आज आधुनिकता की चकाचौंध में हम अपनी भारतीय संस्कृति की एक अमूल्य देन को भुला बैठे हैं. वो अमूल्य देन है भारत के विभिन्न प्रांतों में मनाये जाने वाले त्योहार. पूर्व से लेकर पश्चिम तक, किसी भी सभ्यता में इतने त्योहार नहीं मनाये जाते हैं जितने कि भारत में, आखिर इसका कोई तो विशेष कारण होगा, जो हमारे पूर्वजों ने इन त्योहारों को मनाने की नींव डाली।
मैं उत्तर-भारतीय हूँ अतः उत्तर-भारत में मनाये जाने वाले त्योहारों की बात ठीक से कर सकती हूँ, बाकी भारत के बारे में आप स्वयं अपने क्षेत्र के अनुसार विचार कर सकते हैं.
इन्हें मनाने के कई उद्देश्यों में से मुख्य उद्देश्य मुझे यही लगता है कि, संगठन की भावना को बल प्रदान करने के लिए ही इनकी स्थापना की गयी थी. मानव के दिन-प्रतिदिन के जीवन में धीरे-धीरे नीरसता अपना घर बनाने लगती है और धीरे-धीरे ये व्यक्तिगत एवं सामाजिक संबंधों पर भी हावी होने लगती है. भाई-बहनों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों आदि से परस्पर भेंट के अवसर कम होते जाते हैं और हम उदासीन होकर ये सोचते हैं कि किसी को हमारी चिंता और आवश्यकता ही नहीं है, पर ये नहीं सोचते हैं कि दूसरा व्यक्ति भी ऐसा ही सोचता होगा. अंततः संबंधों की नींव दुर्बल हो जाती है, अकेलापन हावी होता है और हमें सारे समाज से समस्या हो जाती है. इस पूरी प्रक्रिया में हमें कभी भी खुद से समस्या नहीं होती है बल्कि दूसरों से होती है.
ये त्योहार हमें बाध्य कर देते हैं कि हम अपनी इस अदृश्य परिधि से बाहर जाकर लोगों से मिले-जुलें, उनके दुःख-सुख बाटें और कुछ नहीं तो कम-से-कम "देख-सुन" आयें. क्या हम अपनों के लिए इतना भी नहीं कर सकते? यदि, अपनों के लिए इतना भी नहीं कर सकते तो फिर दूसरों के लिए करेंगे, इसकी क्या अपेक्षा की जा सकती है?
बस एक अंतिम प्रश्न, आपको अपने जीवन में कितने लोगों की चिंता है ? यदि है, तो इस अवसर का लाभ उठाइये और अपने-अपनों से बात कीजिये, दूसरों से भी बात कर सकते हैं.
यदि आपने इस लेख को अब-तक पढ़ा है तो यही सोच रहे हैं कि, अभी तक किसी त्योहार का नाम नहीं लिया, मित्रों, आज होली है और मैं अपने घर-परिवार से हज़ारों किलोमीटर दूर हूँ, पर बहुत से लोग हैं जो अपने परिवार के पास होकर भी पास नहीं हैं, बस उन्हीं से मेरा नम्र निवेदन है कि, अपने परिवारीजनों के साथ समय बिताइये, सुख हो या दुःख मिलकर बाँट लीजिये, एक प्रयास कीजिए.
मैं उत्तर-भारतीय हूँ अतः उत्तर-भारत में मनाये जाने वाले त्योहारों की बात ठीक से कर सकती हूँ, बाकी भारत के बारे में आप स्वयं अपने क्षेत्र के अनुसार विचार कर सकते हैं.
इन्हें मनाने के कई उद्देश्यों में से मुख्य उद्देश्य मुझे यही लगता है कि, संगठन की भावना को बल प्रदान करने के लिए ही इनकी स्थापना की गयी थी. मानव के दिन-प्रतिदिन के जीवन में धीरे-धीरे नीरसता अपना घर बनाने लगती है और धीरे-धीरे ये व्यक्तिगत एवं सामाजिक संबंधों पर भी हावी होने लगती है. भाई-बहनों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों आदि से परस्पर भेंट के अवसर कम होते जाते हैं और हम उदासीन होकर ये सोचते हैं कि किसी को हमारी चिंता और आवश्यकता ही नहीं है, पर ये नहीं सोचते हैं कि दूसरा व्यक्ति भी ऐसा ही सोचता होगा. अंततः संबंधों की नींव दुर्बल हो जाती है, अकेलापन हावी होता है और हमें सारे समाज से समस्या हो जाती है. इस पूरी प्रक्रिया में हमें कभी भी खुद से समस्या नहीं होती है बल्कि दूसरों से होती है.
ये त्योहार हमें बाध्य कर देते हैं कि हम अपनी इस अदृश्य परिधि से बाहर जाकर लोगों से मिले-जुलें, उनके दुःख-सुख बाटें और कुछ नहीं तो कम-से-कम "देख-सुन" आयें. क्या हम अपनों के लिए इतना भी नहीं कर सकते? यदि, अपनों के लिए इतना भी नहीं कर सकते तो फिर दूसरों के लिए करेंगे, इसकी क्या अपेक्षा की जा सकती है?
बस एक अंतिम प्रश्न, आपको अपने जीवन में कितने लोगों की चिंता है ? यदि है, तो इस अवसर का लाभ उठाइये और अपने-अपनों से बात कीजिये, दूसरों से भी बात कर सकते हैं.
यदि आपने इस लेख को अब-तक पढ़ा है तो यही सोच रहे हैं कि, अभी तक किसी त्योहार का नाम नहीं लिया, मित्रों, आज होली है और मैं अपने घर-परिवार से हज़ारों किलोमीटर दूर हूँ, पर बहुत से लोग हैं जो अपने परिवार के पास होकर भी पास नहीं हैं, बस उन्हीं से मेरा नम्र निवेदन है कि, अपने परिवारीजनों के साथ समय बिताइये, सुख हो या दुःख मिलकर बाँट लीजिये, एक प्रयास कीजिए.
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