जगद् गुरु आदि शंकराचार्य जी की जयन्ती पर लिखा था .....
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वम् |
निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं, निश्चलतत्वे जीवनमुक्तिः || (९)
- श्री शंकराचार्य
भावार्थ: सत्य की संगत करने वाले व्यक्ति, सभी प्रकार के संग से छूट जाते हैं, फलतः उनकी दुविधा भंग हो जाती है, दुविधा भंग होने से वो निश्चयात्मक बुद्धि को प्राप्त होते हैं. यह निश्चयात्मक बुद्धि अंततः मुक्ति का मार्ग प्रदर्शित करती है|
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वम् |
निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं, निश्चलतत्वे जीवनमुक्तिः || (९)
- श्री शंकराचार्य
भावार्थ: सत्य की संगत करने वाले व्यक्ति, सभी प्रकार के संग से छूट जाते हैं, फलतः उनकी दुविधा भंग हो जाती है, दुविधा भंग होने से वो निश्चयात्मक बुद्धि को प्राप्त होते हैं. यह निश्चयात्मक बुद्धि अंततः मुक्ति का मार्ग प्रदर्शित करती है|
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