Monday, February 29, 2016

"जीवन की गति"

अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइये और आप पायेंगे कि जीवन की एक विशेष गति होती है। हर शहर, हर गाँव, हर देश की एक ख़ास गति। हम उस प्रवाह से अलग़ नहीं हैं। क्योंकि हम उस प्रवाह से अलग़ नहीं हैं, अतः जिस समय, स्थान और काल में हम उपस्थित हैं वहाँ हमारी अनुपस्थिति से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है। जो लोग आज आपके जीवन में हैं, जब वे नहीं थे तब भी आपका जीवन चल रहा था, जब वे नहीं होंगे तब भी आपका जीवन (यदि बाकी है तो) चलेगा। यही बात दूसरों पर भी लागू होती है, आप नहीं होंगे तब भी जीवन चलेगा, अपनी विशेष गति से। आपके पास अपने कर्मों का निर्वाह करते चले जाने के अतिरिक्त विशेष कोई अधिकार नहीं है। जो व्यक्ति इस सत्य से साक्षात्कार कर लेते हैं उनके लिये जीवन थोड़ा आसान हो जाता है।
अपने किये गये कर्मों पर भरोसा रखिये, प्रतिफल अवश्यम्भावी है, न रत्तीभर भी कम न ज़्यादा। धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा कीजिये।

Friday, February 26, 2016

(27) "औरतें"

बहुत-बहुत दिनों के बाद मिल पाती हैं औरतें,
घरभर के काम-काज में उलझी रहती हैं औरतें,

प्रेम का हक़ भले न हो कर्तव्य पर निभाती हैं औरतें,
जाने क्या बँधन होता है जिसे हर हाल संवारती हैं औरतें,

आजकल दिल अपना कम ही खोलती हैं औरतें,
आँखों ही आँखों में बहुत कुछ कह जाती हैं औरतें,

बेटियों को गणित और विज्ञान में उलझाती हैं औरतें,
अपने सपनों को बच्चों की आँखों में सजाती हैं औरतें,

कितना कुछ सहती हैं फ़िर भी कम कहती हैं औरतें,
दिल में ज़ब्त करके बहुत मुस्कान बिखेरती हैं औरतें,

कभी वामपंथ तो कभी दक्षिणपंथ को गरियाती हैं औरतें,
अपने हालात में रत्तीभर भी बदलाव न कर पाती हैं औरतें,

कभी साड़ी-लहँगे, कभी जीन्स में टिकाई जाती हैं औरतें,
वक़्त, माहौल, देश, धर्म के अनुसार बदलाई जाती हैं औरतें,

कभी मोहरा, कभी देवी, कभी वेश्या बना दी जाती हैं औरतें,
सह-देख-सुन कर, तमाशा दुनिया का, चली जाती हैं औरतें।

(26) "गुंजाइश"

रिश्तों में भरम बना रहने दे,
ज़रा सी गुंजाइश बनी रहने दे,

रस्ते तो सबके कट ही जायेंगे,
ज़रा ये विश्वास बना रहने दे,

मन का मिलना न मिलना सही,
दुआ-सलाम तो ज़ारी रहने दे,

ज़िन्दगी पूछेगी सवाल आख़री,
कुछ बदी नेकी में तब्दील होने दे,

सब हैं परिंदे परदेशी, पर न क़तर,
आज यहाँ और कल वहाँ उड़ने दे,

पानी का बुलबुला है ज़िन्दगी,
कुछ अपन सुना, कुछ मुझे कहने दे।

Tuesday, February 23, 2016

"प्रेम के बारे में" (4)

