अंतहीन आकाश के विस्तार में तुम हो,
सागरों की अतल गहराईयों में तुम हो,
पर्वतों के हृदय की कोमलता में तुम हो,
जल-नृत्य करतीं सुनहरी किरणों में तुम हो,
तितली के पैरों से चिपके पराग में तुम हो,
पुष्पों में सुगंध और पल्लवों के रंग में तुम हो,
काँपती हथेली की झुर्रीदार सलवटों में तुम हो,
नन्हे शिशुओं की अकारण मुस्कानों में तुम हो,
मेरे ईश्वर, जब भी बुलाऊँ, मेरे साथ में तुम हो,
मित्र-सखा, माता-पिता, कण-कण में तुम हो।
सागरों की अतल गहराईयों में तुम हो,
पर्वतों के हृदय की कोमलता में तुम हो,
जल-नृत्य करतीं सुनहरी किरणों में तुम हो,
तितली के पैरों से चिपके पराग में तुम हो,
पुष्पों में सुगंध और पल्लवों के रंग में तुम हो,
काँपती हथेली की झुर्रीदार सलवटों में तुम हो,
नन्हे शिशुओं की अकारण मुस्कानों में तुम हो,
मेरे ईश्वर, जब भी बुलाऊँ, मेरे साथ में तुम हो,
मित्र-सखा, माता-पिता, कण-कण में तुम हो।
''तुम हो'' बहुत ही शानदार रचना की प्रस्तुति। मेरे ब्लाग पर आपका स्वागत है।
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