Friday, January 29, 2016

श्री पारीक जी की सलाह पर घरेलू कचरे के प्रबंधन से सम्बंधित कुछ अनुभव साझा कर रही हूँ:-
ये कुछ आसान उपाय हैं जिन्हें यदि हम चाहें तो रोज़ाना व्यवहार में ला सकते हैं।
1. कोशिश करें कि पॉलिथीन बैग्स का इस्तेमाल कम से कम करें। अपने हैण्ड बैग में एक फोल्डिंग बैग/कपड़े का बैग साथ रखें, अक्सर बाहर से आते वक़्त हम कुछ न कुछ फल या सब्जियाँ ख़रीद लाते हैं और बैग न होने पर पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल कर लेते हैं जोकि बाद में कचरे में ही जाता है।
2. कानपुर परिवर्तन फोरम के लोग कोई चार्ज नहीं लेते हैं गार्बेज कलेक्शन के लिये, मेरे विचार से वो उन घरों से पुराने अख़बार और पेपर वेस्ट को कलेक्ट कर सकते हैं। पुराने अखबार/पेपर वेस्ट लिफ़ाफ़े बनाने के काम में आते हैं या रीयूज़/रीसेल कर सकते हैं।
3. घर में कम से कम 2 डस्टबिन रखें। किचन वेस्ट और एक्स्ट्रा वेस्ट घर से ही सेपरेट हो कर जाये।
4. कानपुर परिवर्तन फोरम में अधिक से अधिक मेंबर्स जोड़े जायें ताकि मेंबर्स तो यह अच्छा कार्य करने में सहयोगी हों।
5. याद रखिये इस काम में सहयोग करके आप वास्तव में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। स्वच्छता हमारे बच्चों के भविष्य लिये अच्छी है। बच्चों को इस प्रक्रिया में सहयोगी बना लीजिये, बच्चे कभी निराश नहीं करते।
(आप सभी के सुझाव आमंत्रित हैं 😊)
Cleanliness Counts
"Waste reduction is the best solution to waste management"
कचरे को कम करने के कुछ उपाय:-
1. प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम करें।
2. प्लास्टिक के कप या ग्लास में गर्म चीज़ें पीने से कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। (यदि ये जानकारी ग़लत है तो कृपया संशोधन कर दें)। मिट्टी के कुल्हड़ या सकोरे के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाये।
3. डिस्पोज़ेबल चीज़ों का इस्तेमाल कम से कम करें।
4. प्लास्टिक के बर्तनों में रखकर कभी कोई चीज़ माइक्रोवेव न करें। प्लीज़।
5. सफ़ाई कर्मचारी को भी इंसान ही समझें, उसके लिये काम न बढ़ायें ☺

इस फ़ोरम से जुड़े हुये लोगों में से 100% लोग ये चाहते होंगे कि कानपुर की सड़कें, गलियाँ, पार्क, पब्लिक स्पेस सब एकदम साफ़-सुथरा हो।
1. क्या आप ईमानदारी से जवाब दे सकते हैं कि कितने लोग "अपने घर" की सफ़ाई ख़ुद करते हैं ?
2. आपके घर की सफ़ाई कौन करता है/करती है, और उस सफ़ाई में आपका क्या और कितना योगदान है?
3. इस बात की संभावना अधिक है कि आप शहर के एक बड़े हिस्से में रहते हैं जबकि आपका सफ़ाई कर्मचारी शायद बहुत ही छोटी सी जगह में रहता है, शहर के प्रति उसकी जवाबदेही कम बल्कि आपकी ज़्यादा है।
4. सफ़ाई करने से सफ़ाई नहीं होती, सफ़ाई रखनी पड़ती है। सफ़ाई एक सुविधा नहीं बल्कि ज़रुरत है। सफ़ाई एक आदत है।
5. सफ़ाई का कोई विकल्प नहीं है।
"Change begins at home"

"लड़का होगा या लड़की होगी"

