Wednesday, February 10, 2016

"प्रेम के बारे में" (2)

परस्पर निर्भरता ही संबंधों का आधार है। प्रेम का इस आदान-प्रदान में कोई योगदान नहीं है। (Relations are purely based on give and take, name any relation existing, existed, will exists).
यदि आप स्वतंत्र जीवन जीने के आदी हैं और स्वतंत्र जीवन ही जीना चाहते हैं तब आपको विवाह जैसे किसी बंधन में नहीं बंधना चाहिये।
हाल ही में एक मूवी देखी, "तमाशा", उसकी कहानी में भी नायक-नायिका यही सोच रखते थे। दोनों आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर थे, स्वतंत्र थे, फ़िर वो एक-दूसरे के साथ सम्बंध में भी बंध जाते हैं, लेकिन प्यार तो होता ही नहीं है, या यूँ कहें कि प्यार होता है पर देख नहीं पाते। अपनी-अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीने लगते हैं पर ख़ुश नहीं हैं।
कहाँ है ख़ुशी?
प्यार में है जीवन की ख़ुशी।
अब ये प्यार क्या बला है?
प्यार वो स्वतंत्रता है जो आप ख़ुद के लिये नहीं अपने साथी के लिये तलाशते हैं, और आपका साथी जानता/जानती है कि आप उस पर और उसकी ख़ुद की खोज पर विश्वास करते हैं। जब दोनों एक-दूसरे के लिये यह तलाश करते हैं तब प्यार प्रकट होता है। हो सकता है इस क्रम में आप सबकुछ खो दें।यही प्यार में सबसे बड़ा भय है, खो देने का भय, कभी-कभी ख़ुद को भी और साथी को भी।
"इक आग़ का दरिया है, और डूब के जाना है"

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