जब मैं एक छोटी बच्ची थी, शरारतें करना और खेलना-कूदना यही मेरा पसंदीदा काम था। हर बच्चे का यही काम होता है।
इसी उछल-कूद के चक्कर में एक बार (5~6 वर्ष की उम्र में) मैं ईंटों की बनी क्यारी पर गिर गयी और दायीं आँख के पास चोट आ गयी। तुरंत ही मुझे डॉ. राज लूम्बा के क्लिनिक ले जाया गया। चोट को ठीक करने के लिये टाँके लगाने ज़रूरी थे और उस ज़माने में लोकल एरिया को सुन्न करने वाले ट्रीटमेंट भी नहीं होते थे। एक तो चोट लगने का दर्द और ऊपर से टाँके, करेला वो भी नीम चढ़ा। टाँकों के निशान तो ख़ैर समय के साथ धुँधले होते गये लेकिन यह याद इतनी गहरी है कि आज भी चलचित्र की तरह मानस-पटल पर अंकित है। ये तो बहुत बाद में पता चला कि हमारी यादों और हमारी भावनाओं का आपस में गहरा सम्बंध है, जिस बात से आपके भाव जुड़े हैं उसे भूलना कठिन होता है।
बहुत वर्षों के बाद एक बार फ़िर ख़ुद को उसी स्थिति में पाया। इस बार भी वैसी ही चोट लेकिन मुझे नहीं बेटे को आयी, उसकी भी वही उम्र और भौं (eye brow) पर 1 इंच का तिरछा कट लग गया, उसी तरह उछल-कूद और गिर कर पत्थर से टकराना। भाईसाहब किसी भी तरह डॉक्टर के पास जाने को तैयार न हों, किसी तरह बड़ी मशक्क़त के बाद इन्हें ले जाया गया। इस बार डॉ. संजय त्रिपाठी (लगभग हमारी उम्र के डॉ.) के ट्रॉमा सेंटर ले गए, आख़िर मानना पड़ेगा उनके धैर्य को, एक छोटे बच्चे को समझाते हुये, लोकलाइज़ सुन्न करने का इंजेक्शन भी लगा दिया और टाँके भी लगा दिये। इतनी बारीकी से उन्होंने ये काम किया कि मैं जितना भी आभार व्यक्त करूँ कम ही है। ये सारी प्रक्रिया मेरी आँखों के सामने ही OT में हुई और दिल तो मेरा मज़बूत था ही, क्योंकि ऐसी ही कारगुजारियाँ हम भी करके ही बैठे थे। अब ओखली में सिर दे ही दिया तो मूसल से क्या डर। ☺
जिसने कभी बचपन में खेलकूद वाली चोटें न खायी हों और टाँके न झेले हों वो इसे कितना समझेगा ये तो पता नहीं, लेकिन मैं जब कभी आईने में इस निशान को देखती हूँ तो बस यही ख़याल आता है कि ये गवाह है एक मासूम बचपने का। नहीं क्या ☺
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