प्रेम और उसका प्रदर्शन....
प्रश्न उठता है कई बार, कई-कई बार, कि क्या "प्रेम में प्रदर्शन" आवश्यक है? क्या "प्रेम का प्रदर्शन" आवश्यक है?
हाँ, आवश्यक है।
प्रेम का प्रदर्शन आवश्यक है, उससे, जिससे प्रेम है। प्रेम का प्रदर्शन दुनिया के लिये क्यूँ हो? दुनिया को क्या मतलब कि आप प्रेम में हैं या नहीं? यदि आप प्रेम में हैं तब तो यह स्वतः प्रकट है, प्रेम में होने के भौंडे प्रदर्शन की आवश्यकता क्या है?
क्या आप नहीं चाहते कि जो आपसे प्रेम करे वो जता भी दे।
कई बार लोग कहते पाये जाते हैं कि हम कोई "माइंड रीडर" थोड़े ही हैं जो बिना कहे समझ जायें। सही भी है, बिना कहे कोई कैसे जाने।
आमतौर पर कहा जाता है कि पहेलियाँ बुझाना अधिक लोगों को पसंद नहीं होता, जो बात है वो सीधे तौर पर कही जानी चाहिये, है कि नहीं!!!
लेकिन प्रेम का मामला तो बड़ा टेढ़ा है, सीधे कैसे कह दिया जाये, समझने की बात है, अब समझा कैसे जाये। बहुत चक्कर है।
प्रेम के सार्वजनिक प्रदर्शन का जग दीवाना हुआ लगता है, अतः प्रेम में होना आवश्यक नहीं रह गया, उसका प्रदर्शन ही आवश्यक है शायद।

"प्रेम के बारे में" (3)

प्रेम के बारे में अक्सर लोग भ्रान्ति का शिकार होते हैं।

कुछ लोग हीन भावना से ग्रस्त होते हैं और अक्सर यह कहते पाये जाते हैं कि मुझसे कौन प्यार करेगा, मुझसे कोई क्यूँ प्यार करेगा, मुझमें ऐसा क्या है कि कोई प्यार करे। ऐसे लोगों को कभी अपने रूप-रंग पर शक़ होता है, कभी अपनी योग्यता पर, और प्यार किये जाने को एहसान तक मान लेते हैं।
वो गाना सुना है ना "मैंने प्यार किया" का..
"तुम मान इतना जो दे रहे हो, मुझ पे ये एहसान है"
गीत के ये बोल कहाँ से आ गये...कहीं न कहीं हीन भावना समाज में व्याप्त है, जिसका लोग अलग़-अलग़ तरह से फ़ायदा उठाते हैं। ऐसे लोगों को प्यार मिल जाता है तो वो अभिभूत हो जाते हैं।

अब दूसरी तरह के लोगों की बात करते हैं, जो ये समझते हैं कि प्यार उनका अधिकार है। ऐसे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं क्योंकि बचपन से उन्हें माता-पिता, अध्यापकों, परिजनों और मित्र-सखाओं का स्नेह व प्यार मिलता रहता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में बड़े होने पर वह हमेशा समझते हैं कि यह परिवेश सदा बना रहेगा, पर ऐसा होता नहीं है। पहला झटका ही काफ़ी होता है इनके लिये। छोटी सी भी अस्वीकार्यता उनसे सहन नहीं होती है।

इन दोनों ही स्थितियों में एक बात समान है, दोनों ही प्रकार के लोग स्वयं की प्रेम करने की क्षमता से अनभिज्ञ होते हैं। हीनभावना से ग्रस्त लोग यह नहीं जानते कि वो प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं, बशर्ते कि वो अपनी इस क्षमता से परिचित हों। अहंकार से ग्रस्त लोग हमेशा समझते हैं कि प्रेम उन्हें हमेशा प्रदत्त होगा, वो कभी जान ही नहीं पाते हैं कि वो स्वयं किस सीमा तक प्रेम कर सकते हैं। दोनों ही बेचारे ग़रीब होते हैं, कभी-कभी ऐसे ही इस जीवन को त्याग चले भी जाते हैं।

"भारत की सेना और मेरी भावनायें" (संस्मरण)

