सोलह साल की कच्ची उम्र और प्रेम का पहला अहसास होने के बाद सुनैना के लिये दुनिया इससे हसीन कैसे हो सकती थी?
सावली रंगत वाली इस लड़की की बोली-भाषा इतनी मीठी कि कोई भी फ़िदा हो जाये। स्कूल जाने और शहर के अच्छे घरों की लड़कियों के साथ उठने-बैठने से अपनी ग़रीबी का उसे ज़रा भी भान न रहा था। हर लड़की की तरह सजने-संवरने और ढ़ंग से पहनने-ओढ़ने की तरफ़ उसका ख़ास रुझान था।
ग़रीबी तो हर किसी का मज़ाक उड़ाने का अधिकार लेकर ही आती हो जैसे, प्रेम भी इससे अछूता कैसे रह सकता है। अब सुनैना की ज़िन्दगी का मक़सद मनचाही शादी करके घर बसाना ही था बस। लेकिन, घर की बड़ी लड़की होने से और आर्थिक तंगी होने के कारण उसके माता-पिता ने उसे बेबी-सिटिंग के काम के लिये मेरे यहाँ काम पर लगा रखा था। अनुभवी होने के कारण इतना समझने में मुझे देर न लगी कि सुनैना को बच्चे पसंद हैं, मेरे बेटे के साथ जल्दी ही उसकी दोस्ती हो गयी। मैं उससे कहती कि तुम्हें अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिये, स्कूल से वापस आकर तुम बेबी-सिटिंग कर सकती हो, तुम्हारे स्कूल की फ़ीस भी मैं दे दूँगी। लेकिन अब सुनैना का मन पढ़ाई में नहीं था। उसने पढ़ाई को लेकर बिल्कुल भी उत्साह नहीं दिखाया। ख़ैर, जिंदगी चल पड़ी।
कुछ दिन बाद मुझे जानकारी हुई कि सुनैना मेहँदी की बहुत सुंदर डिज़ाइन बना लेती है। आर्ट और क्राफ़्ट में उसे बहुत रुचि है, बहुत सलीक़े से बना सकती है। मैंने उसे एक ड्रॉइंग कॉपी और मेहँदी की डिज़ाइन वाली क़िताबें उपलब्द्ध करा दीं। अब, उसका बेबी-सिटिंग का समय बोरिंग नहीं था, सुनैना और मेरा बेटा मिलकर ड्रॉइंग, कलरिंग, पेंटिंग, क्राफ़्ट आदि किया करते। शाम होने तक मैं घर आ जाती और उनके बनाये सामानों की तारीफ़ें किया करती। धीरे-धीरे उसे मुझ पर विश्वास हो गया कि मैं वास्तव में उसका भला ही चाहती हूँ।
एक दिन मेरी एक सहृदय पड़ोसन का फ़ोन आया कि आपका बेटा स्कूल से घर आ गया है, लेकिन सुनैना काम पर नहीं आयी है। उसका पता लगाने के बाद पता चला कि कुछ समस्या आ गयी है, अगले दिन भी वह काम पर नहीं आयी। उसके बजाये उसकी माँ आयी और रोते-रोते उसने अपनी आप बीती मुझे कह सुनाई। सुनैना ने हाथ की नस काटकर आत्महत्या करने का प्रयास किया है, डॉक्टर को दिखाकर पट्टी करा दी है, अब शायद ही वह काम पर आये। कारण पूछने पर पता चला कि, रिश्ते के एक लड़के से उसे प्रेम हो गया है और उसी से शादी करना चाहती है। हम अभी इस कम उम्र में उसकी शादी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन प्यार ने उसे अँधा बना दिया है, हम सब उसे दुश्मन नज़र आते हैं। मैंने कहा, उसे मेरे पास भेजना, मैं उससे बात करूँगी, और उसे ये मत कहना कि तुमने मुझे उसकी सारी बातें बता दी हैं, मैं उसके मुँह से ही सुनना चाहती हूँ, वो क्या कहती है, क्या सोचती है। दो-चार दिन बाद शाम को सुनैना हाथ में पट्टी बाँधे मेरे पास आयी। मैंने उसे बैठने का इशारा किया और चाय पीते-पीते पूछा (सुनैना चाय नहीं पीती थी), बेटा ये चोट कैसे लगी? उसने झूठ बोलने की कोशिश की, तो मैंने पूछा, सुनैना, क्या तुम सच में उस लड़के से इतना प्यार करती हो कि अपनी जान भी दे सकती हो? वह सिर झुकाए बैठी रही। मैंने दूसरा प्रश्न किया, क्या वह लड़का तुमसे शादी करना चाहता है? उसने हाँ में सिर हिलाकर जवाब दिया। क्या तुम कुछ दिन इंतज़ार कर सकती हो, ताकि कुछ पैसे जोड़ सको? वह चुप रही। हम्म, अच्छा, क्या तुम सिर्फ़ कुछ दिन रुक सकती हो जबतक मैं दूसरी बेबी-सिटर ढूँढ़ लूँ? उसने हाँ में सिर हिलाया। अच्छा तब ठीक है, मैं तुम्हारी माँ से बात करूँगी।
