Thursday, June 4, 2015

Conditional and Unconditional

It is a relationship that is conditional, not love.
It is a relationship that is conditional, not support.
It is a relationship that is conditional, not trust.
It is a relationship that is conditional, not respect.
It is a relationship that is conditional, not feelings.
.......but a relationship is based on love, support, trust, respect and feelings.

Wednesday, June 3, 2015

चंद अशआर:-

१.
हँसना-रोना भी गया, मुस्कान भी,
हाथ खाली रह गए, और झोली भी।

२.
याद करने से भी डर जाते हैं हम,
तकलीफ़ न हो हिचकियों से उन्हें।

३.
इश्क़ का सबक़ तो डूबकर मिला,
गिरे हुए से पूछते हो, अब करते हो क्या।

४.
ज़िन्दगी की सब शोख़ियाँ नसीब हों तुझे,
दुआ ही देते हैं, अब ग़िला तक बचा नहीं यहाँ।

५.
सज़ा-ऐ-गुनाह से, अब डरते नहीं हैं हम,
अर्ज़ी-ऐ-वफ़ा, लगा बैठे हैं सज़दे में महबूब के।

६.
जो जल्दी में चले जाते हैं, उन्हें ग़म बड़े लगते हैं ज़माने के,
थोड़ा ठहर के देखें तो हर जगह, मौक़े हैं ख़ुशी कमाने के।

७. 
ज़िन्दगी की राहें हैं मुश्क़िल, नाज़ुक सा ये दिल,
भूल कर उनको, सोया ही रहे, तो सम्हल सके,
नादान बच्चा सा दिल, पूछता है कहाँ हूँ मैं कहाँ,
कहती है ज़िन्दगी दिल से, तू जहाँ मैं भी हूँ वहाँ।

८.
दुश्मन-ऐ-जाँ मना ले जश्न कितने भी,
दुआ-ऐ-दोस्त की हमें कमी तो नहीं।

९.
बात तक करने का, जिन्हें नहीं है शऊर,
आँखों को पढ़ने की, उनसे रखते हो उम्मीद,
बड़ी बेइंसाफी है जनाब, जाने उसे दीजिये,
वक़्त सब सिखा देगा, एक मौका तो दीजिये।
स्वर्णिम और मेरी कल की बात-चीत (जिसने मुझे सोचने पर मजबूर किया):-
स्वर्णिम ने बताया, "मम्मा,स्कूल से आते समय आज मुझे वो फिर से दिखा।"
मैंने पूछा, "कौन?"
स्वर्णिम का उत्तर,"वही होमलेस मैन। और एक बालक(स्वर्णिम का सहपाठी) ने कहा कि पुलिस इसे पकड़ती क्यों नहीं है?"
मैंने कहा, "हाँ, पुलिस को उसे रिमांड होम/ करेक्शन होम में रखना चाहिये। कम से कम उसे खाना तो मिलेगा"
स्वर्णिम का कथन, "पुलिस उसे क्यों पकड़े? आखिर उसका अपराध क्या है ? क्या ये अपराध है कि उसके पास घर नहीं है ?"
मैंने तर्क दिया, "शायद वो बीमार हो, शायद वो पागल हो (हमने कई बार उसे कूड़े में से खाना और दूसरी चीज़ें ढूंढते देखा है, पर दिन के समय वो इस इलाके में नहीं दिखता, पता नहीं कहाँ चला जाता है)"
स्वर्णिम का उत्तर, "नहीं मम्मा, वो पागल नहीं है, रेड लाइट के सिग्नल पर रुक जाता है, लाइट ग्रीन होने पर ही रोड क्रॉस करता है"
मैंने बात आगे बढ़ाई,"तुम्हारे विचार से ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिये?"
स्वर्णिम ने सुझाव दिया, "यहाँ की सरकार को ऐसे लोगों के लिये, जिनके पास घर और पैसे नहीं हैं, शेल्टर-होम बनाने चाहिये"
(मुझे याद आ गये भारत के वो असंख्य रेलवे स्टेशन जो इन जैसे निराश्रित लोगों के घर हैं, सर्दी-गर्मी-वर्षा से बचने के शरण-स्थल हैं) घर-भोजन-रिश्तों की अहमियत बढ़ जाती है जब आप किसी ऐसे इंसान से रूबरू होते हैं।