1996-97 की बात है, उन दिनों अख़बारों में भारतीय वायु सेना में भर्ती के लिये एक विज्ञापन निकला करता था, "क्या आप में है वो बात? (ऐसा ही कुछ)"। "ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर्स" के लिये अविवाहित युवक/युवतियों से आवेदन माँगे गये थे। ग्रेजुएशन में गणित/भौतिकी/रसायन आदि विषयों के प्राप्तांकों के आधार पर चयन के लिये बुलावा पत्र आ सकता था। मैंने भी अप्लाई करने का निर्णय लिया, बुलावे के आ जाने जैसी कोई उम्मीद नहीं थी। आवेदन करने के लिये कोई फ़ीस भी नहीं माँगी गयी थी। आवेदन सादे कागज़ पर हाथ से बनाकर या टाइप्ड प्रति में किया जा सकता था। मैंने एक A4 साइज़ के कागज़ पर हाथ से कॉलम etc. बनाकर आवेदन कर दिया, बस अपने गणित के प्राप्तांकों का भरोसा था जोकि मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा थे, बस यही एक तिनका था। तब मेरा व्यक्तित्व बहुत ही अंतर्मुखी किस्म का था, NCC जैसा भी कभी कुछ किया नहीं था, स्कूल में ज़रूर "स्काउट/गाइड" का थोड़ा प्रशिक्षण मिला था।
ख़ैर आवेदन-पत्र भेज दिया।
उम्मीद के विपरीत बुलावा आ गया, देहरादून के 1AFSB से। आने-जाने का स्लीपर क्लास का किराया और रहने-खाने का इंतज़ाम, यहाँ तक कि रेलवे स्टेशन से सेंटर तक लाने-छोड़ने का भी इन्तज़ाम।
मैं बार-बार बुलावा-पत्र को देखती और इतना खुश होती कि जैसे कोई लॉटरी लग गयी हो।
अब समस्या ये कि मैं परीक्षा देने जाऊँ कैसे?
लेकिन, ज़िद्द थी कि जाना है। वाक़ई, आज मुझे बिल्कुल भी अफ़सोस नहीं है उस दिन के ज़िद्दीपने का। यदि मैं ना गयी होती तो, मैं मेरे आज के अपने होने को सिद्ध न कर पाती। उस परीक्षा ने मेरी आँखें खोल दीं।
मम्मी-पापा को मनाया और देहरादून की यात्रा पर अकेले निकल पड़ी (बाद में कितनी यात्रायें अकेले कीं, पर यह ख़ास है)। एक लड़की जो कभी शहर से बाहर भी अकेले न गयी हो, जिसकी ज़िन्दगी क़िताबों से माथापच्ची में बीती हो, घर के सुरक्षित वातावरण से निकल कर अकेले यात्रा करना उसके लिये सज़ा से कम नहीं था। लेकिन क़माल का विश्वास था मम्मी-पापा को मुझपर, क्यों, ये तो मैं भी नहीं जानती। मम्मी ने कुछ हिदायतें दे कर मेरा हौसला बढ़ा दिया था, और मैं उनसे कह रही थी कि देखना, कल की लौटती गाड़ी से ही वापस आ जाऊँगी।
देहरादून में सब उसी प्रकार हुआ जैसा पत्र में बताया गया था। पूरे भारत से 72 लडकियों को बुलाया गया था, ये था मेरा भारत के हर प्रांत की लड़की से मिलने का पहला अनुभव। हमें रहने आदि के नियम-क़ायदे बता दिये गये। हमें "चेस्ट नंबर" दे दिये गये, अब नंबर ही हमारी पहचान थे, शाम को घर पर फ़ोन करके सूचना देने की अनुमति दी गयी, रात 10:00 बजे के बाद जागने की सख़्त मनाही थी, सुबह नाश्ता वग़ैरह कर के 7:00 बजे रिपोर्ट करना था। दूसरे दिन सुबह ही लोगों का एक "स्क्रीन टेस्ट" हुआ। स्क्रीन टेस्ट में कुछ साइकोलॉजी के टेस्ट, कुछ रीजनिंग इत्यादि के प्रश्न थे।
टेस्ट के बाद हम सबको फ़िर से इकठ्ठा किया गया। अब एनाउन्समेंट होनी थी कि कितने लोगों को आगे के टेस्ट के लिये रुकना है और कितने लोग घर वापस जायेंगे। अभी तक कानपुर की तीन लड़कियाँ थीं।
एनाउंसमेंट हो गयी और मुझे रोक लिया गया। मन बल्लियों उछलने लगा, एक बार फ़िर फ़तह हो गयी थी।
आगे की परीक्षा में तरह-तरह के टेस्ट थे, जैसे कि, सोलो टॉक, ग्रुप डिस्कशन, ग्रुप टास्क, फिजिकल टास्क (सोलो), फिजिकल टास्क (ग्रुप), केस स्टडी एंड स्ट्रेटेजी बिल्डिंग, साइकोलॉजी टेस्ट और पर्सनल इंटरव्यू। मेरे सामने भाषा (अँग्रेज़ी) की समस्या और तैयारी की कमी दोनों ही थीं। वहाँ जिन 32 लड़कियों को रोका गया था, सब एक से बढ़कर एक थीं, मुझसे कहीं ज़्यादा इंफॉर्मड थीं, मैं कच्ची खिलाड़ी थी। 4 दिन बाद मुझे भी घर जाने के लिये बोल दिया गया।
उस दिन के बाद से अँग्रेज़ी भाषा को काबू करना मेरा पहला लक्ष्य हो गया था, ये कहना ग़लत न होगा कि इस एक अकेली परीक्षा ने जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोण को एक पैराडाइम शिफ़्ट दे दिया था, अब मुझे ये पता चल गया था कि कुछ भी पाने के लिये सिर्फ़ प्रतिभा ही काफ़ी नहीं है, लक्ष्य की दिशा में सधे हुये, सतत प्रयास भी करने होंगे।
प्रयास किये और GRE and TOEFL में जाकर ही गाड़ी रुकी।
जीवन सफ़लता और असफ़लता का मिला-जुला रूप है, आप इसे कैसे देखते हैं बस वही महत्वपूर्ण है।
(जनरल बख़्शी के रोने की ख़बर ने न सिर्फ़ मुझे रुला दिया, बल्कि यादों के उस पाले में ले जाकर खड़ा कर दिया जो देहरादून में है। ये वह समय था जब सिर्फ़ "ग्राउंड ड्यूटी" के लिये ही युवतियों के दरवाज़े खोले गये थे, अब समय बहुत बदल गया है)

