1996-97 की बात है, उन दिनों अख़बारों में भारतीय वायु सेना में भर्ती के लिये एक विज्ञापन निकला करता था, "क्या आप में है वो बात? (ऐसा ही कुछ)"। "ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर्स" के लिये अविवाहित युवक/युवतियों से आवेदन माँगे गये थे। ग्रेजुएशन में गणित/भौतिकी/रसायन आदि विषयों के प्राप्तांकों के आधार पर चयन के लिये बुलावा पत्र आ सकता था। मैंने भी अप्लाई करने का निर्णय लिया, बुलावे के आ जाने जैसी कोई उम्मीद नहीं थी। आवेदन करने के लिये कोई फ़ीस भी नहीं माँगी गयी थी। आवेदन सादे कागज़ पर हाथ से बनाकर या टाइप्ड प्रति में किया जा सकता था। मैंने एक A4 साइज़ के कागज़ पर हाथ से कॉलम etc. बनाकर आवेदन कर दिया, बस अपने गणित के प्राप्तांकों का भरोसा था जोकि मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा थे, बस यही एक तिनका था। तब मेरा व्यक्तित्व बहुत ही अंतर्मुखी किस्म का था, NCC जैसा भी कभी कुछ किया नहीं था, स्कूल में ज़रूर "स्काउट/गाइड" का थोड़ा प्रशिक्षण मिला था।
ख़ैर आवेदन-पत्र भेज दिया।
उम्मीद के विपरीत बुलावा आ गया, देहरादून के 1AFSB से। आने-जाने का स्लीपर क्लास का किराया और रहने-खाने का इंतज़ाम, यहाँ तक कि रेलवे स्टेशन से सेंटर तक लाने-छोड़ने का भी इन्तज़ाम।
मैं बार-बार बुलावा-पत्र को देखती और इतना खुश होती कि जैसे कोई लॉटरी लग गयी हो।
अब समस्या ये कि मैं परीक्षा देने जाऊँ कैसे?
लेकिन, ज़िद्द थी कि जाना है। वाक़ई, आज मुझे बिल्कुल भी अफ़सोस नहीं है उस दिन के ज़िद्दीपने का। यदि मैं ना गयी होती तो, मैं मेरे आज के अपने होने को सिद्ध न कर पाती। उस परीक्षा ने मेरी आँखें खोल दीं।
मम्मी-पापा को मनाया और देहरादून की यात्रा पर अकेले निकल पड़ी (बाद में कितनी यात्रायें अकेले कीं, पर यह ख़ास है)। एक लड़की जो कभी शहर से बाहर भी अकेले न गयी हो, जिसकी ज़िन्दगी क़िताबों से माथापच्ची में बीती हो, घर के सुरक्षित वातावरण से निकल कर अकेले यात्रा करना उसके लिये सज़ा से कम नहीं था। लेकिन क़माल का विश्वास था मम्मी-पापा को मुझपर, क्यों, ये तो मैं भी नहीं जानती। मम्मी ने कुछ हिदायतें दे कर मेरा हौसला बढ़ा दिया था, और मैं उनसे कह रही थी कि देखना, कल की लौटती गाड़ी से ही वापस आ जाऊँगी।
देहरादून में सब उसी प्रकार हुआ जैसा पत्र में बताया गया था। पूरे भारत से 72 लडकियों को बुलाया गया था, ये था मेरा भारत के हर प्रांत की लड़की से मिलने का पहला अनुभव। हमें रहने आदि के नियम-क़ायदे बता दिये गये। हमें "चेस्ट नंबर" दे दिये गये, अब नंबर ही हमारी पहचान थे, शाम को घर पर फ़ोन करके सूचना देने की अनुमति दी गयी, रात 10:00 बजे के बाद जागने की सख़्त मनाही थी, सुबह नाश्ता वग़ैरह कर के 7:00 बजे रिपोर्ट करना था। दूसरे दिन सुबह ही लोगों का एक "स्क्रीन टेस्ट" हुआ। स्क्रीन टेस्ट में कुछ साइकोलॉजी के टेस्ट, कुछ रीजनिंग इत्यादि के प्रश्न थे।
टेस्ट के बाद हम सबको फ़िर से इकठ्ठा किया गया। अब एनाउन्समेंट होनी थी कि कितने लोगों को आगे के टेस्ट के लिये रुकना है और कितने लोग घर वापस जायेंगे। अभी तक कानपुर की तीन लड़कियाँ थीं।
एनाउंसमेंट हो गयी और मुझे रोक लिया गया। मन बल्लियों उछलने लगा, एक बार फ़िर फ़तह हो गयी थी।
आगे की परीक्षा में तरह-तरह के टेस्ट थे, जैसे कि, सोलो टॉक, ग्रुप डिस्कशन, ग्रुप टास्क, फिजिकल टास्क (सोलो), फिजिकल टास्क (ग्रुप), केस स्टडी एंड स्ट्रेटेजी बिल्डिंग, साइकोलॉजी टेस्ट और पर्सनल इंटरव्यू। मेरे सामने भाषा (अँग्रेज़ी) की समस्या और तैयारी की कमी दोनों ही थीं। वहाँ जिन 32 लड़कियों को रोका गया था, सब एक से बढ़कर एक थीं, मुझसे कहीं ज़्यादा इंफॉर्मड थीं, मैं कच्ची खिलाड़ी थी। 4 दिन बाद मुझे भी घर जाने के लिये बोल दिया गया।
उस दिन के बाद से अँग्रेज़ी भाषा को काबू करना मेरा पहला लक्ष्य हो गया था, ये कहना ग़लत न होगा कि इस एक अकेली परीक्षा ने जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोण को एक पैराडाइम शिफ़्ट दे दिया था, अब मुझे ये पता चल गया था कि कुछ भी पाने के लिये सिर्फ़ प्रतिभा ही काफ़ी नहीं है, लक्ष्य की दिशा में सधे हुये, सतत प्रयास भी करने होंगे।
प्रयास किये और GRE and TOEFL में जाकर ही गाड़ी रुकी।
जीवन सफ़लता और असफ़लता का मिला-जुला रूप है, आप इसे कैसे देखते हैं बस वही महत्वपूर्ण है।
(जनरल बख़्शी के रोने की ख़बर ने न सिर्फ़ मुझे रुला दिया, बल्कि यादों के उस पाले में ले जाकर खड़ा कर दिया जो देहरादून में है। ये वह समय था जब सिर्फ़ "ग्राउंड ड्यूटी" के लिये ही युवतियों के दरवाज़े खोले गये थे, अब समय बहुत बदल गया है)