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Tuesday, February 23, 2016

"भारत की सेना और मेरी भावनायें" (संस्मरण)

1996-97 की बात है, उन दिनों अख़बारों में भारतीय वायु सेना में भर्ती के लिये एक विज्ञापन निकला करता था, "क्या आप में है वो बात? (ऐसा ही कुछ)"। "ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर्स" के लिये अविवाहित युवक/युवतियों से आवेदन माँगे गये थे। ग्रेजुएशन में गणित/भौतिकी/रसायन आदि विषयों के प्राप्तांकों के आधार पर चयन के लिये बुलावा पत्र आ सकता था। मैंने भी अप्लाई करने का निर्णय लिया, बुलावे के आ जाने जैसी कोई उम्मीद नहीं थी। आवेदन करने के लिये कोई फ़ीस भी नहीं माँगी गयी थी। आवेदन सादे कागज़ पर हाथ से बनाकर या टाइप्ड प्रति में किया जा सकता था। मैंने एक A4 साइज़ के कागज़ पर हाथ से कॉलम etc. बनाकर आवेदन कर दिया, बस अपने गणित के प्राप्तांकों का भरोसा था जोकि मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा थे, बस यही एक तिनका था। तब मेरा व्यक्तित्व बहुत ही अंतर्मुखी किस्म का था, NCC जैसा भी कभी कुछ किया नहीं था, स्कूल में ज़रूर "स्काउट/गाइड" का थोड़ा प्रशिक्षण मिला था।
ख़ैर आवेदन-पत्र भेज दिया।
उम्मीद के विपरीत बुलावा आ गया, देहरादून के 1AFSB से। आने-जाने का स्लीपर क्लास का किराया और रहने-खाने का इंतज़ाम, यहाँ तक कि रेलवे स्टेशन से सेंटर तक लाने-छोड़ने का भी इन्तज़ाम।
मैं बार-बार बुलावा-पत्र को देखती और इतना खुश होती कि जैसे कोई लॉटरी लग गयी हो।
अब समस्या ये कि मैं परीक्षा देने जाऊँ कैसे?
लेकिन, ज़िद्द थी कि जाना है। वाक़ई, आज मुझे बिल्कुल भी अफ़सोस नहीं है उस दिन के ज़िद्दीपने का। यदि मैं ना गयी होती तो, मैं मेरे आज के अपने होने को सिद्ध न कर पाती। उस परीक्षा ने मेरी आँखें खोल दीं।
मम्मी-पापा को मनाया और देहरादून की यात्रा पर अकेले निकल पड़ी (बाद में कितनी यात्रायें अकेले कीं, पर यह ख़ास है)। एक लड़की जो कभी शहर से बाहर भी अकेले न गयी हो, जिसकी ज़िन्दगी क़िताबों से माथापच्ची में बीती हो, घर के सुरक्षित वातावरण से निकल कर अकेले यात्रा करना उसके लिये सज़ा से कम नहीं था। लेकिन क़माल का विश्वास था मम्मी-पापा को मुझपर, क्यों, ये तो मैं भी नहीं जानती। मम्मी ने कुछ हिदायतें दे कर मेरा हौसला बढ़ा दिया था, और मैं उनसे कह रही थी कि देखना, कल की लौटती गाड़ी से ही वापस आ जाऊँगी।
देहरादून में सब उसी प्रकार हुआ जैसा पत्र में बताया गया था। पूरे भारत से 72 लडकियों को बुलाया गया था, ये था मेरा भारत के हर प्रांत की लड़की से मिलने का पहला अनुभव। हमें रहने आदि के नियम-क़ायदे बता दिये गये। हमें "चेस्ट नंबर" दे दिये गये, अब नंबर ही हमारी पहचान थे, शाम को घर पर फ़ोन करके सूचना देने की अनुमति दी गयी, रात 10:00 बजे के बाद जागने की सख़्त मनाही थी, सुबह नाश्ता वग़ैरह कर के 7:00 बजे रिपोर्ट करना था। दूसरे दिन सुबह ही लोगों का एक "स्क्रीन टेस्ट" हुआ। स्क्रीन टेस्ट में कुछ साइकोलॉजी के टेस्ट, कुछ रीजनिंग इत्यादि के प्रश्न थे।
टेस्ट के बाद हम सबको फ़िर से इकठ्ठा किया गया। अब एनाउन्समेंट होनी थी कि कितने लोगों को आगे के टेस्ट के लिये रुकना है और कितने लोग घर वापस जायेंगे। अभी तक कानपुर की तीन लड़कियाँ थीं।
एनाउंसमेंट हो गयी और मुझे रोक लिया गया। मन बल्लियों उछलने लगा, एक बार फ़िर फ़तह हो गयी थी।
आगे की परीक्षा में तरह-तरह के टेस्ट थे, जैसे कि, सोलो टॉक, ग्रुप डिस्कशन, ग्रुप टास्क, फिजिकल टास्क (सोलो), फिजिकल टास्क (ग्रुप), केस स्टडी एंड स्ट्रेटेजी बिल्डिंग, साइकोलॉजी टेस्ट और पर्सनल इंटरव्यू। मेरे सामने भाषा (अँग्रेज़ी) की समस्या और तैयारी की कमी दोनों ही थीं। वहाँ जिन 32 लड़कियों को रोका गया था, सब एक से बढ़कर एक थीं, मुझसे कहीं ज़्यादा इंफॉर्मड थीं, मैं कच्ची खिलाड़ी थी। 4 दिन बाद मुझे भी घर जाने के लिये बोल दिया गया।
उस दिन के बाद से अँग्रेज़ी भाषा को काबू करना मेरा पहला लक्ष्य हो गया था, ये कहना ग़लत न होगा कि इस एक अकेली परीक्षा ने जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोण को एक पैराडाइम शिफ़्ट दे दिया था, अब मुझे ये पता चल गया था कि कुछ भी पाने के लिये सिर्फ़ प्रतिभा ही काफ़ी नहीं है, लक्ष्य की दिशा में सधे हुये, सतत प्रयास भी करने होंगे।
प्रयास किये और GRE and TOEFL में जाकर ही गाड़ी रुकी।
जीवन सफ़लता और असफ़लता का मिला-जुला रूप है, आप इसे कैसे देखते हैं बस वही महत्वपूर्ण है।
(जनरल बख़्शी के रोने की ख़बर ने न सिर्फ़ मुझे रुला दिया, बल्कि यादों के उस पाले में ले जाकर खड़ा कर दिया जो देहरादून में है। ये वह समय था जब सिर्फ़ "ग्राउंड ड्यूटी" के लिये ही युवतियों के दरवाज़े खोले गये थे, अब समय बहुत बदल गया है)