Wednesday, February 10, 2016

"प्रेम के बारे में" (2)

परस्पर निर्भरता ही संबंधों का आधार है। प्रेम का इस आदान-प्रदान में कोई योगदान नहीं है। (Relations are purely based on give and take, name any relation existing, existed, will exists).
यदि आप स्वतंत्र जीवन जीने के आदी हैं और स्वतंत्र जीवन ही जीना चाहते हैं तब आपको विवाह जैसे किसी बंधन में नहीं बंधना चाहिये।
हाल ही में एक मूवी देखी, "तमाशा", उसकी कहानी में भी नायक-नायिका यही सोच रखते थे। दोनों आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर थे, स्वतंत्र थे, फ़िर वो एक-दूसरे के साथ सम्बंध में भी बंध जाते हैं, लेकिन प्यार तो होता ही नहीं है, या यूँ कहें कि प्यार होता है पर देख नहीं पाते। अपनी-अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीने लगते हैं पर ख़ुश नहीं हैं।
कहाँ है ख़ुशी?
प्यार में है जीवन की ख़ुशी।
अब ये प्यार क्या बला है?
प्यार वो स्वतंत्रता है जो आप ख़ुद के लिये नहीं अपने साथी के लिये तलाशते हैं, और आपका साथी जानता/जानती है कि आप उस पर और उसकी ख़ुद की खोज पर विश्वास करते हैं। जब दोनों एक-दूसरे के लिये यह तलाश करते हैं तब प्यार प्रकट होता है। हो सकता है इस क्रम में आप सबकुछ खो दें।यही प्यार में सबसे बड़ा भय है, खो देने का भय, कभी-कभी ख़ुद को भी और साथी को भी।
"इक आग़ का दरिया है, और डूब के जाना है"

