Thursday, April 30, 2015

प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाई |
राजा प्रजा जिस रुचे, सीस देय ले जाई ||
Love is not grown in the field, and it isn’t sold in the market
But a king or a pauper who likes it, offers his head to obtain it
MEANING:
In the region of love there is no difference between king or pauper. Who wants to get love has to give up his ego, all other wealth has no value in love. Love is spiritual, not a material thing.

क्रोध पर विजय


मेरे विचार से क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए क्रोध को जानना आवश्यक है| मेरा यह भी मानना है कि जो व्यक्ति हिंसा को नहीं जानता है वह हिंसा पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता है|

मानव मन की कई परतें व सतहें होती हैं जिनसे मानव स्वयं भी अनभिज्ञ व अपरिचित होता है अतः पूरे जीवनकाल में अहिंसक दिखने वाला व्यक्ति कब हिंसक रूप धारण कर ले यह कह सकना कठिन है| उसी प्रकार एक सदैव शांत दिखने वाला तथा शांत व अविचलित रहने वाला व्यक्ति जब जीवन के कमज़ोर क्षणों में क्रोधी व्यक्ति का आचरण करता है तो उसके परिजन भयभीत हो जाते हैं| किन्हीं विशेष परिस्थितियों में तो उसे झूठा व ढोंगी भी समझा जा सकता है| परंतु वास्तविकता कुछ और ही होती है| ऐसा व्यक्ति एक कमज़ोर, हारा हुआ, हताश और अज्ञानी प्राणी होता है, क्योंकि वह स्वयं अपने मूल स्वभाव से अपरिचित होता है|

अब प्रश्न यह उठता है कि वह अपने मूल स्वभाव से अपरिचित क्यों होता है? इसका उत्तर देना सरल कार्य नहीं है, कारण यह है कि किसी विशेष परिस्थिति में मनुष्य का व्यवहार बहुत सी बातों पर निर्भर करता है| स्वयं के मूल स्वभाव से अपरिचित होने के कारणों में बहुत बड़ा योगदान हमारे संस्कारों का है, और हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार मनुष्य अपने पूर्व-जन्म के संस्कारों को भी अपने साथ लाता है|

क्रोध का मूल कारण अज्ञान है, अतः क्रोध पर विजय पाने के लिए अपने मूल स्वभाव का ज्ञान तथा क्रोध की उत्पत्ति के कारणों का ज्ञान आवश्यक है| जब तक आप इन दोनों बातों का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते हैं तब तक न ही आप क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकते हैं न ही आप सत्य का साक्षात्कार कर सकते हैं|

मानव जीवन का लक्ष्य सत्य से साक्षात्कार है, वही आनंद का स्रोत है, परंतु क्रोध पर विजय प्राप्त किए बिना इस आनंद की प्राप्ति संभव नहीं है| अतः, अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कीजिए और जीवन का आनंद लीजिए| - अनामिका