Tuesday, January 19, 2016

"जैपनीज़ टी सेरेमनी"

जैपनीज़ टी सेरेमनी जापानी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी व्यक्ति के लिये यह एक अद्भुत व अभूतपूर्व बात हो सकती है। अपने अनुभव के आधार पर मैं अवश्य यह कहूँगी कि यदि संभव हो तो इसका अनुभव करना चाहिये।
यह "टी हाउस" हमारे निवास स्थान के बहुत नज़दीक है लेकिन कभी जाने का सोचा नहीं था, कारण था भाषा की जानकारी न होना। उस दिन 5 जनवरी, 2016 को सुबह सेंसेई ने फ़ोन किया, "अनामिका-सान, Are you busy?", (मुझे लगा कि मुझे उनके साथ शायद डांस क्लास में जाना था और मैं भूल गयी हूँ), मैंने पूछा, "Do we have dance class today?", सेंसेई की आवाज़,"No, no, not that, I want you to come for a Japanese Tea Ceremoney today at 1 O'Clock, Can you and Swarnim come? अपने तीन वर्षों के प्रवास में मैंने कभी इस बारे में सोचा ही न था। बेमन से ही सही, मैं राज़ी हो गयी।
हम दोनों सही समय पर कल्चर ज़ोन (जहाँ यह टी हाउस है) पहुँच गये।
वहाँ जाकर सेंसेई से पता चला कि यह विशेष सेरेमनी इस टी हाउस में साल में सिर्फ़ एक बार होती है, उन्हें इसकी जानकारी थी क्योंकि उनके पास पैम्फेलेट्स आते हैं (आते तो हमारे यहाँ भी हैं पर हम कौन सा पढ़ पाते हैं)।
अब हम टी हाउस में जाते हैं, जनवरी की ठंड में ये पहला कोज़ी रूम बड़ा अच्छा लगा। उसके बाद एक "तातामी रूम" है, तातामी रूम में ही बैठकर चाय पी जायेगी। तातामी रूम में जाने से पहले जूते हटाने होते हैं और एक दो सीढ़ी चढ़कर तातामी रूम आता है। इस रूम में तीन तरफ़ लकड़ी की दीवारें हैं और एक तरफ़ की पूरी दीवार काँच की है, यह हिस्सा गार्डन की तरफ़ खुलता है। यह तातामी रूम काफ़ी बड़ा है। हम तीनो लोग, सेंसेई, स्वर्णिम और मैं इस प्रकार बैठाये जाते हैं कि चाय पीते समय हम गार्डन को आराम से देख सकें। चाय सर्व करने वाली महिला प्रौढ़ हैं, उन्होंने किमोनो पहना हुआ है, उनकी सहायिका एक युवती हैं, इन्होंने ही हमें टी रूम में वेलकम किया था। तातामी रूम के बीच में ज़मीन के अंदर एक हीटर रखा है, जिस पर एक लोहे के भारी से बर्तन में पानी गर्म हो रहा है, इस केतलीनुमा बर्तन से पानी की भाप निकल रही है जो कि माहौल को और कोज़ी बना रही है। बर्तन के एक तरफ़ हम तीनो बैठे हैं और दूसरी तरफ़ चाय सर्व करने वाली महिला बैठी हैं। जापानी लोग आराम से वज्रासन में बैठ लेते हैं पर मेरे लिये यह बहुत कठिन काम है अतः हमें विदेशी होने के नाते छूट मिल गयी और हम आराम से सुखासन में बैठ लिये।