ज़रा इधर आना मेरे पास, मैंने उसे पास बुलाया। उसका चेहरा हाथों में लेकर कहा, वादा करो कि ज़िन्दगी में ऐसी बेवकूफ़ी की हरक़त फ़िर कभी नहीं करोगी, तुम मुझे बहुत प्यारी हो। प्यार से पिघल गयी सुनैना, मेरे गले लगकर बोली, नहीं दीदी अब कभी नहीं, ऐसा कभी सोचूँगी भी नहीं।
अगले दिन उसकी माँ को बुलाकर बात करनी पड़ी, कि कुछ दिन तो रुक गयी है लड़की लेकिन अब इसकी शादी का इंतज़ाम करो।
वाक़ई कच्ची उम्र का हो या किसी भी उम्र का, यह प्यार, आकर्षण या जो भी आप इसे कहें, इसी तरह दिमाग़ पर असर करता है, आप पढेलिखे हों या अनपढ़-गंवार प्रेम के आकर्षण के विज्ञान को समझना अत्यंत कठिन है। यदि आप समझते हैं कि कोई भी किसी दूसरे के अनुभव से सीख सकता है तो आप ग़लती पर हैं। यह एक ऐसा अनुभव है जिससे हर कोई गुज़रना चाहता है। मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि आगे आने वाले समय का न ही पूर्वानुमान लगा सकता है न ही इतना आगे का सोच सकता है। सुनैना भी कोई अपवाद न थी।
आख़िर सत्रह साल की उम्र में सुनैना की शादी हो गयी। सुनैना को जैसे जीवन की सारी खुशियाँ मिल गयीं, मनचाहा जीवनसाथी मिल गया, मनपसंद ढंग से शादी हो गयी, प्यार सफ़ल हो गया। लेकिन, क्या वाक़ई यही सच था, शायद नहीं।
इस बीच हम शहर छोड़ कर दूसरे शहर में बस गये थे, सुनैना के फ़ोन आते रहते, हम सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो चुके थे।
शादी के छः महीने गुज़रते ही सुनैना का पहला गर्भपात हुआ। सुनैना को देखकर कोई भी बता सकता था कि सेहत के साथ खिलवाड़ हो गया है। ख़ैर, ज़िन्दगी फ़िर आगे बढ़ी, साल बीतते फ़िर से गर्भवती सुनैना को एक बेटी हुई। एक साल और बीतते ही एक और बेटी हुई। इक्कीस साल से भी कम उम्र में सुनैना दो बेटियों की माँ थी और एक बेरोज़गार पति की पत्नी थी। प्रेम!!! प्रेम क्या होता है, क्या यही प्रेम होता है, ख़ुद से सुनैना यह सवाल करने लगी थी।
बहुत दिनों के बाद एक दिन के लिये मेरा शहर आना हुआ और सुनैना ने मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की। उसकी राम कहानी सुनने के बाद मैंने पूछा, सुनैना अब क्या इरादा है, आगे ज़िन्दगी कैसे काटोगी? क्या पति कुछ काम-धाम करना चाहता है या नहीं? सुनैना बोली, दीदी जी, ड्राइवरी कर लेते हैं पर गाँव में काम मिलता नहीं, समझ में नहीं आता क्या करें। मैंने सुनैना को याद दिलाया कि तुम मेहंदी की बड़ी अच्छी डिज़ाइन बनाती थीं, याद है या भूल गयी? याद है दीदी जी, लेकिन अब समय ही नहीं मिलता, दिनभर तो घर के काम में बीत जाता है। लेकिन, इतना कहते ही सुनैना को जैसे राह मिल गयी। जल्दी से सामान समेट जाने को हुई, मैंने पूछा, कहाँ, इतनी जल्दी? नहीं, दीदी जी, अब रुक गयी तो बड़ी देर हो जायेगी। आपसे दो साल बाद मिलूँगी, यहीं इसी शहर में, आप मिलेंगी ना? हाँ, हाँ, क्यों नहीं, न जाने क्यों इस साहसी, आत्मविश्वासी लड़की को देख मेरे चहरे पर एक मुस्कान तैर गयी।
दो साल बाद, मैं "सुनैना ब्यूटी पार्लर" में सुनैना से बातें कर रही थी। कैसी हो सुनैना? दीदी जी, हम सब बहुत ख़ुश, बहुत मजे में हैं। मेरी बड़ी बेटी अब स्कूल जाती है, यहीं घर के पास में है, छोटी को घर पर सास सम्हाल लेती हैं, पति ने एक ऑटो ले लिया है, अपना ऑटो चलाते हैं। मैंने पूछा, सुनैना और बच्चे? कभी नहीं दीदी जी, अब कभी नहीं। हा हा हा। बेटा नहीं चाहिये तुम्हें? सुनैना मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दी।