ओ भारत की स्त्री चेतना,
क्यूँकर रक्त-बीज उगाये,
शील हरे वो निर्भया का,
शीश फिर भी न झुकाये,
रक्त-मांस-मज्जा और दुग्ध से,
पोषित करके पाला जिनको,
वही नोचते देह मात की,
लज्जा न आती किंचित उनको,
जब-तक चेतना नहीं जगाओगी,
चिता यूँ ही जलाओगी,
उठ जाग जाओ अब रैन नहीं,
अब नहीं तुम शुक्र मनाओगी
क्यूँकर रक्त-बीज उगाये,
शील हरे वो निर्भया का,
शीश फिर भी न झुकाये,
रक्त-मांस-मज्जा और दुग्ध से,
पोषित करके पाला जिनको,
वही नोचते देह मात की,
लज्जा न आती किंचित उनको,
जब-तक चेतना नहीं जगाओगी,
चिता यूँ ही जलाओगी,
उठ जाग जाओ अब रैन नहीं,
अब नहीं तुम शुक्र मनाओगी
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