Wednesday, March 9, 2016

(28) "पता नहीं क्यूँ डरती हूँ।"

स्नेह नहीं लगता है कोमल,
आँसू भी हैं कम ख़ारे,
नेह अब छलकता नहीं,
रिक्त हैं यह कुंभ सारे,

सड़ी हुई लकड़ी होती तो,
उग आते कुछ मशरूम,
किल्ले नहीं फ़ूटेंगे इसमें,
जान नहीं है ज़रा बाकी,

मन की अंतहीन गहराइयों में,
लगाती हूँ इक पुकार,
टकराकर आती नहीं वापस,
खो जाती है वहीं कहीं,

पल-पल बदलते हालातों से,
सिमटते जज़्बातों से,
बढ़ते हुये फ़ासलों से,
ख़ुद के मिट जाने से,
पता नहीं क्यूँ डरती हूँ।
- अनामिका

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