Self-image


I never knew I will be disturbed by my friends in Japan, when I am writing something, but this is a blessing indeed. [I was being disturbed twice while I was writing this piece, so there could be disconnections].
I have been reflecting on this topic: Self-image, for a long time and here are my findings. What is “Self-image”? As per my understanding, it is the summation of various reflections. The problem with us is, we cannot see ourselves, we can only see others, and therefore we make a perception of other human beings based on the information provided by our senses. There is one more factor that determines our perception about others, which is the state of mind. Therefore, we make a decision about other person’s image based on the information provided and also the state of mind at that point of time. Hence, we seems to be ready to judge the personality and actions of others. But, we find it very difficult to do the same for ourselves.
The first reception of our image is the imaginary “image”, which is reflected in the “Mirror”. Few researches say that we see a far better looking picture of ourselves than we actually are.
The second basis of information is the opinions of others. We often base our image on the opinions provided by the people around us. Sometimes they are family members, friends, teachers, colleagues, neighbors and strangers.
My interest is to know whether the image “formed”, based on the various information received from various sources, is “Real” or “Not-real”. The likely answer to this question is “Not-real”. Now the next question arises, if we know that the “Self-image” is not real, then why we carry it with us everywhere? Again, I get the same answer, because we do not know ourselves well enough, and we do not have the courage to be the “real”. Why we do not have the courage, because our “Ego” is vulnerable.
The made-up “Self-image” is the byproduct of our thoughts, and we are so much attached to our thoughts and convictions that we do not want to leave those even for a fraction of second, therefore we carry our “Made-up Self-image” with us everywhere.
Market-researchers have a very good idea of this “Imaginary or Made-up Self-image” and also the fragile nature of it, that they relate their products with the kind of image we have created for ourselves. Their objective is very clear, that is to sell the product or service.
There are numerous examples of human actions based on the “Self-image”. For example, the kind of cloths one wears, kind of language one speaks, kind of hobbies and possessions etc. The “Self-image” is not only related with the material possessions but the behavior of a person also is governed by this “Imaginary Self-image”. We cannot term it a “Hippocratic behavior” because it is not a conscious effort, rather it is so unconscious that we are unaware of it. One can mistake the “Imaginary Self-image” and “low self-esteem” to be interchangeable, but it is not the case. People with high self-esteem also have an “Imaginary Self-image”.
Now the concluding question here is: How can we decide if a “Self-image” is “fake” or “real”?
There is one and only one way to do it, and that is, to see oneself as we see others. The moment you will start seeing your own actions and thoughts as you see other’s, you will know if your “Imaginary Self-image” is “fake” or “real”. That is where you will find your answer….
सज्जनों के गुण:
१. जो लोग दूसरों की खुशी में वास्तव में खुश हों.
२. जो लोग हमेशा दूसरों के गाढ़े वक़्त में काम आएँ.
३. जो लोग दूसरों से सद्भाव व संवेदना रखें.
४. जो लोग अपने कृत्यों को नियंत्रण में रखें.
५. जो लोग दिल से प्यार करें, प्यार का दिखावा नहीं.

दुर्जनों के गुण:
१. वे लोग जो मन, वचन व कर्म से दूसरों को दुःख पहुँचाने का काम करें.
बस, दुष्ट लोगों की यही एक पहचान है, और इतना ही काफ़ी है, अच्छे लोगों में ऐसे अनगिनत गुण होते हैं, कि आप जब भी ऐसे लोगों से मिलते हैं आनंद की अनुभूति होती है, पर बुरे लोगों के बारे में और क्या कहूँ, आप सबका परिचय ऐसे लोगों से गाहे-बगाहे होता ही होगा, तब आप उन चन्द अच्छे लोगों को याद कर सकते हैं जो भले ही आपसे जीवन में एक बार ही मिले हों, लेकिन अभी तक आपके साथ हैं.....
मैं स्वयं "सामान्य वर्ग" (जोकि मध्य मार्ग अपनाता है) में आती हूँ.....
जगद् गुरु आदि शंकराचार्य जी की जयन्ती पर लिखा था .....

सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वम् |    
निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं, निश्चलतत्वे जीवनमुक्तिः || (९)
- श्री शंकराचार्य

भावार्थ:  सत्य की संगत करने वाले व्यक्ति, सभी प्रकार के संग से छूट जाते हैं, फलतः उनकी दुविधा भंग हो जाती है, दुविधा भंग होने से वो निश्चयात्मक बुद्धि को प्राप्त होते हैं. यह निश्चयात्मक बुद्धि अंततः मुक्ति का मार्ग प्रदर्शित करती है|

Monday, April 20, 2015

(12) "समझ रह गयी कच्ची है"

शून्य में मिलकर शून्य हुये सब,
साथ आये दस गुना गये बढ़,
एक मिले एक और एक से,
मिलकर हो गए एक,
गणित तो हमारी पक्की है, 
पर समझ रह गयी कच्ची है.

