Wednesday, April 8, 2015

(8) "माँ"

जाने कब, सुबह से शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

माँ बनकर ही जाना मैंने,
क्या-क्या तुमने देखा होगा,
क्या कष्ट सहे, क्या भोगा होगा,
सबकुछ चुपचाप सहा होगा,
सहते-सहते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

तुम्हारी कापियों-किताबों को,
कितना मैंने गोचा होगा,
अधबुने उस स्वेटर को,
कितनी बार उधेड़ा होगा,
बुनते-बुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

आँखों के चमकीले तारे,
होंठों की प्यारी मुस्कान,
तेरी निश्छल हँसी,
गीतों की वो मीठी तान,
सुनते-सुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी

कठिन समय था नया दौर था,
ख़ुद को कितना ढ़ाला होगा,
हम दोनों को पाला होगा,
ख़ुद को कैसे सम्हाला होगा,
सोचते-सोचते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

No comments:

Post a Comment