प्रकृति ने मनुष्य को दो रूपों में बनाया है। लड़का या लड़की।
माँ बनने जा रही हर लड़की के मन में यह जानने की उत्सुकता होती है कि उसके गर्भ में पल रही संतान लड़की है या लड़का है। इस विषय पर तीन अलग़-अलग़ देशों के संदर्भ देखते हैं।
1. भारत से सुदूर पश्चिम (अमेरिका):-
यहाँ माता-पिता बनने जा रहे दम्पति को डॉक्टर पहले ही बता देते हैं कि आपके घर बेटी आने वाली है या बेटा। (आज ही अपने एक मित्र दम्पति से हुई बातचीत के आधार पर कह रही हूँ) ये बात वैसे भी अनेक मित्रों के लिये नई नहीं है क्योंकि आपमें से अनेक लोग इस प्रैक्टिस से परिचित हैं।
A) मेरी जिज्ञासा यह है कि जेन्डर डिफरेंस में विश्वास न करने वाला देश इस प्रकार की प्रैक्टिस क्यों करता है?
B) बेटा हो या बेटी हो, यह बात पैदा होने के बाद ही पता चले तो उसके क्या नुकसान हैं, पहले जानकारी होने के क्या फ़ायदे हैं?
2. भारत :-
भारत में लिङ्ग परीक्षण अवैध है। अतः सामान्य तौर पर यह जानकारी सिर्फ़ डॉक्टर को ही होती है कि गर्भ में पल रही संतान लड़की है या लड़का है।
A) मेरी जिज्ञासा है कि भारत के कई परिवारों में आज भी नवजात शिशु के पैदा होने से पूर्व ख़रीदारी करने का रिवाज़ नहीं है। ऐसा करने के पीछे वजहें क्या हैं और ऐसा करने के फ़ायदे क्या हैं?
3. सुदूर पूर्व (जापान):-
जापान भी अमेरिका के नक़्शे-क़दम पर चलता है और यहाँ भी अजन्मे बच्चे का जेंडर बता देते हैं।
इसके फ़ायदे क्या हैं यह तो नहीं जानती, लेकिन एक नुकसान ज़रूर देखा है। दो वर्ष पूर्व एक बांग्लादेशी मित्र थीं यहाँ, एक बच्ची की माँ, दुबारा माँ बनने वाली थीं, मुझे ख़रीदारी करती हुयी मिलीं और मैंने बधाई व भविष्य के लिये शुभकामनायें दीं तो वो उदास हो गयीं कि फ़िर से बेटी है। उस वक़्त मुझे इस प्रकार की पूर्व जानकारी का कोई औचित्य समझ में नहीं आया।
जहाँ तक जापानियों का प्रश्न है, मुझे लगता है कि पूर्व जानकारी से उन्हें कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता है, यहाँ वैसे भी बच्चों की जनसँख्या अनुपात में काफ़ी कम है।

Monday, January 25, 2016

(6) "प्रेम जाल" (कहानी)

सोलह साल की कच्ची उम्र और प्रेम का पहला अहसास होने के बाद सुनैना के लिये दुनिया इससे हसीन कैसे हो सकती थी?

सावली रंगत वाली इस लड़की की बोली-भाषा इतनी मीठी कि कोई भी फ़िदा हो जाये। स्कूल जाने और शहर के अच्छे घरों की लड़कियों के साथ उठने-बैठने से अपनी ग़रीबी का उसे ज़रा भी भान न रहा था। हर लड़की की तरह सजने-संवरने और ढ़ंग से पहनने-ओढ़ने की तरफ़ उसका ख़ास रुझान था।

ग़रीबी तो हर किसी का मज़ाक उड़ाने का अधिकार लेकर ही आती हो जैसे, प्रेम भी इससे अछूता कैसे रह सकता है। अब सुनैना की ज़िन्दगी का मक़सद मनचाही शादी करके घर बसाना ही था बस। लेकिन, घर की बड़ी लड़की होने से और आर्थिक तंगी होने के कारण उसके माता-पिता ने उसे बेबी-सिटिंग के काम के लिये मेरे यहाँ काम पर लगा रखा था। अनुभवी होने के कारण इतना समझने में मुझे देर न लगी कि सुनैना को बच्चे पसंद हैं, मेरे बेटे के साथ जल्दी ही उसकी दोस्ती हो गयी। मैं उससे कहती कि तुम्हें अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिये, स्कूल से वापस आकर तुम बेबी-सिटिंग कर सकती हो, तुम्हारे स्कूल की फ़ीस भी मैं दे दूँगी। लेकिन अब सुनैना का मन पढ़ाई में नहीं था। उसने पढ़ाई को लेकर बिल्कुल भी उत्साह नहीं दिखाया। ख़ैर, जिंदगी चल पड़ी।

