Saturday, April 4, 2015

(5) "सूर्य-प्रभा"

धुंध कहीं छँटने लगी है,
बर्फ़ कुछ पिघलने लगी है,
मौन हैं स्वर परन्तु लहर,
संगीत की बहने लगी है,

आकाश में सजी हुई है,
रक्तिम सूरज की बिंदिया,
झिलमिल जल की धारा है,
धरा रोशनी में नहाने लगी है,

स्वागत करो इस नयी प्रभा का,
इतिहास नया लिखने लगी है। 

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