चाय सर्व करने से पहले हम तीनों के सामने स्ट्राबेरी फ़्लेवर की एक मिठाई रखी गयी, इसे खाने के लिये बांस के बने छोटे-छोटे चम्मच भी रखे गये। ये चम्मच हैंडमेड थे और उन्होंने ही बनाये थे जो चाय सर्व करने वाली थीं। मिठाई दिये जाने का कारण यह बताया गया कि, "ग्रीन पाउडर्ड टी" जिसे जापानी भाषा में "माचा" कहते हैं पीने में कड़वी होती है, मिठाई के साथ कम कड़वी लगती है। आधी मिठाई खा चुके होने के बाद चाय सर्व की गयी।
चीनी मिट्टी के प्यालों में ग्रीन टी का पाउडर था, हमारे सामने के पानी के बर्तन से, एक बांस के चमचे से, पानी निकाल कर चाय के प्यालों में डाला गया। अब हम तीनों को एक-एक बीटर (बांस का बना हुआ) दिया गया, इस बीटर से चाय के पाउडर और पानी को इस प्रकार मिलाना था कि झाग बन जाये (ऐसी ग्रीन टी मैंने पहली बार ही पी थी, बेशक़ कड़वी ही थी). चाय पीने का यह अनुभव इसलिये ख़ास है कि यह एक परिवेश को सम्पूर्णरूप से आत्मसात करने का अनुभव था, किसी प्रकार की जल्दी नहीं, कोई हड़बड़ी नहीं, चाय पीते हुये बाहर गार्डन को निहारना और तातामी रूम की कोज़ीनेस और हरी चाय की ख़ुशबू को हमेशा के लिये बसा लेना। किसी ज़माने में ये टी हॉउसेज़ मंत्रणा कक्ष होते थे। जापान में टी हाउस अपेक्षाकृत काफ़ी बड़े आकार के होते हैं, यह कोई सामान्य बात नहीं है, क्योंकि यहाँ इतनी जगह तो महँगे रेस्टॉरेंट्स में भी नहीं होती।
टी सेरेमनी के दौरान दो महिला आगंतुक और आयीं, साथ में आये पाँच बच्चे। तीन बच्चे जो शायद नर्सरी या प्ले ग्रुप के बच्चे थे, उन्हें इस एक्सपीरियंस के लिये लाया गया था, बाकी दो बच्चे छोटे थे और अपनी-अपनी मम्मियों से चिपके थे। इन तीनों बच्चों में एक लड़का और दो लड़कियाँ थीं। लड़का हर बात पर सिर हिलाता जा रहा था और जैसे ही मिठाई सर्व की गयी, उसने फ़टाफ़ट निपटाई। मैं मन ही मन सोचती रही कि बेटा अब माचा कैसे निपटाओगे, स्वीटू। बड़ा प्यारा लगा वो नन्हा-मुन्ना। दुनियाभर के लड़के मिठाई के शौक़ीन होते हैं, ये विश्वास भी पुख़्ता हो गया। गोलू-मोलू को वहीं छोड़ हम गार्डन में निकल गये। वहाँ तालाब में मछलियाँ देखीं और प्लम के फ़ूल सूँघते हुये घर वापस आ गये।
इस अनोखे अनुभव के बारे में यही कह सकती हूँ कि कुछ खुशबुएँ और कुछ दृश्य हमेशा के लिये दिल में बस गये।
(अधिक जानकारी के लिये यह लिंक भी शेयर कर रही हूँ:-
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Japanese_tea_ceremony)