"प्रेम के बारे में" (1)

एक गीत की पंक्तियाँ याद आ गयीं,
"जो मैं ऐसा जानती, कि प्रीत किये दुःख होए,
नगर ढिंढोरा पीटती, कि प्रीत न करियो कोए..."

बहुत दिनों से सोच रही थी कि क्या लिखूँ प्रेम के बारे में, जितने लोग उतनी बातें, उतनी तरह से। हर कोई प्रेम को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है।
किसी के लिये प्रेम तपस्या है,
किसी के लिए सारे जीवन की साधना,
किसी के लिये जीवन का सार है,
किसी के लिये जीने का आधार है,
किसी के लिये समर्पण,
किसी के लिये सर्वस्व त्याग है।
न जाने कितने कवि, कितने साहित्यकार प्रेम को परिभाषित कर-कर के सिधार गये, पर ये आज भी एक जटिल पहेली बना हुआ है। नयी पीढ़ी भी इसे उन्हीं पुराने प्रतीकों के माध्यम से परिभाषित करना चाहती है, इसका अर्थ ये लिया जा सकता है कि प्रतीक शाश्वत हैं अतः प्रेम भी शाश्वत ही होगा, यानी कि ये दुनिया कभी प्रेम से खाली न होगी, प्रेम सदा विजयी होगा।

Tuesday, February 2, 2016

"कानपुर स्मार्ट सिटी है"

कानपुर को स्मार्ट सिटीज़ की लिस्ट में नहीं चुना गया इस बात से हम सभी दुःखी भी हुये और क्रोधित भी। कुछ लोगों की प्रतिक्रियायें तो इस प्रकार लगीं जैसे किसी एग्जाम में फ़ेल हो जाने पर घर वाले बच्चे को ही डाँटने-डपटने लगते हैं कि तू है ही नालायक, तेरा कुछ हो ही नहीं सकता (मसलन, कानपुर हमेशा से ही गन्दा है, यहाँ के लोगों में सिविक सेंस नहीं है, आदि आदि)।
क्या आप भी ऐसी ही नकारात्मक सोच रखते हैं? यदि हाँ तो ज़रा ग़ौर फरमाइये:-
1. आज़ादी की लड़ाई की चिंगारी सुलगाने वाला शहर है कानपुर, ये शहर न होता तो आज हमारा संविधान न होता। अँग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद हो गये तो क्या गन्दगी और लाचारी दूर न कर सकेंगे?
2. अनेक डॉक्टर, इंजीनियर, IAS, IPS, वक़ील, शिक्षाविद, साहित्यकार, गायक, व्यापारी, उद्यमी, कानपुर से ही निकले हैं और दुनियाभर में छाये हैं। अग़र कानपुर में लाखों बुराइयाँ ही हैं तो यह कैसे संभव हुआ?
3. पूरे उत्तर प्रदेश में महिलाओं की साक्षरता का प्रतिशत भी सबसे अधिक कानपुर में ही है। ~71%, क्या शिक्षित महिलायें सहयोग न करेंगी?
किसी प्रतियोगिता में चयन हो पाना या न हो पाना कई कारणों पर निर्भर हो सकता है परंतु इसका अर्थ यह नहीं है हम सब आत्महीनता की भावना से ग्रस्त हो जायें, और ख़ुद को ही ख़री-खोटी सुनाने लगें।
यदि आपको शहर के प्रशासन व रख-रखाव में अनेक समस्यायें दिखती हैं तो कृपया स्वयं से भी पूछें कि क्या सही जगह सवाल उठाये गये हैं? यदि नहीं, तो क्या अब सवाल नहीं उठाये जाने चाहियें? ख़ुद से भी पूछिये, कितना बदला है ख़ुद को?
क्या बिना सरकारी सहायता के हम स्मार्ट नहीं हो सकते?

