Thursday, April 16, 2015

(9) "हे चन्द्र"

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अभागे हो या बड़भागी,
कातिक में पूजे जाते हो,
भादों में हो जाते कलंकी,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सोलह कलाओं के स्वामी,
पूर्णिमा में चमकते हो,
फिर भी राहू के ग्रास,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सच में एक चरखा है,
एक धोखा है बस, या,
गड्ढे हैं तुम्हारी आँखों के,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
प्रेम गीतों में तुम साक्षी,
कवियों के प्रिय,
फिर भी बदनाम,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
द्विविमीय लगते रोटी से,
त्रिविमीय गोले से,
क्या छुपाते हो दूसरी ओर,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अनुसूया के पुत्र होकर भी,
कुछ सीखा नहीं माँ से,
बच्चों ने बना लिया,
खिलौना तुम्हें,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
क्या धरती से प्रेम है तुम्हें,
छिटकाकर फेंक दिए गये हो,
फिर भी रोज़ ताकते हो,
यूँही, दूर से,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
स्वयं का गुरुत्व नहीं कुछ,
ज्वार-भाटा लाते हो धरती पर,
क्यूँ चिपके हो,
क्या नहीं है स्वाभिमान,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
होता है क्या पुनर्जन्म,
बना देना इक पिण्ड मुझे,
देखना है,
दूसरी ओर से तुम्हें।

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