Saturday, December 26, 2015

"सम्बन्धों की भावना"

वो भी एक दिसंबर था। उन दिनों मैं hostel में रहकर GRE और TOEFL के exam की तैयारी कर रही थी। क़रीब 6 महीने, लगातार इसकी तैयारी में ख़र्च कर दिये थे, बैरॉन्स, प्रिंसटन, नॉर्मन लुइस, ऑनलाइन GRE क्विज़ेज, मेमोरी कार्ड्स और पता नहीं क्या-क्या।
दिन में ऑफ़िस में काम करती, और सुबह-शाम-रात पढ़ाई और entertainment के नाम पर गाने।
GRE practice test के बारे में एक विश्वास(अंधविश्वास) था कि जितना score आप practice test में करते हैं वही score आपके final में भी आता है। इस विश्वास से डरी हुई मैं सोचती थी कि एकदम एकांत में ही टेस्ट लगाऊँगी, जब किसी भी प्रकार के disturbance की संभावना एकदम ना के बराबर होगी।
एक और बड़ा ही strong belief था मेरा, कि आराम करने वाले कुछ नहीं सीख पाते हैं, तो चाहें सर्दी हो या गर्मी, करना है तो करना है, ज़िद कहते हैं इसे  इसलिये, आधी रात को test लगाने बैठती थी, अपने प्रिय कंप्यूटर पर। GRE test के पहले प्रश्न से ही decide हो जाता है कि आपका graph ऊपर जायेगा या नीचे। अतः पहला प्रश्न सही होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। बहुत गंभीर क़िस्म का test है (कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता था)
ऐसी ही एक सर्द रात को मेरी प्यारी रूममेट (रूम अलग़-अलग़ ही होते थे), को मुझ पर दया आयी और उसने मेरे लिये ग्लास भर चाय बनाकर मुझे दी। मेरे लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित और अनपेक्षित था, उस वक़्त ऐसा ही लगा मानो ज़न्नत मिल गयी है। रात के शायद 3 बजे होंगे। आज भी इतने वर्षों के बाद यह याद इतनी ताज़ा है कि जैसे कल ही की बात हो। वो अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं मैं अपनी, लेकिन ऐसे ही छोटे-छोटे पलों ने जो हमारा सम्बंध जोड़ा वह आजतक क़ायम है। समय और दूरी सम्बन्धों की इस भावना को बदल नहीं पाये इसलिये मैं ईश्वर की बहुत आभारी हूँ, आज भी वो मेरे मन की बात बिना मेरे ज़ाहिर किये समझ जाती हैं।
काश कि हर सम्बंध ऐसा ही हो पाता।
- प्रिय गीता, तुम्हें समर्पित।

Friday, December 25, 2015

"बचपन की यादें और डॉक्टर्स"