विपरीत मिले से हो आकर्षण,
समान मिले विकर्षण,
गुण सही मिले तो युग्म बने,
नहीं तो होता घर्षण,
भौतिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

जो चीज़ ज़रूरी है जीवन में,
वह मिले बहुत ही सस्ती,
पत्थर-मिट्टी बन जाते क़ीमती,
होती है उनकी हस्ती,
आर्थिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

परिकल्पना बनी, मिले आंकड़े,
सिद्ध हुये सिद्धांत,
जीवन चले न कल्पना से,
चाहिए उसे स्वाभिमान,
सांख्यिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

Sunday, April 19, 2015

(11) "पिता"

पिता बोता है सपने,
सुनहरे, रुपहले, सतरंगी, अनोखे,
रोज़,

पिता बढ़ता है वट सा,
छाया देता, पोषक, रक्षक,
रोज़,

पिता बदलता है सपने,
बच्चों के सपनों से,
रोज़,

पिता देता है उड़ान,
पंखों को, डोर जीवन की,
रोज़,

पिता मिटाता है रुकावट,
बनकर एक रुकावट,
रोज़,

पिता पी जाता है आँसू, विदा के
बसाकर बेटी को दिल में,
रोज़,

पिता सहता है पीड़ायें,
अनेक, प्रेम के बदले में,
रोज़,

पिता होता है इक बाग़बाँ,
देख कोंपलें ख़ुश होता है,
रोज़,

पिता चुकाता है क़ीमत,
ताक़तवर होने की,
रोज़,

पिता जिज्ञासा की कड़ी,
पहली, आधार ज्ञान का,
रोज़,

पिता खिलता है, बच्चों से,
मुस्कान से, खिलता है चेहरा जिसका,
रोज़,

पिता, पहला परिचय, संसार से,
वयस्क होने से पहले,
रोज़,

पिता साथ है, हमारे सदा,
हर रूप में, हर जगह,
रोज़.…

(हर संवेदनशील पिता को समर्पित)

Friday, April 17, 2015

(10) "बचपन"

वो सर्दियों की गुनगुनी धूप में,
ताज़े अमरूदों को निपटाना,

वो गर्मियों के थपेड़ों वाली लू में,
लगाकर नमक कच्चा आम खाना,

वो झमाझम बारिश में झूलना,
झूला, आम के पेड़ पर,

वो सूँघना नींबू के फूल काँटों के बीच,
मोगरे की कलियाँ लेकर घूम आना,

वो दनदनाते चलाना सायकिल,
ढ़लान पर, लुढ़कना चोट खाना,

वो घेर लेना बिल्लियों को,
लड़ाना कोयल से ज़ुबान,


वो मूंगफली सी बातें,
वो मुरमुरे से सपने,

वो चिढ़ाना छोटी बहन को,
खींचकर चोटी सबके सामने,

वो खेलना कोट-पीस,
करना नन्ही सी बेईमानी,


वो मम्मी से लिपट सो जाना,
थककर रात भर पढ़ने के बाद,

वो बेफ़िक्री के दिन और सुहानी शामें,
कोई ला दे, कहानियों वाली बचपन की रातें।

Thursday, April 16, 2015

(9) "हे चन्द्र"