कुछ दिन बाद मुझे जानकारी हुई कि सुनैना मेहँदी की बहुत सुंदर डिज़ाइन बना लेती है। आर्ट और क्राफ़्ट में उसे बहुत रुचि है, बहुत सलीक़े से बना सकती है। मैंने उसे एक ड्रॉइंग कॉपी और मेहँदी की डिज़ाइन वाली क़िताबें उपलब्द्ध करा दीं। अब, उसका बेबी-सिटिंग का समय बोरिंग नहीं था, सुनैना और मेरा बेटा मिलकर ड्रॉइंग, कलरिंग, पेंटिंग, क्राफ़्ट आदि किया करते। शाम होने तक मैं घर आ जाती और उनके बनाये सामानों की तारीफ़ें किया करती। धीरे-धीरे उसे मुझ पर विश्वास हो गया कि मैं वास्तव में उसका भला ही चाहती हूँ।

एक दिन मेरी एक सहृदय पड़ोसन का फ़ोन आया कि आपका बेटा स्कूल से घर आ गया है, लेकिन सुनैना काम पर नहीं आयी है। उसका पता लगाने के बाद पता चला कि कुछ समस्या आ गयी है, अगले दिन भी वह काम पर नहीं आयी। उसके बजाये उसकी माँ आयी और रोते-रोते उसने अपनी आप बीती मुझे कह सुनाई। सुनैना ने हाथ की नस काटकर आत्महत्या करने का प्रयास किया है, डॉक्टर को दिखाकर पट्टी करा दी है, अब शायद ही वह काम पर आये। कारण पूछने पर पता चला कि, रिश्ते के एक लड़के से उसे प्रेम हो गया है और उसी से शादी करना चाहती है। हम अभी इस कम उम्र में उसकी शादी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन प्यार ने उसे अँधा बना दिया है, हम सब उसे दुश्मन नज़र आते हैं। मैंने कहा, उसे मेरे पास भेजना, मैं उससे बात करूँगी, और उसे ये मत कहना कि तुमने मुझे उसकी सारी बातें बता दी हैं, मैं उसके मुँह से ही सुनना चाहती हूँ, वो क्या कहती है, क्या सोचती है। दो-चार दिन बाद शाम को सुनैना हाथ में पट्टी बाँधे मेरे पास आयी। मैंने उसे बैठने का इशारा किया और चाय पीते-पीते पूछा (सुनैना चाय नहीं पीती थी), बेटा ये चोट कैसे लगी? उसने झूठ बोलने की कोशिश की, तो मैंने पूछा, सुनैना, क्या तुम सच में उस लड़के से इतना प्यार करती हो कि अपनी जान भी दे सकती हो? वह सिर झुकाए बैठी रही। मैंने दूसरा प्रश्न किया, क्या वह लड़का तुमसे शादी करना चाहता है? उसने हाँ में सिर हिलाकर जवाब दिया। क्या तुम कुछ दिन इंतज़ार कर सकती हो, ताकि कुछ पैसे जोड़ सको? वह चुप रही। हम्म, अच्छा, क्या तुम सिर्फ़ कुछ दिन रुक सकती हो जबतक मैं दूसरी बेबी-सिटर ढूँढ़ लूँ? उसने हाँ में सिर हिलाया। अच्छा तब ठीक है, मैं तुम्हारी माँ से बात करूँगी।

ज़रा इधर आना मेरे पास, मैंने उसे पास बुलाया। उसका चेहरा हाथों में लेकर कहा, वादा करो कि ज़िन्दगी में ऐसी बेवकूफ़ी की हरक़त फ़िर कभी नहीं करोगी, तुम मुझे बहुत प्यारी हो। प्यार से पिघल गयी सुनैना, मेरे गले लगकर बोली, नहीं दीदी अब कभी नहीं, ऐसा कभी सोचूँगी भी नहीं।

अगले दिन उसकी माँ को बुलाकर बात करनी पड़ी, कि कुछ दिन तो रुक गयी है लड़की लेकिन अब इसकी शादी का इंतज़ाम करो।

