये कि आपके पास नौकरी के दो अवसर हैं, दोनों में से आपको एक अवसर का चुनाव करना है। जिस अवसर को आप चुन लेते हैं उसके बदले में दूसरे अवसर से प्राप्त होने वाले अनेक लाभ आप खो देते हैं, यह नुकसान ही "अवसर लागत" है। इसका ठीक-ठीक मापन बहुत कठिन कार्य है क्योंकि बहुत से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नुकसान इसमें शामिल होते हैं।
इसी आधार पर मैंने "अवसर ऋण" टर्म निकाला है। हमारे आस-पास समाज में हमारे अनेक समवयस्क ऐसे हैं जिन्हें अवसर नहीं मिले क्योंकि वो अवसर हमें मिले। हमारे जन्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, जीविकोपार्जन इत्यादि, जीवन के अनेक सोपानों पर किसी न किसी ने वो अवसर खोया है जो हमें मिला है। इस लिहाज़ से हम पर हर उस समवयस्क का ऋण है जिसे सामान अवसर नहीं मिला। इस बात के अनेक कारण हो सकते हैं कि उन्हें अवसर क्यों नहीं मिले, लेकिन इससे भी यह तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता है।
कई बार मैं उदास होना चाहती हूँ, जीवन से निराश होना चाहती हूँ लेकिन इस ऋण का बोझ मुझे ऐसा करने नहीं देता।भले ही हम सब अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़ने के लिये संघर्षरत हैं, हमारे जीवन के लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं, प्राथमिकतायें भिन्न हैं, समस्याऐं भिन्न हैं, परिस्थितियाँ भिन्न हैं, फिर भी यह तथ्य वहीं का वहीं है।
अगली बार निराश या उदास होने से पहले सोचियेगा, कि यह ऋण उतारे बिना मुक्ति नहीं है।

Friday, November 6, 2015

(19) "तुम हो"

अंतहीन आकाश के विस्तार में तुम हो,
सागरों की अतल गहराईयों में तुम हो,
पर्वतों के हृदय की कोमलता में तुम हो,
जल-नृत्य करतीं सुनहरी किरणों में तुम हो,

तितली के पैरों से चिपके पराग में तुम हो,
पुष्पों में सुगंध और पल्लवों के रंग में तुम हो,
काँपती हथेली की झुर्रीदार सलवटों में तुम हो,
नन्हे शिशुओं की अकारण मुस्कानों में तुम हो,

मेरे ईश्वर, जब भी बुलाऊँ, मेरे साथ में तुम हो,
मित्र-सखा, माता-पिता, कण-कण में तुम हो।

Wednesday, November 4, 2015

"अहिंसा"


क्या अहिंसा का अर्थ मात्र हिंसा के अभाव से लिया जा सकता है या इसे इससे अधिक व्यापक अर्थ में समझने की आवश्यकता है? है, क्योंकि, हर स्थान पर शान्ति दिखने को ही शान्ति है ऐसा नहीं माना जा सकता।

शान्ति से सम्बंधित एक बहुप्रचलित मंत्र है जोकि यजुर्वेद से लिया गया है, निम्नप्रकार है:-

ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष: शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्मा शान्ति: सर्वः शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॐ॥
इस मंत्र का अर्थ एवं तात्पर्य सम्पूर्ण जगत में शांति स्थापित करने हेतु है।

यदि अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइये तो आप पायेंगे कि हर व्यक्ति की अपने जीवन में एक ही खोज है, और वह खोज है शांति की खोज। हर व्यक्ति न जाने कब से इस खोज में लगा हुआ है और खोज है कि पूरी होने का नाम ही नहीं लेती। अब प्रश्न यह उठता है कि क्यों यह खोज अनवरत बनी हुई है? कोई ऐसा नहीं मिलता जो अपनी खोज पूरी करके सुस्ताता हुआ मिला हो। खोज पूरी क्यों नहीं होती?

खोज पूरी नहीं होती है और अनवरत बनी हुई है क्योंकि, हम अहिंसा को नहीं जानते हैं। अहिंसा को जाने बिना शांति की खोज कभी पूरी नहीं हो सकती।

अफ़सोस की बात है कि पश्चिमी जगत जिस योग को गले से लगाये बैठा है, उसके अनेक लाभ ले रहा है, और ले चुका है, हम भारतवासी उसके मूल तत्व से ही अनभिज्ञ हैं। स्पष्ट कर दूँ कि, योग का अर्थ अनेक प्रकार के आसान, प्राणायाम या मुद्रायें नहीं है। योग एक जीवन-पद्धति है जिसका आधार अहिंसा है। इस अहिंसा का आरम्भ आपकी स्वयं पर अहिंसा से होता है। हममें से अनेक संवेदनशील लोग अहंकारवश, (जी हाँ, अहंकारवश, क्योंकि बहुत सी घटनाओं पर मानव का कोई नियंत्रण ही नहीं होता है, परन्तु मानव स्वभाववश हर प्रक्रिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है) अनेक प्रकार की घटनाओं के लिये स्वयं को उत्तरदायी समझते हैं और लम्बे समय तक स्वयं को क्षमा नहीं करते, दूसरे शब्दों में कहूँ तो ये कि, ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर बहुत सी घटनाओं के लिये ख़ुद को दोषी समझते रहते हैं, ख़ुद से नाराज़ रहते हैं, और यही नाराज़गी बहुत सी शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं के रूप में प्रकट होती है। इन बीमारियों (व्याधियों) के इलाज़ के लिये आप डॉक्टर्स के चक्कर काटते हैं, लेकिन नतीज़ा सिफ़र(शून्य) मिलता है, आपके सारे परीक्षणों (tests) के परिणाम(reports) सही आते हैं। अब आप और आपका डॉक्टर समझ नहीं पाता है कि आख़िर समस्या की जड़ कहाँ है। मुश्क़िल है जड़ तक पहुँचना, क्योंकि वर्तमान चिकित्सा पद्धति लक्षणों का इलाज़ करने के लिये विकसित हुई है, कारणों का इलाज़ करने के लिये नहीं। 

