एक गीत की पंक्तियाँ याद आ गयीं,
"जो मैं ऐसा जानती, कि प्रीत किये दुःख होए,
नगर ढिंढोरा पीटती, कि प्रीत न करियो कोए..."
बहुत दिनों से सोच रही थी कि क्या लिखूँ प्रेम के बारे में, जितने लोग उतनी बातें, उतनी तरह से। हर कोई प्रेम को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है।
किसी के लिये प्रेम तपस्या है,
किसी के लिए सारे जीवन की साधना,
किसी के लिये जीवन का सार है,
किसी के लिये जीने का आधार है,
किसी के लिये समर्पण,
किसी के लिये सर्वस्व त्याग है।
न जाने कितने कवि, कितने साहित्यकार प्रेम को परिभाषित कर-कर के सिधार गये, पर ये आज भी एक जटिल पहेली बना हुआ है। नयी पीढ़ी भी इसे उन्हीं पुराने प्रतीकों के माध्यम से परिभाषित करना चाहती है, इसका अर्थ ये लिया जा सकता है कि प्रतीक शाश्वत हैं अतः प्रेम भी शाश्वत ही होगा, यानी कि ये दुनिया कभी प्रेम से खाली न होगी, प्रेम सदा विजयी होगा।
"जो मैं ऐसा जानती, कि प्रीत किये दुःख होए,
नगर ढिंढोरा पीटती, कि प्रीत न करियो कोए..."
बहुत दिनों से सोच रही थी कि क्या लिखूँ प्रेम के बारे में, जितने लोग उतनी बातें, उतनी तरह से। हर कोई प्रेम को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है।
किसी के लिये प्रेम तपस्या है,
किसी के लिए सारे जीवन की साधना,
किसी के लिये जीवन का सार है,
किसी के लिये जीने का आधार है,
किसी के लिये समर्पण,
किसी के लिये सर्वस्व त्याग है।
न जाने कितने कवि, कितने साहित्यकार प्रेम को परिभाषित कर-कर के सिधार गये, पर ये आज भी एक जटिल पहेली बना हुआ है। नयी पीढ़ी भी इसे उन्हीं पुराने प्रतीकों के माध्यम से परिभाषित करना चाहती है, इसका अर्थ ये लिया जा सकता है कि प्रतीक शाश्वत हैं अतः प्रेम भी शाश्वत ही होगा, यानी कि ये दुनिया कभी प्रेम से खाली न होगी, प्रेम सदा विजयी होगा।
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