वाक़ई कच्ची उम्र का हो या किसी भी उम्र का, यह प्यार, आकर्षण या जो भी आप इसे कहें, इसी तरह दिमाग़ पर असर करता है, आप पढेलिखे हों या अनपढ़-गंवार प्रेम के आकर्षण के विज्ञान को समझना अत्यंत कठिन है। यदि आप समझते हैं कि कोई भी किसी दूसरे के अनुभव से सीख सकता है तो आप ग़लती पर हैं। यह एक ऐसा अनुभव है जिससे हर कोई गुज़रना चाहता है। मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि आगे आने वाले समय का न ही पूर्वानुमान लगा सकता है न ही इतना आगे का सोच सकता है। सुनैना भी कोई अपवाद न थी।

आख़िर सत्रह साल की उम्र में सुनैना की शादी हो गयी। सुनैना को जैसे जीवन की सारी खुशियाँ मिल गयीं, मनचाहा जीवनसाथी मिल गया, मनपसंद ढंग से शादी हो गयी, प्यार सफ़ल हो गया। लेकिन, क्या वाक़ई यही सच था, शायद नहीं।

इस बीच हम शहर छोड़ कर दूसरे शहर में बस गये थे, सुनैना के फ़ोन आते रहते, हम सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो चुके थे।

शादी के छः महीने गुज़रते ही सुनैना का पहला गर्भपात हुआ। सुनैना को देखकर कोई भी बता सकता था कि सेहत के साथ खिलवाड़ हो गया है। ख़ैर, ज़िन्दगी फ़िर आगे बढ़ी, साल बीतते फ़िर से गर्भवती सुनैना को एक बेटी हुई। एक साल और बीतते ही एक और बेटी हुई। इक्कीस साल से भी कम उम्र में सुनैना दो बेटियों की माँ थी और एक बेरोज़गार पति की पत्नी थी। प्रेम!!! प्रेम क्या होता है, क्या यही प्रेम होता है, ख़ुद से सुनैना यह सवाल करने लगी थी।

बहुत दिनों के बाद एक दिन के लिये मेरा शहर आना हुआ और सुनैना ने मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की। उसकी राम कहानी सुनने के बाद मैंने पूछा, सुनैना अब क्या इरादा है, आगे ज़िन्दगी कैसे काटोगी? क्या पति कुछ काम-धाम करना चाहता है या नहीं? सुनैना बोली, दीदी जी, ड्राइवरी कर लेते हैं पर गाँव में काम मिलता नहीं, समझ में नहीं आता क्या करें। मैंने सुनैना को याद दिलाया कि तुम मेहंदी की बड़ी अच्छी डिज़ाइन बनाती थीं, याद है या भूल गयी? याद है दीदी जी, लेकिन अब समय ही नहीं मिलता, दिनभर तो घर के काम में बीत जाता है। लेकिन, इतना कहते ही सुनैना को जैसे राह मिल गयी। जल्दी से सामान समेट जाने को हुई, मैंने पूछा, कहाँ, इतनी जल्दी? नहीं, दीदी जी, अब रुक गयी तो बड़ी देर हो जायेगी। आपसे दो साल बाद मिलूँगी, यहीं इसी शहर में, आप मिलेंगी ना? हाँ, हाँ, क्यों नहीं, न जाने क्यों इस साहसी, आत्मविश्वासी लड़की को देख मेरे चहरे पर एक मुस्कान तैर गयी।

दो साल बाद, मैं "सुनैना ब्यूटी पार्लर" में सुनैना से बातें कर रही थी। कैसी हो सुनैना? दीदी जी, हम सब बहुत ख़ुश, बहुत मजे में हैं। मेरी बड़ी बेटी अब स्कूल जाती है, यहीं घर के पास में है, छोटी को घर पर सास सम्हाल लेती हैं, पति ने एक ऑटो ले लिया है, अपना ऑटो चलाते हैं। मैंने पूछा, सुनैना और बच्चे? कभी नहीं दीदी जी, अब कभी नहीं। हा हा हा। बेटा नहीं चाहिये तुम्हें? सुनैना मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दी।

Sunday, January 24, 2016

(5) "ऋषि पत्नी" (कहानी)

