प्रेम के बारे में अक्सर लोग भ्रान्ति का शिकार होते हैं।
कुछ लोग हीन भावना से ग्रस्त होते हैं और अक्सर यह कहते पाये जाते हैं कि मुझसे कौन प्यार करेगा, मुझसे कोई क्यूँ प्यार करेगा, मुझमें ऐसा क्या है कि कोई प्यार करे। ऐसे लोगों को कभी अपने रूप-रंग पर शक़ होता है, कभी अपनी योग्यता पर, और प्यार किये जाने को एहसान तक मान लेते हैं।
वो गाना सुना है ना "मैंने प्यार किया" का..
"तुम मान इतना जो दे रहे हो, मुझ पे ये एहसान है"
गीत के ये बोल कहाँ से आ गये...कहीं न कहीं हीन भावना समाज में व्याप्त है, जिसका लोग अलग़-अलग़ तरह से फ़ायदा उठाते हैं। ऐसे लोगों को प्यार मिल जाता है तो वो अभिभूत हो जाते हैं।
अब दूसरी तरह के लोगों की बात करते हैं, जो ये समझते हैं कि प्यार उनका अधिकार है। ऐसे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं क्योंकि बचपन से उन्हें माता-पिता, अध्यापकों, परिजनों और मित्र-सखाओं का स्नेह व प्यार मिलता रहता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में बड़े होने पर वह हमेशा समझते हैं कि यह परिवेश सदा बना रहेगा, पर ऐसा होता नहीं है। पहला झटका ही काफ़ी होता है इनके लिये। छोटी सी भी अस्वीकार्यता उनसे सहन नहीं होती है।
इन दोनों ही स्थितियों में एक बात समान है, दोनों ही प्रकार के लोग स्वयं की प्रेम करने की क्षमता से अनभिज्ञ होते हैं। हीनभावना से ग्रस्त लोग यह नहीं जानते कि वो प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं, बशर्ते कि वो अपनी इस क्षमता से परिचित हों। अहंकार से ग्रस्त लोग हमेशा समझते हैं कि प्रेम उन्हें हमेशा प्रदत्त होगा, वो कभी जान ही नहीं पाते हैं कि वो स्वयं किस सीमा तक प्रेम कर सकते हैं। दोनों ही बेचारे ग़रीब होते हैं, कभी-कभी ऐसे ही इस जीवन को त्याग चले भी जाते हैं।
कुछ लोग हीन भावना से ग्रस्त होते हैं और अक्सर यह कहते पाये जाते हैं कि मुझसे कौन प्यार करेगा, मुझसे कोई क्यूँ प्यार करेगा, मुझमें ऐसा क्या है कि कोई प्यार करे। ऐसे लोगों को कभी अपने रूप-रंग पर शक़ होता है, कभी अपनी योग्यता पर, और प्यार किये जाने को एहसान तक मान लेते हैं।
वो गाना सुना है ना "मैंने प्यार किया" का..
"तुम मान इतना जो दे रहे हो, मुझ पे ये एहसान है"
गीत के ये बोल कहाँ से आ गये...कहीं न कहीं हीन भावना समाज में व्याप्त है, जिसका लोग अलग़-अलग़ तरह से फ़ायदा उठाते हैं। ऐसे लोगों को प्यार मिल जाता है तो वो अभिभूत हो जाते हैं।
अब दूसरी तरह के लोगों की बात करते हैं, जो ये समझते हैं कि प्यार उनका अधिकार है। ऐसे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं क्योंकि बचपन से उन्हें माता-पिता, अध्यापकों, परिजनों और मित्र-सखाओं का स्नेह व प्यार मिलता रहता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में बड़े होने पर वह हमेशा समझते हैं कि यह परिवेश सदा बना रहेगा, पर ऐसा होता नहीं है। पहला झटका ही काफ़ी होता है इनके लिये। छोटी सी भी अस्वीकार्यता उनसे सहन नहीं होती है।
इन दोनों ही स्थितियों में एक बात समान है, दोनों ही प्रकार के लोग स्वयं की प्रेम करने की क्षमता से अनभिज्ञ होते हैं। हीनभावना से ग्रस्त लोग यह नहीं जानते कि वो प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं, बशर्ते कि वो अपनी इस क्षमता से परिचित हों। अहंकार से ग्रस्त लोग हमेशा समझते हैं कि प्रेम उन्हें हमेशा प्रदत्त होगा, वो कभी जान ही नहीं पाते हैं कि वो स्वयं किस सीमा तक प्रेम कर सकते हैं। दोनों ही बेचारे ग़रीब होते हैं, कभी-कभी ऐसे ही इस जीवन को त्याग चले भी जाते हैं।
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