जब मैं एक छोटी बच्ची थी, शरारतें करना और खेलना-कूदना यही मेरा पसंदीदा काम था। हर बच्चे का यही काम होता है।
इसी उछल-कूद के चक्कर में एक बार (5~6 वर्ष की उम्र में) मैं ईंटों की बनी क्यारी पर गिर गयी और दायीं आँख के पास चोट आ गयी। तुरंत ही मुझे डॉ. राज लूम्बा के क्लिनिक ले जाया गया। चोट को ठीक करने के लिये टाँके लगाने ज़रूरी थे और उस ज़माने में लोकल एरिया को सुन्न करने वाले ट्रीटमेंट भी नहीं होते थे। एक तो चोट लगने का दर्द और ऊपर से टाँके, करेला वो भी नीम चढ़ा। टाँकों के निशान तो ख़ैर समय के साथ धुँधले होते गये लेकिन यह याद इतनी गहरी है कि आज भी चलचित्र की तरह मानस-पटल पर अंकित है। ये तो बहुत बाद में पता चला कि हमारी यादों और हमारी भावनाओं का आपस में गहरा सम्बंध है, जिस बात से आपके भाव जुड़े हैं उसे भूलना कठिन होता है।
बहुत वर्षों के बाद एक बार फ़िर ख़ुद को उसी स्थिति में पाया। इस बार भी वैसी ही चोट लेकिन मुझे नहीं बेटे को आयी, उसकी भी वही उम्र और भौं (eye brow) पर 1 इंच का तिरछा कट लग गया, उसी तरह उछल-कूद और गिर कर पत्थर से टकराना। भाईसाहब किसी भी तरह डॉक्टर के पास जाने को तैयार न हों, किसी तरह बड़ी मशक्क़त के बाद इन्हें ले जाया गया। इस बार डॉ. संजय त्रिपाठी (लगभग हमारी उम्र के डॉ.) के ट्रॉमा सेंटर ले गए, आख़िर मानना पड़ेगा उनके धैर्य को, एक छोटे बच्चे को समझाते हुये, लोकलाइज़ सुन्न करने का इंजेक्शन भी लगा दिया और टाँके भी लगा दिये। इतनी बारीकी से उन्होंने ये काम किया कि मैं जितना भी आभार व्यक्त करूँ कम ही है। ये सारी प्रक्रिया मेरी आँखों के सामने ही OT में हुई और दिल तो मेरा मज़बूत था ही, क्योंकि ऐसी ही कारगुजारियाँ हम भी करके ही बैठे थे। अब ओखली में सिर दे ही दिया तो मूसल से क्या डर। ☺
जिसने कभी बचपन में खेलकूद वाली चोटें न खायी हों और टाँके न झेले हों वो इसे कितना समझेगा ये तो पता नहीं, लेकिन मैं जब कभी आईने में इस निशान को देखती हूँ तो बस यही ख़याल आता है कि ये गवाह है एक मासूम बचपने का। नहीं क्या ☺

Thursday, September 17, 2015

"इतिहास की परीक्षा"