भोर का समय है, चहुँ ओर अन्धकार व्याप्त है, प्राची के आकाश पर भगवान विवस्वान का रथ अभी भी उपस्थित नहीं है। गँगा नदी के तट के समीप निविड़ नीरव अरण्य में स्थित आश्रम में एक ऋषि तपस्या में लीन हैं। शांत मुख मंडल और शांत धरा। ऋषि पत्नी नित्यप्रति की भाँति व्यस्त हैं, अभी ऋषि गौतम गँगा स्नान के लिये जायेंगे, उनके लिये वस्त्र इत्यादि व्यवस्थित कर लूँ। वर्षों से नित्य-प्रति का यही नियम। ऋषि गौतम न्यायशास्त्र की रचना में लीन हैं, समर्पित पत्नी के होने से जीवन के कितने ही अभाव दूर हो गये हैं, कितने संतुष्ट और शांत हैं। न्यायशास्त्र की रचना करना क्या विचलित मनःस्थिति में संभव होता, कदाचित नहीं।
आह, ऋषि गौतम और ऋषि पत्नी इंद्र-चंद्र के खलयंत्र से कैसे अनभिज्ञ रह गये? अपने तेज़ से भूत-भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले ऋषि गौतम कैसे आप अनभिज्ञ रहे? या मात्र परीक्षा ही लेनी थी आपको अपनी पतिव्रता स्त्री की? विश्वास कैसे खण्डित हुआ? आने वाला समय प्रश्न अवश्य पूछेगा।
पुनः भोर है, वही दिनचर्या, नहीं, यह भोर भिन्न है, कुछ अवश्य ही सही नहीं है। ऋषि गौतम इतने शीघ्र स्नान से लौट आये हैं, यह कैसे? आकर पत्नी का सानिध्य चाहते हैं, क्यों? पति पर संदेह अहिल्या करें, यह कैसे संभव है? नहीं, यह छल है, छल, छल कैसे? पति पर संदेह, घोर अपराध। यही तो शिक्षा पायी है अहिल्या ने, पति समर्पण ही स्त्री-धर्म है। धर्म विमुख कैसे हो सकती हैं, नहीं हो सकतीं।
ऋषि गौतम गँगा-स्नान से वापस आकर, अपने आश्रम से अपनी ही छवि वाले मनुष्य को निकलते देख रुक जाते हैं। सहस्राक्ष शचीपति देवराज, क्यों? द्वारपाल के रूप में चंद्र, क्यों? कामी-लोलुप इंद्र-चंद्र द्वै, खलयंत्रकारी समुच्चय। तपस्या से उत्पन्न तेज अब क्रोधाग्नि में परिवर्तित हो चुका था, अहिल्या के सतीत्व पर कुदृष्टि डालने वाले देवराज, आज से तू पद्च्युत हो जा, तेरे सारे शरीर पर सहस्र नेत्र उग आयें, कभी कोई तेरी आराधना न करे, तुझसे कुछ याचना न करे, हे चंद्र, तेरी ओर देखने वाला कलंकी हो, नीच।
ऋषि पत्नी अहिल्या यह देख-सुनकर उसी क्षण शिला समान हो भूमि पर स्थापित हुईं, यह कैसा दुर्भाग्य, यह कैसा अनर्थ हुआ। क्या समर्पण ही मेरा दोष, क्या विश्वास ही मेरा दोष?
ऋषि गौतम ने आश्रम त्याग दिया, अहिल्या शिलारूप में वहीं रह गयीं। अनेक युग बीत गये। 
दो सुकुमार बालक अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के साथ वन भ्रमण पर आये हैं। पुनः भोर का समय है, भगवान विवस्वान के उदय के साथ ही दूर गहन वन में एक निर्जीव आश्रम दृष्टिगोचर होता है। बालक अपने गुरु से प्रश्न करते हैं, गुरु जी, यह कोई आश्रम प्रतीत होता है, परन्तु इतना निर्जीव क्यों है? किसी पशु-पक्षी के भी दर्शन नहीं होते? ऋषि विश्वामित्र निर्देश देते हैं, बालकों, यह ऋषि गौतम का आश्रम है, उनकी पत्नी तपस्या में लीन हैं, जाकर उनके दर्शन करो पुत्र।
राम, ऋषि पत्नी अहिल्या के समीप हैं, अहिल्या के प्रथम दर्शन पाने वाले राम उनकी चरणरज लेकर माथे से लगाते हैं। अहिल्या नेत्र खोल देती हैं, राम, पुत्र राम। शिलारूप प्राप्त ऋषि पत्नी पुत्र राम के स्पर्श मात्र से जैसे सजीव हो उठी थीं। राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है, अहिल्या के नेत्रों से इतने दिनों का संचित अपराधबोध बह निकलता है जैसे आज सारी सीमायें तोड़ ही देगा। राम, मेरे राम, मेरा....कुछ नहीं माँ, आप सदा वंदनीया, प्रातः स्मरणीया हैं, आप ऋषि पत्नी हैं माँ। शांत होइये, मुझे आशीर्वाद दीजिये माँ।
सदा सुखी रहो राम, विजयी भव पुत्र।
सजल नेत्रों से राम को विदा करती हैं ऋषि पत्नी।