कवियों और लेखकों की श्रेणियाँ

कुछ समय पहले तक "कवियों और लेखकों" से मेरा मन उचाट हो गया था, और एक धारणा बन गयी थी कि इनकी कई श्रेणियाँ होती हैं।
पहली एवं उत्कृष्ट श्रेणी:- वे रचनाकार जो ईमानदारी से विशुद्ध लेखन करते हैं, निडरतापूर्वक "स्व" को रूप देते हैं, शायद ऐसे ही रचनाकारों की रचनायें कालजयी होती हैं।
दूसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो अर्थशास्त्री होते हैं, बाज़ार की क्रियाओं के अनुरूप लेखन करते हैं। माँग और पूर्ति के नियम से भली-भाँति परिचित होते हैं।
तीसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो किसी भी प्रकार निष्पक्ष नहीं होते हैं, अर्थात किसी न किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं।
चतुर्थ श्रेणी:- खिचड़ी होते हैं, या कहें कि सर्वगुणसंपन्न होते हैं।

कुल मिला कर निष्कर्ष ये निकला कि रचनाकार चाहें किसी भी श्रेणी में आयें, इनका साहसी होना पहली अनिवार्यता है, क्योंकि जो साहसी ही नहीं वो "स्व" को रूप कैसे प्रदान कर सकता है? ये सारा जीवन इसी "स्व" के रूपांतरण हेतु ही तो है, अन्यथा इसका क्या प्रयोजन है?
[पढ़ने-लिखने की आशा पुनः जाग्रत हो गयी है]

Friday, May 29, 2015

अच्छा स्वास्थ्य और नशा

अच्छा स्वास्थ्य सबसे बड़ी स्वतंत्रता है क्योंकि अच्छे स्वास्थ्य वाला व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, अतः किसी भी प्रकार का नशा आपकी इस सबसे बड़ी और पहली स्वतंत्रता के लिये बाधा है। इससे दूर रहना ही स्वतंत्र होने का द्योतक है। आप तब अपने को स्वतंत्र नहीं मान सकते, जब आप "शौक़" की किसी भी वस्तु को ख़रीद सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं, आप सही मायनों में तब स्वतंत्र हैं, जब आप ये बुद्धि-विवेक अर्जित कर लेते हैं कि आपके स्वयं के लिये क्या उचित है, और आप वास्तव में चाहते क्या हैं। जब-तक आपके विचारों में ये शुद्धता नहीं आ जाती है, तब-तक आप किसी न किसी चीज़ के ग़ुलाम बने ही रहेंगे, नशा क्या बड़ी चीज़ है। चीज़ें अपने शुद्ध रूप में बुरी नहीं होतीं, उनके प्रयोग के लिये क्या भावना कार्य करती है वही मुख्य है।

"नशा शराब में होता तो नाचती बोतल"

शिकंजी या लस्सी तो गर्मी से राहत देती हैं, भारत जैसे गरम देश में शराब की ज़रुरत मौसम के किस हिसाब से है मुझे समझ में नहीं आता, ख़ैर ये व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का विषय अवश्य है। यदि ये आवश्यकता है, तो अवश्य इसकी पूर्ति होनी चाहिये, परन्तु यदि ये मात्र "दिखावे का उपभोग (Conspicuous Consumption)" है, तो इसके प्रयोग को किसी भी रूप में बढ़ावा तो नहीं दिया जाना चाहिये। हमारी पीढ़ी को इस पर विचार करना चाहिये।
[नशे से तात्पर्य=सभी प्रकार के नशे, कोई भी ऐसी चीज़ जिसके प्रयोग से रोके जाने पर आपको क्रोध आता है]

Thursday, May 21, 2015

Imagination Vs Reality (A story needs both)


[Imaginatiin]
She: I'm fat.
He: No, you are not.
She: Everyone ask me to lose my weight.

