Friday, March 13, 2015

खूबसूरत रिश्ते

बात उन दिनों की है जब मेरा बेटा ४ महीने का था. पतिदेव तब कनाडा में परास्नातक की पढ़ाई के लिए गए हुए थे और मैं अपने बेटे के साथ अपनी ससुराल रायबरेली में थी. १४ नवम्बर २००४ को बेटे के अन्नप्राशन का मुहूर्त निकला, लेकिन ये क्या, ये तो दीपावली के बाद "भाई-दूज' के त्योहार का दिन था, मेरे माता-पिता मेरे भाई के घर मुंबई गए हुए थे. अब, मुहूर्त तो मुहूर्त, ये न तो बार-बार आते हैं, न बदले जाते हैं, किसी की भावनाओं का इनसे क्या लेना देना।

खैर, सारी तैयारी हुई, मेहमानों से घर भर गया, सभी तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ। लेकिन, एक इंसान तो कहीं न कहीं बहुत अकेला था, पर उससे क्या, मुहूर्त तो फिर मुहूर्त होते हैं. उसी प्रकार बहुत कुछ बस होता है.

दिन गुज़र गया "सत्यनारायण की कथा" में, शाम हुई तब तक मेहमानों का आना लगा रहा, पर एक इंसान को किसी के आने की कोई उम्मीद नहीं थी, कौन आएगा, कानपुर कोई इतना पास भी नहीं है.

अचानक, अपने सामने चाचा-चाची, भाई-बहनों को देख कर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि ये सच है या सपना. शायद मैं इतने बड़े आश्चर्य के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी, उस दिन, मुझे सच में पता चला कि एक परिवार का क्या अर्थ होता है. परिवार सिर्फ दुःख में साथ निभाने के लिए ही ज़रूरी नहीं है, सुख में भी उसकी उतनी ही ज़रुरत होती है.

मेरे मन के भावों को उतनी दूर रह कर भी समझ सकने वाले मेरे चाचा जी श्री विनय कुमार दीक्षित आज इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी ये बहुमूल्य याद मेरे साथ सारी उम्र रहेगी. कुछ लोग कम बातें करते हैं, पर वो जितना समझ लेते हैं उतना कोई नहीं समझ सकता, क्योंकि वो बोलते कम हैं पर सुनते कहीं ज्यादा हैं.

मन की इस बात और याद को आप सब के साथ इसलिए साझा कर रही हूँ क्योंकि बहुत बार हमारा अपने नज़दीकी रिश्तों पर से विश्वास उठ जाता है, शायद इस बात से कोई दूसरी दृष्टि मिले आपको.

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