(पौराणिक कथाओं की अधिक जानकारी मुझे नहीं है, संदर्भ व प्रसंग में त्रुटियाँ संभव हैं, अतः आप सभी से अनुरोध है कि इसे एक काल्पनिक कथा ही मानें 

Friday, January 22, 2016

(4) "भूख़ (मेरी चौथी कहानी)"

गिरिजा देवी, यही नाम था अजिया का। अजिया मतलब, दूर के रिश्ते में वो मेरी नानी की सास लगीं। जब हम लोग नानी के गाँव जाते तो उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुये बिना न रह पाते थे। वो जानती थीं कि हम बच्चे शहर के स्कूलों में पढ़ते हैं, गाँव की बोली-भाषा हमारे पल्ले नहीं पड़ेगी और हम लोग पगलैट नज़र आयेंगे, इसलिये हम लोगों से खड़ी बोली हिंदी में ही बात करतीं थीं। उनका स्वर बहुत रौबदार हुआ करता। गोरा-चिट्टा रंग-रूप और कलफ़दार सूती साड़ी पहने वह किसी सुंदरी से कम न लगती थीं। उनका पक्का मकान गाँव में सबसे अच्छा था। घर से लगा हुआ पक्की जगत वाला, मीठे पानी का एक पुश्तैनी कुआँ था। हम बच्चों के लिये कुँए से पानी भरकर लाना एक मजेदार अनुभव होता था।
दादा-अजिया शहर की सरकारी नौकरी से रिटायर होकर गाँव वाले अपने पक्के मकान में आकर बस गये थे। एक पक्का मकान अब शहर में भी था। अजिया की एकमात्र संतान उनका पुत्र था। वह शहर में बैंक में काम करते, देखने-सुनने में बेहतरीन, पर उन्हें शराब पीने की बुरी लत लगी हुई थी। हर महीने के अंत में मिलने वाली सारी तनख़्वाह इसी लत को समर्पित थी। हर बस वाला जिससे वो गाँव आते-जाते थे उन्हें पियक्कड़ बाबू के नाम से जानता था। पियक्कड़ बाबू जब इस लत के शिकार नहीं थे तब उनका विवाह एक सुंदर-सुशील कन्या जानकी के साथ हुआ था और इस युगल के दो पुत्र थे। यह परिवार शहर वाले मकान में रहता था। बच्चे शहर में ही स्कूलों में पढ़ते थे।
अपने बेटे की शराब पीने की लत से अजिया बहुत दुःखी रहतीं और सोचतीं कि किसी प्रकार इस दुर्गति से छुटकारा मिले।लेकिन वो दोहा है ना,
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय।।
उसी प्रकार, एक बार बिगड़े हुये बाग़ को तो फ़िर से बसाया जा सकता है पर बिगड़ी संतति को फ़िर से बनाने का कोई उपाय नहीं, निश्चितरूप से कोई उपाय नहीं। एक संतान आगे आने वाली कई पीढ़ियों की वाहक होती है, वह उन्हीं संस्कारों को लेकर आगे बढ़ती है जो उसे विरासत में मिले हैं, आप लाख़ प्रयास कर लें इसे बदल पाना अत्यंत कठिन है।
अंततः वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था, पर जो होकर ही रहा। पिता की देखादेखी वही करतूतें अजिया के बड़े पोते ने भी शुरू कर दीं, दिन बीतने की देर न थी कि छोटा भाई भी उसी राह पर। दो सुंदर-सुंदर बच्चे जो बड़े तो हुये पर इंसान न बन पाये।
जैसी जिसकी आदतें होती हैं उसका उठना-बैठना भी समान आदतों वालों के साथ होता है। इसी संगति के चलते शहर वाले मकान पर दबंगों का कब्ज़ा हुआ और गाँव की ज़मीन भी बिक गयी। ले दे कर गाँव का मकान ही बचा था जिसमें अब बस अजिया ही जीवित बची थीं।
इंसान चाहें शिशु हो या युवा या वृद्ध, एक बात जो जीवन की हर अवस्था में समानरूप से उपस्थित रहती है वह है भूख़, यह मृत्यु के साथ ही समाप्त होती है। अजिया का परिवार पतन के उस दौर से गुज़र रहा था जो अपनी नियति के लिये स्वयं उत्तरदायी था। आर्थिक सम्पन्नता क्या चीज़ है, कुछ नहीं। अजिया से अधिक धनी स्त्री तो पूरे गाँव में नहीं थी। चल-अचल सब संपत्ति थी उनके पास, आह दुर्भाग्य! आज यह कि एक रोटी के लिये वह सबके दर पर जातीं और लोग दुत्कार देते।
नानी सहृदय थीं और अपनी क्षमता भर उनकी सेवा करतीं फ़िर भी, अपनों की कमी उन वृद्ध स्त्री के हृदय पर गहरा आघात कर गयी थी।
बहुत दिनों के बाद मेरा गाँव जाना हुआ। देखा तो उनके मकान पर ताला लगा था। मैंने नानी से पूछा, अजिया कहाँ गयीं। नानी ने बताया कि दो दिन तक किवाड़ नहीं खुले और तोड़ कर देखा गया। वो खटिया पर निष्प्राण पड़ी थीं। आख़िर साँसों की डोर कब तक थमी रहती।
- अनामिका

