Saturday, February 28, 2015

जब शरीर साथ छोड़ रहा हो और आप अपनी पीड़ा किसी भी भाषा में व्यक्त न कर सकते हों तो सारा व्याकरण का ज्ञान व्यर्थ है, आज मैं इस सच को हृदय में महसूस कर रही हूँ, मेरे इस सच का ज्ञान कब तक मेरा साथ देगा ये नहीं जानती, परन्तु इसी सच को अनुभव कर रही हूँ अभी (मैं पूरी तरह स्वस्थ हूँ, पर फिर भी यह अनुभूति कष्टकर है )

Friday, February 27, 2015

(1) "भारतीय समाज"

भारतीय समाज की, बस एक ही पहचान,
लड़की हो सुन्दर, और लड़का बुद्धिमान,
हुआ जो इसका उल्टा, समझो आफत महान,

लड़की नहीं है रूपसी, ईश्वर ने दिया ज्ञान,
पर, क्या करेगी पढ़-लिख कर गणित और विज्ञान,
बनाना तो उसे खाना है चाहें रोटी हो या नान,

माता-पिता की बस चिंता यही,
कैसे होगी शादी लड़की की, और कैसे करेगा लड़का काम,

लड़का जी हैं रूपधनी पर पढ़ने से मजबूर,
माता-पिता देखें कैसे, अपने सपने होते चूर,
अपने सपने होते चूर न देखे जाते,
किसी न किसी कालेज में जरूर दाख़िला करवाते,

आगे की कहानी अब हम अपने मुँह से क्या बतलायें ,
आप सब हैं समझदार, इशारों से काम चलायें,

भारतीय समाज की, बस एक ही पहचान,
लड़की हो सुन्दर, और लड़का बुद्धिमान…………

Tuesday, February 24, 2015

धन-सम्पदा

अक्सर हम ये सोचते हैं कि हमारे पास फलाँ चीज़ की कमी है |  ऐसा तब अधिक होता है जब हम भविष्य या भूतकाल के बारे में सोच रहे होते हैं, ऐसा तब भी होता है जब हम अपनी परिस्थिति की तुलना किसी दूसरे से करते हैं | पर क्या आपने कभी लिस्ट बनाई है कि आपके पास क्या-क्या धन-सम्पदा है..... आइये देखते हैं कि निम्नलिखित धन में से आपके पास क्या-क्या है:-

१. दिन-रात धड़कने वाला दिल.
२. सोच-समझकर काम करने वाला दिमाग.
३. सुंदरता को समेट सकने वाली आँखें.
४. परिश्रम कर सकने वाली दो भुजायें.
५. साहित्य रच सकने वाले दो हाथ
६. स्वाद का आनंद ले सकने वाली जीभ
७. गायन कर सकने वाली वाणी.
८. स्वर का ज्ञान करा सकने वाले कान.
९. जहाँ चाहें वहां ले जाने वाले कदम.
१०. सारे संसार का दर्शन करा सकने वाली पुस्तकें.
११. सृजन कर सकने वाला मन.
१२. मन को सुखी करने वाले मित्र.
१३. सदैव शुभेक्षु माता-पिता
१४. धर्य.
१५. संकल्प
१६. लगन
१७. प्रशक्ति
१८. स्वतंत्रता
१९. विश्वास
२०. आत्मविश्वास
२१. आत्मनिर्भरता
२२. जीवनसाथी
२३. संतान
२४. गुरुजनों का आशीर्वाद
२५. ईश्वर की कृपा
२६. संवेदना
२७. दान देने की इच्छा एवं क्षमता
२८. जिज्ञासा
२९. सहायता करने की तत्परता
३०. कार्य-कुशलता

Monday, February 23, 2015

अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम |
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरुवै नमः ||

अर्थ : खण्डित न हो सकने वाले, संपूर्ण संसाररूपी, प्रत्येक चर व अचर में व्याप्त, ऐसे ईश्वर के दर्शन कराने वाले गुरु को मैं नमन करता हूँ |

आज-कल ये श्लोक " चक्रवर्ती सम्राट अशोक" नाम से प्रसिद्ध सीरियल में सुनाई देता है, आज मेरे पुत्र जी ने मुझसे इसका अर्थ पूछा, यदि मेरे द्वारा किये हुए अनुवाद में कोई त्रुटि हो तो कृपया सूचित करें |

"मातृभाषा दिवस" 21 फरवरी 2015 के उपलक्ष में यह पोस्ट हिंदी में.……

Wednesday, February 18, 2015

रूद्राष्टक (महाशिवरात्रि २०१५ )

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं | विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ||
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं | चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं || 
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं | गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं ||
करालं महाकाल कालं कृपालं | गुणागार संसारपारं नतोहं ||
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं | मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरं |
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा | लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ||
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं | प्रसन्नानं नीलकण्ठं दयालं ||
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं | प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं | अखण्डं अजंभानुकोटिप्रकाशम् ||
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं | भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं ||
कालातीत कल्याण कल्पांतकारी | सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ||
चिदानंद सन्दोह मोहापहारी | प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ||
न यावद उमानाथ पादारविन्दं | भजंतीह लोके परे वा नराणाम् ||
न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं | प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ||
न जानामि योगं जपं नैव पूजाम् | नतोहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ||
जरा जन्मदुःखौघ तातप्यमानं | प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेणाहरतोषये |
ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शंभु प्रसीदति ||

Monday, February 16, 2015

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन, हरण भवभय दारुणं |

नवकंज लोचन कंजमुख, करकंज पदकंजारुणं ||


कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनीलनीरद सुन्दरं |

पटपीत मानहु तड़ित रुचि-शुचि, नौमि जनक सुतावरं ||

भजु दीनबंधु दिनेश, दानव दैत्यवंश निकंदनं |

रघुनंद आंनदकंद, कोशलचंद दशरथनंदनं ||

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु, उदारु अंग विभूषणं |

आजानुभुज शर चाप धर, संग्राम जित खर-दूषणं ||

इति वदित तुलसीदास, शंकरशेषमुनिमनरंजनं |

मम हृदय कुंज निवास कुरु, कामादि खल-दल गंजनं |

मनु जाहि राचेउ मिलिह, सो बरु सहज सुंदर साँवरो |

करुणानिधान सुजान शीलु, सनेहु जानत रावरो ||

एही भाँति गौरी असीस सुनि, सिय सहित हियँ हर्षितअली |

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि, मुदित मन-मंदिर चलीं ||

"जानि गौरी अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाहि कही |
मंजुल-मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे ||"

Saturday, February 7, 2015

सत्य की खोज में एक और दिन

कुछ वर्षों पूर्व मेरा ये विचार था कि सत्य शाश्वत होता है, किसी ने अपना विचार रखा कि सत्य गतिमान होता है. हो सकता है कि ये दोनों ही बातें सही हों, पर इतने वर्षों के विचार मंथन के बाद यही समझ में आया है कि व्यक्त हो या अव्यक्त, गतिमान हो यो स्थिर, सत्य अटल होता है, तथा सही समय पर ही प्रकट होता है. जब भी प्रकट हो, वही उचित समय होता है. सत्य का प्रकट हो जाना मानव के हित में ही होता है.

Friday, February 6, 2015


वसुदेवसुतम देवं कंसचाणूरमर्दनम |
देवकीपरमानंदम कृष्णम वन्दे जगदगुरुम ||

vasudevsutam devam kamsachadoormardanam |
devakiparamanandam krishnam vande jagadgurum ||