He: They are jealous baby.
She: You don't know anything.
He: I know you more than they do, they are blind.
She: I think you are, not them..
He: Babe, I have seen you dressed 

 super nice, I've seen you
in school uniform, I've seen you
with hair tied, chilling with
no makeup on, I've seen you cry,
smile, laugh, mad, I've seen
you sleeping, hyper, awake...
You are always so beautiful to
me, always perfect..and you
say I don't see you clearly? :')
She: *Hugs* I Love you.
He: I Love you More.
She: Why do you care so much ?
He: I Care Because I Love You. 


[Reality]
She: I am fat.
He: hmm long pause....

yes, you are and I have been telling you for years but you just don't do anything and therefore I have stopped telling you. Every time I tell you the truth I get into trouble so I avoid talking to you.

Wednesday, May 20, 2015

(1) "सावित्री (मेरी पहली कहानी)"

पाँच बहनों में सबसे ख़ूबसूरत ब्राह्मण-कन्या,सावित्री। माता-पिता ने नाम बस रख दिया, कोई नाम तो रखना ही था। एक वो सावित्री थीं, रूपसी, राजा की पुत्री, राज-कन्या, अपने जीवन के सारे निर्णय लेने के लिये स्वतन्त्र, जो मन को भा गया वही पतिरूप में सदा के लिये स्वीकार्य हो गया, क्षत्राणी थीं, साहस तो रक़्त में व्याप्त था। सबने मना किया कि सत्यवान से विवाह न करो पर राजकन्या के प्रेम के आगे किसकी चली है, यमराज को भी हार माननी पड़ी। पर मेरी सावित्री को तो प्रेम का अधिकार ही नहीं। बचपन बीत गया जवानी के इंतज़ार में और जवानी बीतती जा रही थी, ब्याह के इंतज़ार में। बूढ़े होते जा रहे माता-पिता दिन-रात यही सोचते कि किसी तरह यह कन्या भी हिल्ले लगे। गरीब की कन्या को सुंदर होने का भी अधिकार नहीं होता। मनचाहा वर तो किसी-किसी की तपस्या में होता होगा, सावित्री दिन-रात यही सोचती रहती। देने लायक दहेज़ जुटा सकें इसकी हैसियत तो माता-पिता चार बेटियों का ब्याह करके पहले ही चुका चुके थे, बस किसी तरह इसकी भी गाँठी जुड़े तो गङ्गा नहायें और सत्यनारायण का पाठ धरें।

ख़ैर, देर-अबेर ईश्वर ने उनकी सुन ही ली, एक बिचवानी ने एक रिश्ता बताया। शहर के एक बड़े धनवान ब्राह्मण हैं उन्होंने आपकी कन्या को एक विवाह समारोह में देखा था, उन्हें आपकी कन्या बहुत जँच गयी है, लेन-देन का कोई चक्कर नहीं, ईश्वर की कृपा से सारा घर भरा है, उन्हें कुछ नहीं चाहिये। यह सुनकर तो सावित्री के माता-पिता को तो मानों मुँह मांगी मुराद मिल गयी। फिर भी बिचवानी से पूछ ही लिया, कि ऐसा क्यूँ कि कुछ लेना-देना ही नहीं? बिचवानी बोले, दूसरा ब्याह है, पहली पत्नी इन्हें छोड़कर चली गयी, जीवन काटना कठिन जान पड़ा तो फिर से ब्याह की इच्छा जताये रहे, इसी से हम आपसे बात किये, लड़कियों की कोई कमी थोड़े ही होती है धनवान को। लड़की को सारी उमर बैठाये रखने का इरादा हो तो ना कर दो, कोई गरजू थोड़े ही हैं। इतना कह कर आग-बबूला होते हुये बिचवानी महाराज उठकर जाने लगे, तो सावित्री के पिता उनके पैरों पर गिर पड़े, महाराज हमसे भूल हो गयी जो आपसे सवाल-ज़वाब किये, आप तो हमारे हितैषी ही हैं, मेरी ही मति मारी गयी थी, क्षमा महाराज, क्षमा। अच्छा-अच्छा ठीक है, रहने दो ये सब, रिश्ता पक्का समझूँ फिर? जी महाराज, अवश्य, शुभस्य शीघ्रम। इसी जेठ में ब्याह कर देते हैं।