"सबसे बड़ा दुःख"

जानते हैं जीवन में सबसे बड़ा दुःख क्या होता है?
जीवन में सबसे बड़ा दुःख है बिछड़ना, बिछुड़ना, विछोह, बिछोह, दूरी। अपने प्रियजनों से दूरी की कल्पना मात्र से ही आप द्रवित हो उठते हैं। यहाँ तक कि कोई अपने प्रियजनों से दूर होने की बात भी आपको बताये तो आप घंटों तक रो सकते हैं, हाल ही में एक मित्र ने 10 वर्ष की आयु में हॉस्टल जाने और माँ से बिछड़ने का ज़िक्र किया और मुझे ख़ूब रुलाया, लेकिन ऐसे में ही आपको कुछ शक्तिशाली और सहनशील प्रियजन भी याद आते हैं जो अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रख सकते हैं। कैसे कर पाते हैं वो ऐसा? इसे एक उदाहरण से समझते हैं:-
जब छोटे बच्चे पहली बार स्कूल जाना शुरू करते हैं तो आपसे अलग़ होने से एहसास मात्र से ही वो रोने लगते हैं, ऐसा सिलसिला दो-चार दिन तक चलता है फ़िर सब सामान्य हो जाता है। क्यों? ऐसा इसलिये होता है कि आप जानते हैं कि आप जो कर रहे हैं उसके भले के लिये कर रहे हैं (separation anxiety), :) नहीं।
ऐसा इसलिये होता है क्योंकि आप जानते हैं कि हर व्यक्ति इस जगत में एक यात्री है, फ़िर चाहे वह आपका पुत्र या पुत्री हो या मित्र या प्रियजन। आगे की यात्रा उसका विधान है।
जब हम यहाँ (जापान) रहने आये थे हम नहीं जानते थे कि कितने दिन या कितने साल यहाँ रहना है। भाषा भी नहीं जानते थे। किसी से भावनात्मक सम्बन्ध बनेंगे इसकी आशा भी न की थी और आवश्यकता भी नहीं लगी। लेकिन फ़िर भी लोगों से मिलना-जुलना हुआ और जुड़ाव भी हो गया, अब यह जुड़ाव ही तो आधार है ना। मेरे इस ज़िक्र भर से ही कि मैं वापस चली जाऊँगी, मेरी सहेलियों की आँखें भर आती हैं। ऐसे में, मैं ख़ुद को बहुत विचित्र स्थिति में पाती हूँ, क्योंकि इस विछोह की पीड़ा के कारण को समझ जाने के कारण मैं दुःखी नहीं हो पाती हूँ। हम यात्री हैं और साथ होने का यही परिणाम है।
यह हम सभी समझते हैं कि भौगोलिकरूप से दूर हो जाने पर कई सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं, कई सम्बन्ध सुप्त हो जाते हैं, और कई सम्बन्ध बने रहते हैं। अतः कौन सा सम्बन्ध किन नयी ऊँचाइयों को छुऐगा, कौन सा सम्बन्ध दुःख का कारण बनेगा, यह पहले से कहा नहीं जा सकता। कोशिश कीजिये कि जिससे भी मिलिये प्रेमपूर्वक मिलिये। लोग आपको भूल जायेंगे, पर आपके व्यवहार को कभी नहीं भूलेंगे (व्यवहार की कई गलतियाँ मुझसे हो चुकी हैं)।