ये कविता मुझे वर्षों से याद है पर इसके रचयिता का नाम मुझे पता नहीं है। आपमें से किसी को इसकी जानकारी हो तो अवश्य बताइयेगा।
"इतिहास की परीक्षा"
इतिहास की परीक्षा थी उस दिन,
चिंता से हृदय धड़कता था,
जब से जागा सुबह तभी से,
बायाँ नयन फड़कता था,
जो उत्तर मैंने याद किये,
उनमें से आधे याद हुये,
बाकी स्कूल पहुँचने तक,
यादों में बर्बाद हुये,
जो सीट दिखायी दी खाली,
उसपर ही जमकर जा बैठा,
था एक निरीक्षक कमरे में,
आया झल्लाया ऐंठा, बोला,
रे रे, क्यूँ आया करके देरी है,
तू यहाँ कहाँ पर आ बैठा,
उठ जा यह कुर्सी मेरी है,
मैं उचका एक उचक्के सा,
मुझमें सीटों में मैच हुआ,
अकरा-टकरा कर कहीं,
एक कुर्सी के द्वारा कैच हुआ।
पर्चे पर मेरी नज़र पड़ी तो,
सारा बदन पसीना था,
फ़िर भी पर्चे से डरा नहीं,
क्योंकि यह मेरा ही सीना था,
कॉपी के बरगद पर मैंने,
कलम कुल्हाड़ा दे मारा,
घण्टे भर के भीतर कर डाला,
प्रश्नों का वारा न्यारा,
अक़बर का बेटा था बाबर,
जो वायुयान से आया था,
उसने ही हिंदमहासागर,
अमरीका से मँगवाया था,
गौतम जो बुद्ध हुये जाकर,
वे गाँधी जी के चेले थे,
दोनों बचपन में नेहरू के संग,
आँख-मिचौनी खेले थे,
होटल का मालिक था अशोक,
जो ताज़महल में रहता था,
ओ अँग्रेज़ों भारत छोड़ो,
वह लालकिले से कहता था,
झाँसा दे जाती थी,
ऐसी थी झाँसी की रानी,
रोज़ अशोक के होटल में,
खाया करती थी बिरयानी,
ऐसे ही चुन-चुन कर मैंने,
प्रश्नों के पापड़ बेल दिये,
उत्तर के ऊँचे पहाड़,
टीचर की ओर ढ़केल दिये,
टीचर जी बेचारे,
इस ऊँचाई तक क्या चढ़ पाते,
लाचार पुराने चश्में से,
इतिहास नया क्या पढ़ पाते,
उनके बस के बाहर मेरा,
इतिहासों का भूगोल हुआ,
ऐसे में फिर क्या होना था भाई,
मेरा नंबर तो गोल हुआ।
(इसकी मूल कविता के रचयिता थे, ओमप्रकाश आदित्य, एवं कविता का शीर्षक था "इतिहास का पर्चा", मौलिक कविता का स्वरुप इससे भिन्न है)

Friday, March 13, 2015

खूबसूरत रिश्ते

बात उन दिनों की है जब मेरा बेटा ४ महीने का था. पतिदेव तब कनाडा में परास्नातक की पढ़ाई के लिए गए हुए थे और मैं अपने बेटे के साथ अपनी ससुराल रायबरेली में थी. १४ नवम्बर २००४ को बेटे के अन्नप्राशन का मुहूर्त निकला, लेकिन ये क्या, ये तो दीपावली के बाद "भाई-दूज' के त्योहार का दिन था, मेरे माता-पिता मेरे भाई के घर मुंबई गए हुए थे. अब, मुहूर्त तो मुहूर्त, ये न तो बार-बार आते हैं, न बदले जाते हैं, किसी की भावनाओं का इनसे क्या लेना देना।

खैर, सारी तैयारी हुई, मेहमानों से घर भर गया, सभी तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ। लेकिन, एक इंसान तो कहीं न कहीं बहुत अकेला था, पर उससे क्या, मुहूर्त तो फिर मुहूर्त होते हैं. उसी प्रकार बहुत कुछ बस होता है.

दिन गुज़र गया "सत्यनारायण की कथा" में, शाम हुई तब तक मेहमानों का आना लगा रहा, पर एक इंसान को किसी के आने की कोई उम्मीद नहीं थी, कौन आएगा, कानपुर कोई इतना पास भी नहीं है.

अचानक, अपने सामने चाचा-चाची, भाई-बहनों को देख कर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि ये सच है या सपना. शायद मैं इतने बड़े आश्चर्य के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी, उस दिन, मुझे सच में पता चला कि एक परिवार का क्या अर्थ होता है. परिवार सिर्फ दुःख में साथ निभाने के लिए ही ज़रूरी नहीं है, सुख में भी उसकी उतनी ही ज़रुरत होती है.

मेरे मन के भावों को उतनी दूर रह कर भी समझ सकने वाले मेरे चाचा जी श्री विनय कुमार दीक्षित आज इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी ये बहुमूल्य याद मेरे साथ सारी उम्र रहेगी. कुछ लोग कम बातें करते हैं, पर वो जितना समझ लेते हैं उतना कोई नहीं समझ सकता, क्योंकि वो बोलते कम हैं पर सुनते कहीं ज्यादा हैं.

मन की इस बात और याद को आप सब के साथ इसलिए साझा कर रही हूँ क्योंकि बहुत बार हमारा अपने नज़दीकी रिश्तों पर से विश्वास उठ जाता है, शायद इस बात से कोई दूसरी दृष्टि मिले आपको.