आप उम्रदराज़ हो चुके हैं और आप समझते हैं कि प्रेम के बारे में आप सबकुछ जानते हैं। क्या आपको लगता है कि प्रेम ज्ञान का विषय है और आप इसे उम्र के साथ सीखेंगे, क्योंकि ज्ञान तो अनुभवजन्य है ? क्या आपको लगता है कि यह सही दृष्टिकोण है ?
शायद नहीं।
प्रेम इन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय नहीं है अतः आप इसे समझने में चूक जाते हैं, सारी उम्र लगे रहते हैं इसकी ख़ोज में फ़िर भी हाथ ख़ाली रह जाते हैं। क्यों होता है ऐसा?
कुछ रिश्तों में आप अपना समय, पूँजी और भावनायें सब तिरोहित कर देते हैं परंतु अंत समय में उन रिश्तों से जो आपकी अपेक्षायें थीं वह पूरी नहीं होतीं हैं और आप इस दुनिया से अतृप्त चले जाते हैं। आप जानते हैं कि मैं ग़लत नहीं कह रही हूँ।
यहाँ आप मर्म समझ गये होंगे, कि जो प्रेम अपेक्षा के साथ होगा वह दुःख का कारण अवश्य बनेगा।
प्रेम में आपकी अपेक्षा होती है कि कोई आपको प्रेम करे, यह चाहना ही कष्ट का कारण है। आप अपनी स्वयं की प्रेम कर सकने की क्षमता से कितने परिचित हैं ? परिचित हैं भी या नहीं ? कहीं आप सौदेबाज़ी तो नहीं कर रहे हैं, कि तुम फलाँ तरह से बर्ताव करोगे/करोगी तब ही प्रेम होगा नहीं तो नहीं। यह तो किसी तरह से प्रेम नहीं है। यह आपके मन में बसा हुआ वह काल्पनिक स्वरुप है जिसे आप कल्पना में ही प्रेम कर रहे हैं और उसे वास्तविकता में देखना चाहते हैं। जबकि वास्तविकता तो वास्तविकता होती है।
- अनामिका
शायद नहीं।
प्रेम इन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय नहीं है अतः आप इसे समझने में चूक जाते हैं, सारी उम्र लगे रहते हैं इसकी ख़ोज में फ़िर भी हाथ ख़ाली रह जाते हैं। क्यों होता है ऐसा?
कुछ रिश्तों में आप अपना समय, पूँजी और भावनायें सब तिरोहित कर देते हैं परंतु अंत समय में उन रिश्तों से जो आपकी अपेक्षायें थीं वह पूरी नहीं होतीं हैं और आप इस दुनिया से अतृप्त चले जाते हैं। आप जानते हैं कि मैं ग़लत नहीं कह रही हूँ।
यहाँ आप मर्म समझ गये होंगे, कि जो प्रेम अपेक्षा के साथ होगा वह दुःख का कारण अवश्य बनेगा।
प्रेम में आपकी अपेक्षा होती है कि कोई आपको प्रेम करे, यह चाहना ही कष्ट का कारण है। आप अपनी स्वयं की प्रेम कर सकने की क्षमता से कितने परिचित हैं ? परिचित हैं भी या नहीं ? कहीं आप सौदेबाज़ी तो नहीं कर रहे हैं, कि तुम फलाँ तरह से बर्ताव करोगे/करोगी तब ही प्रेम होगा नहीं तो नहीं। यह तो किसी तरह से प्रेम नहीं है। यह आपके मन में बसा हुआ वह काल्पनिक स्वरुप है जिसे आप कल्पना में ही प्रेम कर रहे हैं और उसे वास्तविकता में देखना चाहते हैं। जबकि वास्तविकता तो वास्तविकता होती है।
- अनामिका
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