Friday, March 20, 2015

यहाँ जापान में मेरी हालत पीके मूवी के पीके जैसी ही रहती है, पीके सुन तो सब लेता है पर रिस्पॉन्ड नहीं कर पाता है, क्यूंकि वह भाषा नहीं जानता, जिसका भी हाथ पकड़ लेता है उसका माइन्ड रीड कर लेता है (अपन को भी वही जुगाड़ लगाना पड़ता है, वाक्य में से शब्द चुनकर पॉसिबल अर्थ बनाओ, पर डर रहता है कि अर्थ का अनर्थ न हो जाए), आज अपनी टीचर के साथ "गार्डनिंग" की क्लास में गयी थी, न मेरी टीचर को अंग्रेज़ी आती है न ही गार्डनिंग सिखाने वाली मैडम को, सब कुछ जापानी में चल रहा था. तारीफ़ वाले कुछ शब्दों का अर्थ मुझे पता है, तो काम खत्म होने के बाद ये तो पता चल गया कि काम अच्छे से हुआ, क्यूंकि तारीफ़ हुई. जापानी लोग ईमानदार होते हैं, तो ये माना जा सकता है कि तारीफ़ भी झूठी नहीं होगी.

मेरी टीचर की बेटी भी मेरी ही उम्र की हैं, एक स्कूल में अंग्रेज़ी पढ़ाती हैं, काफी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हैं (ऑस्ट्रेलिया में २ साल रहकर सीख आई हैं) उनसे मिलकर काफी अच्छा लगा, वरना तो हमलोग जापानियों के लिए दूसरे "गोले" के प्राणी हैं. विदेशियों को यहां "गईजिन" अर्थात "एलियन" के नाम से ही जाना जाता है.

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