Monday, April 6, 2015

(6) "मैं और तुम"

मेरी अपेक्षा, तुम्हारी अपेक्षा,
मेरी संतान, तुम्हारी संतान,
क्या है मेरा, क्या है तेरा,
न मुझ बिन तुम हो,
न तुम बिन मैं हूँ,
फिर यह कैसा बँटवारा,

ये धरती तेरी, वो आकाश मेरा,
मेरी धानी चुनर, वो नीलाम्बर तेरा,

अनुत्तरित प्रश्न फिर भी रहा,
उपजता है किससे,
किसमें जाता है समा,
कैसा विलगन, यह कैसा मिलन,
है प्रेम या है आकर्षण,
है मया या है समर्पण,
तू ही मैं है, और तू ही अर्पण।
क्या तुम, तुम हो या हो मेरा दर्पण।

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