Tuesday, December 1, 2015

(20) "पर्णपाती वन"

ओ पर्णपाती वन, 
क्या कहें तुम पर कविता,
कैसे करें गुणगान,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

देखकर लगता है तुम हो,
निष्ठुर,नीरस,
निर्भय, निर्द्वंध,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

सहना है तुमको,
सघन शीत औ हिमपात,
शेष है जीवन सुप्त,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

क्यों है प्रतीक्षा तुमको,
भंगुर है जीवन,
अनवरत है चक्र,
होते हो तैयार,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

तुम ही हो जीवनसार,
स्वयं में समाहित,
कण-कण में गर्भित,
समानुकूल प्रस्फुटित,
ओ पर्णपाती वन,
तुम ही हो मर्म।

No comments:

Post a Comment