ओ पर्णपाती वन,
क्या कहें तुम पर कविता,
कैसे करें गुणगान,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
देखकर लगता है तुम हो,
निष्ठुर,नीरस,
निर्भय, निर्द्वंध,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
सहना है तुमको,
सघन शीत औ हिमपात,
शेष है जीवन सुप्त,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
क्यों है प्रतीक्षा तुमको,
भंगुर है जीवन,
अनवरत है चक्र,
होते हो तैयार,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
तुम ही हो जीवनसार,
स्वयं में समाहित,
कण-कण में गर्भित,
समानुकूल प्रस्फुटित,
ओ पर्णपाती वन,
तुम ही हो मर्म।
क्या कहें तुम पर कविता,
कैसे करें गुणगान,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
देखकर लगता है तुम हो,
निष्ठुर,नीरस,
निर्भय, निर्द्वंध,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
सहना है तुमको,
सघन शीत औ हिमपात,
शेष है जीवन सुप्त,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
क्यों है प्रतीक्षा तुमको,
भंगुर है जीवन,
अनवरत है चक्र,
होते हो तैयार,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,
तुम ही हो जीवनसार,
स्वयं में समाहित,
कण-कण में गर्भित,
समानुकूल प्रस्फुटित,
ओ पर्णपाती वन,
तुम ही हो मर्म।
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