Tuesday, December 22, 2015

(24) "अलख"

कितने ख़्वाब ग़ुमशुदा होंगे,
हसरतें कितनी खोई होंगी,
दिन कितने बोझिल होंगे,
कितनी रातें तुम रोयी होंगी,

ज़ख़्म अभी भी ताज़ा होंगे,
यादें कितनी न बासी होंगी,
मन कितनों के भारी होंगे,
कितनी रातें न सोयी होंगी,

औरत को इज़्ज़त न दे पायेंगे,
कैसे हिन्दुस्तानी कहलायेंगे,
न्याय समय पर नहीं हुआ,
फ़िर कैसी ये परिपाटी होगी,

प्रण लेकर ही बनाना होगा,
ऐसा समाज अब रचाना होगा,
हर लड़की दुर्गा का रूप बने,
अब हमें ही अलख जगानी होगी।

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