Monday, April 20, 2015

(12) "समझ रह गयी कच्ची है"

शून्य में मिलकर शून्य हुये सब,
साथ आये दस गुना गये बढ़,
एक मिले एक और एक से,
मिलकर हो गए एक,
गणित तो हमारी पक्की है, 
पर समझ रह गयी कच्ची है.

विपरीत मिले से हो आकर्षण,
समान मिले विकर्षण,
गुण सही मिले तो युग्म बने,
नहीं तो होता घर्षण,
भौतिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

जो चीज़ ज़रूरी है जीवन में,
वह मिले बहुत ही सस्ती,
पत्थर-मिट्टी बन जाते क़ीमती,
होती है उनकी हस्ती,
आर्थिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

परिकल्पना बनी, मिले आंकड़े,
सिद्ध हुये सिद्धांत,
जीवन चले न कल्पना से,
चाहिए उसे स्वाभिमान,
सांख्यिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

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