सावित्री, फिर खो गयी सपनों की दुनिया में? उधर से आती हुई सरिता ने चुटकी ली। ब्याह होगा, मैडम जी का, कार में मायके आयेंगी। सावित्री भी सोचती, कि काश हम-उम्र दूल्हा मिल जाता तो "तुम" करके बात करती, इस अधेड़ को तो सारी उमर "आप" कहना होगा। तीस की होने को आयी थी और ख़ुद को नवयौवना समझ, सपने भी कच्चे देखती थी।

जैसे-तैसे ब्याह निपटा, सारा ख़र्च लड़के वालों की तरफ़ से ही किया गया। नाते-रिश्तेदार सब विदा हुये और विदा होकर सावित्री अपने पति के साथ बंगले पर चली आयी। सावित्री के मन में एक प्रश्न मथता रहता, कि इनकी पहली पत्नी इन जैसे भले मानुष को छोड़ कर, अपना सारा सौभाग्य छोड़कर क्यूँ चली गयी? फिर सोचती कि, ये न हुआ होता तो मेरे भाग्य क्यूँकर खुलते, ख़ैर मुझे क्या, यह सोचते-सोचते नवविवाहिता का शृङ्गार करके, दर्पण में स्वरुप पर ही मुग्ध होती रहती। दिन इसी तरह बीतते गये और सच्चाई की अनगिनत परतें शनैः-शनैः खुलती गयीं। चार वर्ष होने को आये थे विवाह को पर सावित्री की गोद अभी तक सूनी थी। बाँझ के ताने सुन-सुन कर कान पक गये, बेचारी अपने मन की व्यथा किससे कहती। हारकर पति से एक बच्चा गोद लेने के लिये कहा, तो उसने सारी भलमनसाहत का आवरण उतार कर फेंका और एक झन्नाटेदार थप्पड़ सावित्री को रसीद दिया। तेरी हिम्मत कैसे हुई यह बात कहने की? हम ख़ानदानी लोग हैं, हम अपनी वंशबेल किराये के पौधों से नहीं बढ़ाते। सावित्री तो जैसे होश में आ गयी, अब तक जो देखा वो सब स्वप्न था? इस नपुंसक के सम्मान की रक्षा, अब तक क्यूँकर करती रही? मन में कुछ ठानकर आँसू पोछकर सावित्री मुस्कुरा उठी। सावित्री के भीतर एक पत्नी की हत्या हो गयी थी, बची थी तो बस एक औरत।

कुछ दिन बीते और सावित्री के पति ने सत्यार्थ कुमार को अपनी सहायता के लिये काम पर रख लिया और अन्य नौकरों के साथ उनके रहने की व्यवस्था कर दी।

सावित्री का शव विवाहिता के पूरे शृङ्गार के साथ रखा हुआ है, परिवार की सभी स्त्रियाँ सावित्री की चरणरज लेने को व्याकुल हैं। स्त्रियाँ आपस में बातें करती हैं, सती स्त्री थीं सावित्री बहन, जाने से पहले पति की वंशबेल बढ़ा कर ही गयीं, पास ही एक स्त्री की गोद में एक मनोहारी नवजात बालक आकाश को निहारने का असफ़ल प्रयास कर रहा है। यह सावित्री का पुत्र है, सावित्री इस बालक को जन्म देते ही सिधार गयी।

सावित्री के पति श्मशान घाट पर सोच में डूबे खड़े हैं, शून्य में निहारते हैं, बालक के लालन-पालन की चिंता उन्हें खाये जा रही है, तीसरा ब्याह कर लें क्या, सोचते हैं?