Sunday, April 19, 2015

(11) "पिता"

पिता बोता है सपने,
सुनहरे, रुपहले, सतरंगी, अनोखे,
रोज़,

पिता बढ़ता है वट सा,
छाया देता, पोषक, रक्षक,
रोज़,

पिता बदलता है सपने,
बच्चों के सपनों से,
रोज़,

पिता देता है उड़ान,
पंखों को, डोर जीवन की,
रोज़,

पिता मिटाता है रुकावट,
बनकर एक रुकावट,
रोज़,

पिता पी जाता है आँसू, विदा के
बसाकर बेटी को दिल में,
रोज़,

पिता सहता है पीड़ायें,
अनेक, प्रेम के बदले में,
रोज़,

पिता होता है इक बाग़बाँ,
देख कोंपलें ख़ुश होता है,
रोज़,

पिता चुकाता है क़ीमत,
ताक़तवर होने की,
रोज़,

पिता जिज्ञासा की कड़ी,
पहली, आधार ज्ञान का,
रोज़,

पिता खिलता है, बच्चों से,
मुस्कान से, खिलता है चेहरा जिसका,
रोज़,

पिता, पहला परिचय, संसार से,
वयस्क होने से पहले,
रोज़,

पिता साथ है, हमारे सदा,
हर रूप में, हर जगह,
रोज़.…

(हर संवेदनशील पिता को समर्पित)

Friday, April 17, 2015

(10) "बचपन"

वो सर्दियों की गुनगुनी धूप में,
ताज़े अमरूदों को निपटाना,

वो गर्मियों के थपेड़ों वाली लू में,
लगाकर नमक कच्चा आम खाना,

वो झमाझम बारिश में झूलना,
झूला, आम के पेड़ पर,

वो सूँघना नींबू के फूल काँटों के बीच,
मोगरे की कलियाँ लेकर घूम आना,

वो दनदनाते चलाना सायकिल,
ढ़लान पर, लुढ़कना चोट खाना,

वो घेर लेना बिल्लियों को,
लड़ाना कोयल से ज़ुबान,


वो मूंगफली सी बातें,
वो मुरमुरे से सपने,

वो चिढ़ाना छोटी बहन को,
खींचकर चोटी सबके सामने,

वो खेलना कोट-पीस,
करना नन्ही सी बेईमानी,


वो मम्मी से लिपट सो जाना,
थककर रात भर पढ़ने के बाद,

वो बेफ़िक्री के दिन और सुहानी शामें,
कोई ला दे, कहानियों वाली बचपन की रातें।

Thursday, April 16, 2015

(9) "हे चन्द्र"

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अभागे हो या बड़भागी,
कातिक में पूजे जाते हो,
भादों में हो जाते कलंकी,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सोलह कलाओं के स्वामी,
पूर्णिमा में चमकते हो,
फिर भी राहू के ग्रास,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सच में एक चरखा है,
एक धोखा है बस, या,
गड्ढे हैं तुम्हारी आँखों के,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
प्रेम गीतों में तुम साक्षी,
कवियों के प्रिय,
फिर भी बदनाम,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
द्विविमीय लगते रोटी से,
त्रिविमीय गोले से,
क्या छुपाते हो दूसरी ओर,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अनुसूया के पुत्र होकर भी,
कुछ सीखा नहीं माँ से,
बच्चों ने बना लिया,
खिलौना तुम्हें,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
क्या धरती से प्रेम है तुम्हें,
छिटकाकर फेंक दिए गये हो,
फिर भी रोज़ ताकते हो,
यूँही, दूर से,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
स्वयं का गुरुत्व नहीं कुछ,
ज्वार-भाटा लाते हो धरती पर,
क्यूँ चिपके हो,
क्या नहीं है स्वाभिमान,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
होता है क्या पुनर्जन्म,
बना देना इक पिण्ड मुझे,
देखना है,
दूसरी ओर से तुम्हें।

Wednesday, April 8, 2015

(8) "माँ"

जाने कब, सुबह से शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

माँ बनकर ही जाना मैंने,
क्या-क्या तुमने देखा होगा,
क्या कष्ट सहे, क्या भोगा होगा,
सबकुछ चुपचाप सहा होगा,
सहते-सहते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

तुम्हारी कापियों-किताबों को,
कितना मैंने गोचा होगा,
अधबुने उस स्वेटर को,
कितनी बार उधेड़ा होगा,
बुनते-बुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

आँखों के चमकीले तारे,
होंठों की प्यारी मुस्कान,
तेरी निश्छल हँसी,
गीतों की वो मीठी तान,
सुनते-सुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी

कठिन समय था नया दौर था,
ख़ुद को कितना ढ़ाला होगा,
हम दोनों को पाला होगा,
ख़ुद को कैसे सम्हाला होगा,
सोचते-सोचते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

Tuesday, April 7, 2015

(7) "ज़िन्दगी"

ह्रदय की धड़कन है,
या नाड़ी का स्पंदन,
झरने की कल-कल है,
या नदी का गमन,

तपती हुई धूप है,
या शीतल मंद समीर,
सुमनों की सुगंध है,
या मगन मन-मंदिर,

वर्षा की बूँदें हैं,
या लहराते हुए खेत,
ममता की छाँव है,
या मरुभूमि की रेत,

शिशुओं का रुदन है,
या तरुणियों की हँसी,
वृद्धों का अनुभव है,
या युवाओं की रवानी,

मोह का एक पाश है,
या मुक्ति का स्फुटन,
संबन्धों की गर्माहट है,
या अकेलेपन की घुटन,

ज़िन्दगी तो एक है,
पूछने हैं प्रश्न,
क्यूँ आती है, क्यूँ जाती है,
क्यूँ करती है पर्यटन?

Monday, April 6, 2015

(6) "मैं और तुम"

मेरी अपेक्षा, तुम्हारी अपेक्षा,
मेरी संतान, तुम्हारी संतान,
क्या है मेरा, क्या है तेरा,
न मुझ बिन तुम हो,
न तुम बिन मैं हूँ,
फिर यह कैसा बँटवारा,

ये धरती तेरी, वो आकाश मेरा,
मेरी धानी चुनर, वो नीलाम्बर तेरा,

अनुत्तरित प्रश्न फिर भी रहा,
उपजता है किससे,
किसमें जाता है समा,
कैसा विलगन, यह कैसा मिलन,
है प्रेम या है आकर्षण,
है मया या है समर्पण,
तू ही मैं है, और तू ही अर्पण।
क्या तुम, तुम हो या हो मेरा दर्पण।

Saturday, April 4, 2015

(5) "सूर्य-प्रभा"

धुंध कहीं छँटने लगी है,
बर्फ़ कुछ पिघलने लगी है,
मौन हैं स्वर परन्तु लहर,
संगीत की बहने लगी है,

आकाश में सजी हुई है,
रक्तिम सूरज की बिंदिया,
झिलमिल जल की धारा है,
धरा रोशनी में नहाने लगी है,

स्वागत करो इस नयी प्रभा का,
इतिहास नया लिखने लगी है।