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अभागे हो या बड़भागी,
कातिक में पूजे जाते हो,
भादों में हो जाते कलंकी,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सोलह कलाओं के स्वामी,
पूर्णिमा में चमकते हो,
फिर भी राहू के ग्रास,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सच में एक चरखा है,
एक धोखा है बस, या,
गड्ढे हैं तुम्हारी आँखों के,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
प्रेम गीतों में तुम साक्षी,
कवियों के प्रिय,
फिर भी बदनाम,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
द्विविमीय लगते रोटी से,
त्रिविमीय गोले से,
क्या छुपाते हो दूसरी ओर,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अनुसूया के पुत्र होकर भी,
कुछ सीखा नहीं माँ से,
बच्चों ने बना लिया,
खिलौना तुम्हें,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
क्या धरती से प्रेम है तुम्हें,
छिटकाकर फेंक दिए गये हो,
फिर भी रोज़ ताकते हो,
यूँही, दूर से,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
स्वयं का गुरुत्व नहीं कुछ,
ज्वार-भाटा लाते हो धरती पर,
क्यूँ चिपके हो,
क्या नहीं है स्वाभिमान,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
होता है क्या पुनर्जन्म,
बना देना इक पिण्ड मुझे,
देखना है,
दूसरी ओर से तुम्हें।

Wednesday, April 8, 2015

(8) "माँ"

जाने कब, सुबह से शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

माँ बनकर ही जाना मैंने,
क्या-क्या तुमने देखा होगा,
क्या कष्ट सहे, क्या भोगा होगा,
सबकुछ चुपचाप सहा होगा,
सहते-सहते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

तुम्हारी कापियों-किताबों को,
कितना मैंने गोचा होगा,
अधबुने उस स्वेटर को,
कितनी बार उधेड़ा होगा,
बुनते-बुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

आँखों के चमकीले तारे,
होंठों की प्यारी मुस्कान,
तेरी निश्छल हँसी,
गीतों की वो मीठी तान,
सुनते-सुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी

कठिन समय था नया दौर था,
ख़ुद को कितना ढ़ाला होगा,
हम दोनों को पाला होगा,
ख़ुद को कैसे सम्हाला होगा,
सोचते-सोचते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

Tuesday, April 7, 2015

(7) "ज़िन्दगी"

ह्रदय की धड़कन है,
या नाड़ी का स्पंदन,
झरने की कल-कल है,
या नदी का गमन,

तपती हुई धूप है,
या शीतल मंद समीर,
सुमनों की सुगंध है,
या मगन मन-मंदिर,

वर्षा की बूँदें हैं,
या लहराते हुए खेत,
ममता की छाँव है,
या मरुभूमि की रेत,

शिशुओं का रुदन है,
या तरुणियों की हँसी,
वृद्धों का अनुभव है,
या युवाओं की रवानी,

मोह का एक पाश है,
या मुक्ति का स्फुटन,
संबन्धों की गर्माहट है,
या अकेलेपन की घुटन,

ज़िन्दगी तो एक है,
पूछने हैं प्रश्न,
क्यूँ आती है, क्यूँ जाती है,
क्यूँ करती है पर्यटन?

Monday, April 6, 2015

(6) "मैं और तुम"

मेरी अपेक्षा, तुम्हारी अपेक्षा,
मेरी संतान, तुम्हारी संतान,
क्या है मेरा, क्या है तेरा,
न मुझ बिन तुम हो,
न तुम बिन मैं हूँ,
फिर यह कैसा बँटवारा,

ये धरती तेरी, वो आकाश मेरा,
मेरी धानी चुनर, वो नीलाम्बर तेरा,

अनुत्तरित प्रश्न फिर भी रहा,
उपजता है किससे,
किसमें जाता है समा,
कैसा विलगन, यह कैसा मिलन,
है प्रेम या है आकर्षण,
है मया या है समर्पण,
तू ही मैं है, और तू ही अर्पण।
क्या तुम, तुम हो या हो मेरा दर्पण।

Saturday, April 4, 2015

(5) "सूर्य-प्रभा"

धुंध कहीं छँटने लगी है,
बर्फ़ कुछ पिघलने लगी है,
मौन हैं स्वर परन्तु लहर,
संगीत की बहने लगी है,

आकाश में सजी हुई है,
रक्तिम सूरज की बिंदिया,
झिलमिल जल की धारा है,
धरा रोशनी में नहाने लगी है,

स्वागत करो इस नयी प्रभा का,
इतिहास नया लिखने लगी है।