Tuesday, January 19, 2016

"जैपनीज़ टी सेरेमनी"

जैपनीज़ टी सेरेमनी जापानी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी व्यक्ति के लिये यह एक अद्भुत व अभूतपूर्व बात हो सकती है। अपने अनुभव के आधार पर मैं अवश्य यह कहूँगी कि यदि संभव हो तो इसका अनुभव करना चाहिये।
यह "टी हाउस" हमारे निवास स्थान के बहुत नज़दीक है लेकिन कभी जाने का सोचा नहीं था, कारण था भाषा की जानकारी न होना। उस दिन 5 जनवरी, 2016 को सुबह सेंसेई ने फ़ोन किया, "अनामिका-सान, Are you busy?", (मुझे लगा कि मुझे उनके साथ शायद डांस क्लास में जाना था और मैं भूल गयी हूँ), मैंने पूछा, "Do we have dance class today?", सेंसेई की आवाज़,"No, no, not that, I want you to come for a Japanese Tea Ceremoney today at 1 O'Clock, Can you and Swarnim come? अपने तीन वर्षों के प्रवास में मैंने कभी इस बारे में सोचा ही न था। बेमन से ही सही, मैं राज़ी हो गयी।
हम दोनों सही समय पर कल्चर ज़ोन (जहाँ यह टी हाउस है) पहुँच गये।
वहाँ जाकर सेंसेई से पता चला कि यह विशेष सेरेमनी इस टी हाउस में साल में सिर्फ़ एक बार होती है, उन्हें इसकी जानकारी थी क्योंकि उनके पास पैम्फेलेट्स आते हैं (आते तो हमारे यहाँ भी हैं पर हम कौन सा पढ़ पाते हैं)।
अब हम टी हाउस में जाते हैं, जनवरी की ठंड में ये पहला कोज़ी रूम बड़ा अच्छा लगा। उसके बाद एक "तातामी रूम" है, तातामी रूम में ही बैठकर चाय पी जायेगी। तातामी रूम में जाने से पहले जूते हटाने होते हैं और एक दो सीढ़ी चढ़कर तातामी रूम आता है। इस रूम में तीन तरफ़ लकड़ी की दीवारें हैं और एक तरफ़ की पूरी दीवार काँच की है, यह हिस्सा गार्डन की तरफ़ खुलता है। यह तातामी रूम काफ़ी बड़ा है। हम तीनो लोग, सेंसेई, स्वर्णिम और मैं इस प्रकार बैठाये जाते हैं कि चाय पीते समय हम गार्डन को आराम से देख सकें। चाय सर्व करने वाली महिला प्रौढ़ हैं, उन्होंने किमोनो पहना हुआ है, उनकी सहायिका एक युवती हैं, इन्होंने ही हमें टी रूम में वेलकम किया था। तातामी रूम के बीच में ज़मीन के अंदर एक हीटर रखा है, जिस पर एक लोहे के भारी से बर्तन में पानी गर्म हो रहा है, इस केतलीनुमा बर्तन से पानी की भाप निकल रही है जो कि माहौल को और कोज़ी बना रही है। बर्तन के एक तरफ़ हम तीनो बैठे हैं और दूसरी तरफ़ चाय सर्व करने वाली महिला बैठी हैं। जापानी लोग आराम से वज्रासन में बैठ लेते हैं पर मेरे लिये यह बहुत कठिन काम है अतः हमें विदेशी होने के नाते छूट मिल गयी और हम आराम से सुखासन में बैठ लिये।
