Tuesday, December 8, 2015

भारत के शहरों में प्रदूषण

प्रदूषण आज के शहरी जीवन की सच्चाई है। क्या आपने कभी गंभीरता से सोचा है कि हम इस भयावह सच्चाई तक कैसे आ गये? (यह लेख भारत के शहरों के सन्दर्भ में है)।
भारतीय होने के नाते हम सब जानते हैं कि हमारे दैनिक जीवन में, हमारे खान-पान, रहन-सहन, भाषा-व्यवहार आदि में प्रतीकों का कितना अधिक महत्त्व है। आधुनिकता की अंधी-दौड़ हमें कहाँ ले आयी है। क्या आपको लगता नहीं कि यही सही समय है, जब कुछ पल ठहरकर दिशा निर्धारित की जाये?
भारतीय होने के नाते हमने, बरगद-पीपल पूजे (इनके औषधीय गुणों की छानबीन कीजिये, आप अवश्य सहमत हो जायेंगे कि इन्हें पूजना ही चाहिये), नाग को हमने देवता माना (नाग-पँचमी का त्योहार मनाया ताकि अकारण इनका वध न हो), भगवान शंकर के गले में सर्प, शीश पर चंद्र, और जटाओं में गँगा की अवधारणा की, (इन्हें पूजनीय बनाया ताकि हम इनके महत्व को सदैव याद रखें), खेतों पर हल चलाने से पहले उसकी पूजा की, घर बनाने से पहले "भूमि-पूजन" किया। गज (हाथी), वानर (बंदर), मूषक (चूहा), उलूक (उल्लू), मयूर (मोर), वाराह, मत्स्य, क्या-क्या गिनेंगे, हमने इन्हें प्रतीक बनाया ताकि हमें याद रहे। कमल-नारियल आदि वनस्पतियाँ भी हमारे प्रतीकों में सम्मिलित रहे। कभी आपने वास्तव में सोचा है कि ये प्रतीक, अंधविश्वास के प्रतीक न होकर हमारी पर्यावरण के प्रति जागरूकता को इंगित करते हैं।
आज भी हमें कहा जाता है कि सोकर उठने पर धरती पर पैर रखने से पहले, धरती माँ की चरण-वंदना करनी चाहिये, यह हमारी कृतज्ञता का द्योतक है या अंधविश्वास है, यह निर्णय आप स्वयं करें।
सुबह सबसे पहले अपने दोनों हाथों की हथेलियों को प्रणाम करना क्या इस बात का द्योतक नहीं कि हम कर्म-प्रधान सभ्यता हैं?
आज भी नदी में स्नान करने जाने पर नदी के जल को स्पर्श करके नदी को प्रणाम करते हैं, क्या हमें नदी का कृतज्ञ नहीं होना चाहिये?
यदि हम इस वैज्ञानिक सोच वाली संस्कृति के अंग हैं तो क्या कारण है कि आज भारत के शहर रो रहे हैं? भूमि (कचरा), वायु (धुँआ-धूल, कीटाणु), जल (विषाणु, केमिकल वेस्ट), भोजन (हर चीज़ में मिलावट), आकाश (अनेक प्रकार की तरंगें), जिन 5 तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है, हर उस तत्व को हम सब ने मिलकर प्रदूषित कर दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारा "लालची स्वभाव" है। अभी हम एक विकासशील देश हैं, अभी हमारी जेबें इतनी नहीं भरी हैं कि हम हर स्तरीय वस्तु का उपभोग कर सकें, फलस्वरूप, हमारे देश में हर वस्तु " सेकंड या थर्ड ग्रेड" की ही आती है, फिर चाहें वो "टेक्नोलॉजी" हो, " केमिकल" हों, "इलेक्ट्रॉनिक" या "कॉस्मेटिक"।
स्तरीय चीज़ों को पाने के लिये हमारे प्रयास अभी भी नहीं हैं।क्या आपको लगता है कि आयातित चीज़ों पर भरोसा किया जाना चाहिये? क्या आप जो गाड़ियाँ चला रहे हैं उनके फ़िल्टर हानिकारक तत्वों को हवा में, और बाद में आपकी साँस में जाने से रोक रहे हैं?
आँखें खोलिये, देखिये अपने चारों ओर, कहीं ऐसा न हो कि कल आपका बच्चा आपसे सवाल करे और कहे कि सारी गंदगी तुमने ही विरासत में दी है मुझे।

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