यदि स्वस्थ रहने की आपकी इच्छा है तो अहिंसा ही वह मूलभूत औषधि है, जिसका आपको प्रयोग नहीं बल्कि पालन करना है। मृत्यु तो अंतिम सत्य है ही, स्वयं को क्षमा करके भी और स्वयं पर क्रोधित रहते हुये भी।

यही अहिंसा की मूल अवधारणा है, स्वयं को क्षमा करो और दूसरों को भी।

सरोगेसी: किराये की कोख़

सरोगेसी यानि किराए की कोख़ पर बहुत कुछ पढ़ा, देखा और सुना, और अंत में जाकर मैं इसी नतीजे पर पहुँची हूँ कि ये स्त्री शरीर के साथ विज्ञान का एक खिलवाड़ है और मैं इस खिलवाड़ के विरोध में हूँ।
अब, बहुत से लोग, जो सरोगेसी के पक्ष में हैं, उनसे निवेदन है कि वो अपना समय मेरे विचारों को आगे पढ़ने में न नष्ट करें।
बिन्दुवार अपने विचार रखने का प्रयास करूँगी:-
1. सरोगेसी के बारे में सबसे ख़तरनाक विचार, जिसके द्वारा स्वस्थ, पढ़ी-लिखी परन्तु आर्थिकरूप से असमर्थ महिलाओं की कंडीशनिंग की जाती है वो ये है कि, सरोगेसी एक बहुत "पुण्य" का काम है, जिसे करके वो किसी दम्पति को ख़ुशी देने जा रही हैं, माँ न बन सकी स्त्री को मातृत्व सुख देने जा रही हैं। अब आप सोचेंगे कि ये ख़तरनाक विचार क्यों हो गया, ये तो बहुत अच्छी सोच है। तो मैं कहूँगी, बिल्कुल अच्छी सोच है यदि, सरोगेसी का निर्णय लेने वाली महिला आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर है (उसे और रुपयों की ज़रुरत नहीं है) तो, ये विचार, अपनी कोख़ का " दान" सर्वथा उचित है। पर समस्या यही है हमारे समाज की, कि हमने "पाप" और "पुण्य" के बड़े-बड़े मानदण्ड बना रखे हैं। यदि कोई महिला सहवास करके गर्भिणी हो जाती है, किन्ही विशेष परिस्थितियों में, तो वो पापी होती है, उसके अलग़ पैमाने, संतान भी अवैध हो गयी फिर। परन्तु यदि वो सेरोगेसी के लिए अपनी कोख़ किराये पर दे देती है, तो वो पुण्यात्मा हो गयी। (यदि इस पूरी प्रक्रिया में धन/मुद्रा न सम्मिलित हो तो शायद इसे पुण्य माना भी जाये, मैं बिल्कुल ऐसा नहीं मानती)
2. सरोगेसी से प्राप्त धन क्या उस महिला को मिलता है जिसने नौ-दस महीने एक जीव को गर्भ में रखा। उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा, क्योकि, आर्थिक कठिनाई, जिसके कारण महिला इस प्रक्रिया के लिए राज़ी हुई थी, वह आर्थिक कठिनाई अकेले महिला की नहीं अपितु पूरे परिवार की है। यदि आर्थिक कठिनाई के कारण महिला को अपनी कोख़ किराये पर चढ़ानी पड़ी तो फिर शरीर बेचना भी वैध होना चाहिये।
3. क्या आप मानते हैं कि गर्भावस्था मात्र नौ-दस महीने की होती है? प्रसव के बाद क्या स्त्री में शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक बदलाव नहीं आते? क्या सरोगेसी इस सब से अछूती है?
4. गर्भावस्था के पूरे काल में कितनी अप्रत्याशित समस्यायें आ सकती हैं। स्त्री की मृत्यु भी हो सकती है। क्या सरोगेसी इन सबसे ऊपर है?
5. आज तक कितनी सक्षम स्त्रियों ने, जो स्वयं डॉक्टर हैं, और सरोगेसी के पक्ष में हैं, सरोगेसी के लिये अपनी कोख़ उधार दी है? बिना स्वयं इस प्रक्रिया का हिस्सा बने, इसके पक्ष में होना आपकी ईमानदारी पर प्रश्न उठाता है। वो बात अलग़ है जब आप स्वयं ही किसी और की सरोगेसी का इंतज़ार कर रही हों।
6. सरोगेसी किसी भी प्रकार से महिला सशक्तिकरण नहीं है। भविष्य में महिलायें यह भी कह सकती हैं कि मैं तो पैसा बना सकती हूँ क्योंकि मेरे पास एक कोख़ है जिसे मैं किराये पर चढ़ा सकती हूँ। मेरा शरीर ही मेरी संपत्ति है।
7. अपने ही बीज का पौधा क्यों चाहिये? इसलिये क्योंकि हम समर्थ हैं, क्योंकि हम पैसा देकर कोख़ उधार ले सकते हैं, क्योंकि हम अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि हमें और चाहिये।
8. यदि किसी स्त्री की माँ, सासू-माँ या कोई और शुभचिंतक ऐसी सहायता करने में समर्थ है, और करता है, तो मैं इसे अनुचित नहीं मानती, पर क्या ऐसा होता है?
यदि आपके पास इनके विपरीत तर्क हैं और उनसे मैं सहमत हूँ तो मैं संशोधन अवश्य करूँगी।