चाय सर्व करने से पहले हम तीनों के सामने स्ट्राबेरी फ़्लेवर की एक मिठाई रखी गयी, इसे खाने के लिये बांस के बने छोटे-छोटे चम्मच भी रखे गये। ये चम्मच हैंडमेड थे और उन्होंने ही बनाये थे जो चाय सर्व करने वाली थीं। मिठाई दिये जाने का कारण यह बताया गया कि, "ग्रीन पाउडर्ड टी" जिसे जापानी भाषा में "माचा" कहते हैं पीने में कड़वी होती है, मिठाई के साथ कम कड़वी लगती है। आधी मिठाई खा चुके होने के बाद चाय सर्व की गयी।
चीनी मिट्टी के प्यालों में ग्रीन टी का पाउडर था, हमारे सामने के पानी के बर्तन से, एक बांस के चमचे से, पानी निकाल कर चाय के प्यालों में डाला गया। अब हम तीनों को एक-एक बीटर (बांस का बना हुआ) दिया गया, इस बीटर से चाय के पाउडर और पानी को इस प्रकार मिलाना था कि झाग बन जाये (ऐसी ग्रीन टी मैंने पहली बार ही पी थी, बेशक़ कड़वी ही थी). चाय पीने का यह अनुभव इसलिये ख़ास है कि यह एक परिवेश को सम्पूर्णरूप से आत्मसात करने का अनुभव था, किसी प्रकार की जल्दी नहीं, कोई हड़बड़ी नहीं, चाय पीते हुये बाहर गार्डन को निहारना और तातामी रूम की कोज़ीनेस और हरी चाय की ख़ुशबू को हमेशा के लिये बसा लेना। किसी ज़माने में ये टी हॉउसेज़ मंत्रणा कक्ष होते थे। जापान में टी हाउस अपेक्षाकृत काफ़ी बड़े आकार के होते हैं, यह कोई सामान्य बात नहीं है, क्योंकि यहाँ इतनी जगह तो महँगे रेस्टॉरेंट्स में भी नहीं होती।
टी सेरेमनी के दौरान दो महिला आगंतुक और आयीं, साथ में आये पाँच बच्चे। तीन बच्चे जो शायद नर्सरी या प्ले ग्रुप के बच्चे थे, उन्हें इस एक्सपीरियंस के लिये लाया गया था, बाकी दो बच्चे छोटे थे और अपनी-अपनी मम्मियों से चिपके थे। इन तीनों बच्चों में एक लड़का और दो लड़कियाँ थीं। लड़का हर बात पर सिर हिलाता जा रहा था और जैसे ही मिठाई सर्व की गयी, उसने फ़टाफ़ट निपटाई। मैं मन ही मन सोचती रही कि बेटा अब माचा कैसे निपटाओगे, स्वीटू। बड़ा प्यारा लगा वो नन्हा-मुन्ना। दुनियाभर के लड़के मिठाई के शौक़ीन होते हैं, ये विश्वास भी पुख़्ता हो गया। गोलू-मोलू को वहीं छोड़ हम गार्डन में निकल गये। वहाँ तालाब में मछलियाँ देखीं और प्लम के फ़ूल सूँघते हुये घर वापस आ गये।
इस अनोखे अनुभव के बारे में यही कह सकती हूँ कि कुछ खुशबुएँ और कुछ दृश्य हमेशा के लिये दिल में बस गये।
(अधिक जानकारी के लिये यह लिंक भी शेयर कर रही हूँ:-
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Japanese_tea_ceremony)