हम सब में से अधिकाँश लोग उदासी के दौर से गुज़रते हैं, कुछ समय के बाद सबकुछ सामान्य हो जाता है। इस अवस्था के अनेक मनोवैज्ञानिक और क्लिनिकल कारण हो सकते हैं परंतु मेरे विचार से, इन कारणों में जो सबसे सामान्य कारण है, वह है अवस्था परिवर्तन को स्वीकार न कर पाना( refusal to change, inertia)।
आपने छोटे बच्चों को कम ही उदास देखा होगा, उसका कारण है कि छोटे बच्चे अवस्था परिवर्तन को सहजरूप से स्वीकार कर लेते हैं, फ़िर क्या कारण है कि बड़े लोग ऐसा नहीं कर पाते? उम्र में बड़े होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि हम हर स्थिति को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि आराम की जो भी स्थिति निर्मित हो गयी है उसमें रत्ती भर भी बदलाव न आये। दिन-पर-दिन हमारी अवस्था परिवर्तन को स्वीकार कर सकने की क्षमता कम होती जाती है और साथ ही हमारे सब्र का बाँध भी टूटने लगता है। नतीज़तन हम एक हताश व निराश व्यक्ति में बदलने लगते हैं। आप स्वयं देखिये, उचित क्या है? अवस्था परिवर्तन के साथ स्वयं को ढ़ालना या बदलने से इंकार करना? यहाँ आपको यह याद रखना होगा कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है और इस नियम में सृष्टि वज्र समान निष्ठुर है। परिवर्तन तो होकर ही रहता है, आप चाहें या न चाहें। जिसने जन्म ले लिया, वह सदैव शिशु बनकर तो नहीं रह सकता, उसे हर अवस्था से गुज़रना ही पड़ेगा, उसके चाहने या न चाहने से कुछ अंतर नहीं पड़ता। अब यह निर्णय आपको करना है कि आपको प्रकृति/सृष्टि के साथ चलना है या उसके विपरीत। इसका उत्तर आप भलीभाँति जानते हैं।
आपने छोटे बच्चों को कम ही उदास देखा होगा, उसका कारण है कि छोटे बच्चे अवस्था परिवर्तन को सहजरूप से स्वीकार कर लेते हैं, फ़िर क्या कारण है कि बड़े लोग ऐसा नहीं कर पाते? उम्र में बड़े होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि हम हर स्थिति को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि आराम की जो भी स्थिति निर्मित हो गयी है उसमें रत्ती भर भी बदलाव न आये। दिन-पर-दिन हमारी अवस्था परिवर्तन को स्वीकार कर सकने की क्षमता कम होती जाती है और साथ ही हमारे सब्र का बाँध भी टूटने लगता है। नतीज़तन हम एक हताश व निराश व्यक्ति में बदलने लगते हैं। आप स्वयं देखिये, उचित क्या है? अवस्था परिवर्तन के साथ स्वयं को ढ़ालना या बदलने से इंकार करना? यहाँ आपको यह याद रखना होगा कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है और इस नियम में सृष्टि वज्र समान निष्ठुर है। परिवर्तन तो होकर ही रहता है, आप चाहें या न चाहें। जिसने जन्म ले लिया, वह सदैव शिशु बनकर तो नहीं रह सकता, उसे हर अवस्था से गुज़रना ही पड़ेगा, उसके चाहने या न चाहने से कुछ अंतर नहीं पड़ता। अब यह निर्णय आपको करना है कि आपको प्रकृति/सृष्टि के साथ चलना है या उसके विपरीत। इसका उत्तर आप भलीभाँति जानते हैं।
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